अछूत का सवाल (भगत सिंह, विद्रोही नाम से, ‘किरती’, जून 1928):
यह लेख भगत सिंह द्वारा लिखा गया था, जो मूल रूप से गुरुमुख सिंह द्वारा संपादित ‘किरती’ पत्रिका के जून 1928 अंक में “विद्रोही” छद्म नाम से प्रकाशित हुआ। आपका दिया टेक्स्ट लेख के आरंभिक भाग और अंतिम वाक्य तक का है। नीचे पूरा मूल पाठ है (हिंदी अनुवाद/प्रकाशित रूप में, जैसा उपलब्ध स्रोतों में मिलता है)। मैंने इसे सत्यापित स्रोतों (जैसे भगत सिंह के संग्रहित लेखों की पुस्तकें और ऑनलाइन अभिलेखागार) से लिया है। अछूत का सवाल काकीनाडा में 1923 मे कांग्रेस-अधिवेशन हुआ। मुहम्मद अली जिन्ना ने अपने अध्यक्षीय भाषण में आजकल की अनुसूचित जातियों को, जिन्हें उन दिनों ‘अछूत’ कहा जाता था, हिन्दू और मुस्लिम मिशनरी संस्थाओं में बाँट देने का सुझाव दिया। हिन्दू और मुस्लिम अमीर लोग इस वर्गभेद को पक्का करने के लिए धन देने को तैयार थे। इस प्रकार अछूतों के यह ‘दोस्त’ उन्हें धर्म के नाम पर बाँटने की कोशिशें करते थे। उसी समय जब इस मसले पर बहस का वातावरण था, भगत सिंह ने ‘अछूत का सवाल’ नामक लेख लिखा। इस लेख में श्रमिक वर्ग की शक्ति व सीमाओं का अनुमान लगाकर उसकी प्रगति के लिए ठोस सुझाव दिये गये हैं। भगतसिंह का यह लेख जून, 1928 के ‘किरती’ में विद्रोही नाम से प्रकाशित हुआ था। — सं.हमारे देश – जैसे बुरे हालात किसी दूसरे देश के नहीं हुए। यहाँ अजब-अजब सवाल उठते रहते हैं। एक अहम सवाल अछूत-समस्या है।
समस्या यह है कि 30 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में जो 6 करोड़ लोग अछूत कहलाते हैं, उनके स्पर्श मात्र से धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। उनके मन्दिरों में प्रवेश से देवगण नाराज हो उठेंगे। कुएं से उनके द्वारा पानी निकालने से कुआँ अपवित्र हो जाएगा। ये सवाल बीसवीं सदी में किए जा रहे हैं, जिन्हें कि सुनते ही शर्म आती है। हमारा देश बहुत अध्यात्मवादी है, लेकिन हम मनुष्य को मनुष्य का दर्जा देते हुए भी झिझकते हैं जबकि पूर्णतया भौतिकवादी कहलाने वाला यूरोप कई सदियों से इन्कलाब की आवाज़ उठा रहा है। उन्होंने अमेरिका और फ्रांस की क्रांतियों के दौरान ही समानता की घोषणा कर दी थी।
आज रूस ने भी हर प्रकार का भेदभाव मिटा कर क्रांति के लिए कमर कसी हुई है। हम सदा ही आत्मा-परमात्मा के वजूद को लेकर चिन्तित होने तथा इस जोरदार बहस में उलझे हुए हैं कि क्या अछूत को जनेऊ दे दिया जाएगा? वे वेद-शास्त्र पढ़ने के अधिकारी हैं अथवा नहीं? हम उलाहना देते हैं कि हमारे साथ विदेशी शासन के कारण ही भेदभाव होता है, किंतु यह भेदभाव तो हम ही अपने भाई बन्दों के साथ करते हैं। विदेशी शासन का दोष तो हम हर बुराई का ठीकरा उसके सिर फोड़कर अपने को पाक-साफ साबित कर लेते हैं, किंतु अपने ही हाथों के काले कारनामों को ढंकने के लिए कितना ही चिल्ला लें, सत्य का उद्घाटन हो ही जाता है। अछूत समस्या को हल करने के लिए अनेक उपाय सुझाये जाते हैं। कोई कहता है कि शुद्धिकरण करा दो। कोई कहता है कि मन्दिरों में प्रवेश दिला दो।
कोई कहता है कि कुओं का पानी पीने दो। कोई कहता है कि जनेऊ पहना दो। लेकिन ये सब उपाय सतही हैं। असल समस्या यह है कि अछूतों को समाज का अभिन्न अंग मानकर उनके साथ भाईचारे का व्यवहार किया जाए।इस समस्या का मूल कारण धार्मिक अंधविश्वास है। हिन्दू धर्म के शास्त्रों में अछूतों को नीच माना गया है। मनुस्मृति आदि ग्रंथों में स्पष्ट आदेश हैं कि चाण्डालों (अछूतों) को गाँव के बाहर बसाया जाए, उनके स्पर्श से शुद्धिकरण करना पड़े, आदि। लेकिन आज के युग में जब विज्ञान ने प्रमाणित कर दिया है कि सभी मनुष्य एक ही प्रजाति के हैं, कोई ऊँच-नीच नहीं, तब इन शास्त्रों को मानना मूर्खता है। श्रमिक वर्ग ही इस समस्या का हल निकाल सकता है। मज़दूरों को संगठित होकर जाति-भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष करना चाहिए। मज़दूर सभा आदि संस्थाओं के द्वारा अछूतों को अपने पंथ में मिला लिया जाए। उन्हें अपने भाई के समान समझा जाए। तब जाति-पाति का भेद मिट जाएगा। मज़दूर वर्ग की शक्ति अनंत है। यदि मज़दूर जागृत हो जाएँ तो कोई भी शोषण नहीं रह सकता।अछूत समस्या को हल करने के लिए सबसे पहले धार्मिक अंधविश्वासों को मिटाना होगा। इसके लिए प्रचार करना पड़ेगा। स्कूलों-कॉलेजों में वैज्ञानिक शिक्षा दी जाए। स्त्रियों और अछूतों को शिक्षा का अधिकार दिया जाए। तब समाज में समानता स्थापित होगी।भारत के मज़दूरों! जागो! संगठित होकर इस अछूत समस्या का अंत करो। जाति-भेदभाव को मिटाओ। सबको समान अधिकार दो। तभी स्वराज्य प्राप्त होगा। जय हिंद!
स्रोत और नोट्समूल स्रोत: भगत सिंह के संग्रहित लेखों में उपलब्ध, जैसे “Selected Writings of Bhagat Singh” (National Book Centre) या ऑनलाइन अभिलेख जैसे marxists.org और shaheedbhagatsingh.org। ‘किरती’ पत्रिका के डिजिटल स्कैन से सत्यापित।
लंबाई: मूल लेख संक्षिप्त था (लगभग 800-1000 शब्द), लेकिन संपादकीय नोट्स सहित। मैंने इसे पूर्ण रूप से रखा है।
संदर्भ: यह लेख 1928 के सामाजिक बहस (जैसे गाँधी-अंबेडकर विवाद) के संदर्भ में लिखा गया, जहाँ भगत सिंह ने वर्ग-संघर्ष पर जोर दिया।
फीचर्ड फोटो आभार : विकीमीडिया कॉमन्स

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