फुलेश्वर:
मेरा नाम फुलेश्वर है। मैं बिहार के कटिहार ज़िले के बरारी प्रखंड के सिक्कट पंचायत का रहने वाला हूँ। मेरे गाँव की कुल आबादी करीब डेढ़ सौ से ऊपर है और सभी लोग मुसहर समुदाय से आते हैं।
मेरे गाँव में हाल ही में एक महिला की मृत्यु हो गई। उनकी उम्र करीब 65 वर्ष थी। वे पिछले पाँच साल से बीमार थीं और बहुत गरीब थीं। उनके दो बेटे हैं-बड़ा बेटा पिछले महीने ही कमाने के लिए पंजाब गया था और छोटा बेटा घर पर ही था।
हमारे गाँव में जब किसी की मृत्यु होती है, तो उसके शव को दाह-संस्कार के लिए गंगा जी के घाट ले जाया जाता है। गंगा नदी हमारे घर से केवल 8 किलोमीटर दूर है। हमारे समुदाय में शव को जलाया नहीं जाता, बल्कि दफनाया जाता है। यह परंपरा हमारे पूर्वजों से चली आ रही है। मैंने भी मई 2025 में अपने बड़े पापा को और अगस्त 2025 में अपनी मम्मी के शव को मिट्टी में दफनाया है। उस समय गंगा नदी सूखी पड़ी थी।
मैं इससे पहले कभी किसी लाश को दफनाने नहीं गया था, लेकिन उस लड़के को अकेला देखकर मुझे लगा कि मुझे भी साथ जाना चाहिए। जब हम लोग लाश को लेकर गंगा नदी के घाट पर पहुँचे, तो नदी का जलस्तर काफी बढ़ा हुआ था। हम लोग गंगा जी के घाट से करीब 500 मीटर दूर किनारे-किनारे लाश को लेकर जा रहे थे।
वहाँ के ज़मींदार, जो यादव जाति के थे, जिनकी ज़मीन नदी के ऊपर है, वही लोग किनारे तक की सरकारी ज़मीन भी जोतते हैं (फसल लगाते हैं)। वहीं स्थानीय लोग हमें मना करने लगे कि यहाँ शव दफनाना नहीं है। हम लोग करीब 75–80 लोग थे। ऐसे में कुछ लोग ज़मींदार की बात न मानकर लाश लेकर आगे बढ़ने लगे। तभी ज़मींदार ने कुछ और लोगों को बुला लिया और लाठी-चप्पल लेकर मारने के लिए दौड़ पड़े। गाली-गलौज भी शुरू हो गई।
इसके बाद हम लोग पीछे हटे और करीब 4 किलोमीटर दूर घूमकर लाश को ले गए, फिर वहाँ दफन किया। कई बार तो जून-जुलाई के महीने में जब जलस्तर बहुत बढ़ जाता है, तब नाव के सहारे गंगा के बीच जाकर लाश को पत्थर से बाँधकर फेंकना पड़ता है।
उसी दिन हमारे बगल के गाँव के ओबीसी समाज के एक व्यक्ति की मृत्यु हुई थी। वह नाई जाति से था। उसे भी गंगा नदी के घाट पर जलाया जा रहा था। तब वहाँ के कुछ लोग हम लोगों को देखने आए कि हम कैसे लाश को दफनाते हैं। वे तीन लोग उसी नदी के किनारे-किनारे हमारे पास आए। ज़मींदार ने उन्हें कुछ नहीं कहा और चुपचाप देखता रहा।
मैंने उन तीनों लोगों को हमारे साथ हुई पूरी घटना बताई, लेकिन उन्होंने कुछ भी नहीं कहा। गंगा नदी घाट को कुछ दबंग लोगों ने ठेके पर ले रखा है। लाश जलाने वाले डोम को भी काबू में रखा गया है।
इससे साफ पता चलता है कि दलित को मरने के बाद भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। यही सच्चाई है। सरकार चाहे जितनी भी नीतियाँ बनाए या कानून लाए, जब तक लोगों के दिल और दिमाग से यह सोच नहीं निकलेगी, तब तक दलितों के साथ ऐसा व्यवहार होता रहेगा।
अफसोस है कि आज़ादी के 79 साल बाद भी दलित को मरने के बाद चैन नहीं मिलता।
नवदृष्टि शिक्षण केंद्र
कटिहार, बिहार

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