सौरव बनर्जी:

हमारी वानर से मनुष्य बनने कि कहानी अजब श्रम की एक ग़ज़ब कहानी है। कहानी खास इसलिए है क्यूंकि इस धरती पर मौजूद हर एक प्राणी से अलग, अनूठा और अतिरिक्त एक खास किस्म के श्रम के अभ्यास ने चार पैर पर चलने वाले गोरिल्ला या चिंपांजी को दो पैर पर चलना, और बाकी दो पैरों को हाथ के रूप में उपयोग करना सिखाया। निरंतर बदलने वाली वस्तुगत परिस्थिति से लगातार संघर्ष ने उसके अंदर एक ऐसी खास चेतना और बुद्धि का विकास किया जो उसे प्रकृति और उसके कानून को बाकि सभी प्राणी से सबसे अच्छा जानने, समझने और उपयोग करने में मदद की। फिर धीरे-धीरे इसी चेतना और बुद्धि से लैस श्रम और संघर्ष ने उसको अधिक समृद्ध कर, एक खास तरह का दिल सौगात दिया। जो न के वल सिर्फ एक छंदबद्ध तरीके से धड़कता गया पर उसे बोलना, यहाँ तक की कविता बोलना, लिखना, गाना, हंसना, रोना, रुलाना, खेलना, अदि सैकड़ो खास हरकतें और पैंतरे सिखाया, तथा कुल मिलाकर आपने आप से, दूसरे जानवर या अन्य विभिन्न पशु, पक्षी और प्रजातियों से, तथा सारी दुनिया से दुनिया भर का प्रेम करना सिखाया। जो बाकि कोई जानवर या प्राणी सीखना तो दूर, कल्पना भी नहीं कर सका। इसी तरह उन्होनें तीन लाख साल में बाक़ी सभी साथी जीव-जंतुओ को पीछे छोड़ कर अपने आपको इतने ऊँचे स्थान पर स्थापित किया। जानवर होते हुए भी वह और जानवर नहीं रहे, उसकी क्षमता इतनी बढ़ती गयी कि जब संसार के समस्त जीव-जंतु, पेड़-पौधे प्रकृति और उसके कानून के बेबस गुलाम बनके जीते रहें। वह प्रकृति से सीख कर, प्रकृति की तरह ही बदले में प्रकृति से प्रेम करने लगे, उससे सुरक्षा पाने के साथ-साथ उसकी भी सुरक्षा करने लगें और अपने खास तरह के विकास के लिए ज़रुरत पड़ने पर प्रकृति की अदालत में ही प्रकृति के कानून की धज्जियाँ उड़ाने की ताकत और साहस भी रखने लगें। इसी तरह संघर्षरत वानर कब नर और नारी में बदल गया, या कहें तो एक निर्बोध प्राणी कब सर्वश्रेष्ठ बुद्धिजीवी, या विज्ञान की भाषा में बोले तो होमिनिड (ग्रेट ऐप) कब होमो सेपियन्स (“वाइज मैन”) बन गए किसी को पता नहीं चला। 

वह जाने-अनजाने में वानर से मानव, मानव से इंसान, इंसान से अधिक बेहतर इंसान और अधिक बेहतर इंसान से भगवान बनते चले गए। उसके लिए सोच और क्षमता की सीमा इतनी अपरिसीम होती गयी की उसने आसमान पर बसाया भगवान को और धरती पर बसाया स्वर्ग, आज वह खुद पैदा कर सकता है। नदी जैसे प्रवाल बल को अपने अनुसार मोड़ सकता है, पहाड़ जैसी कठिनता को तोड़ सकता है, आसमान जैसी व्यापकता को चुम सकता है, सूरज जैसा वह तेजस्वी ऊर्जा को छू सकता है। तूफ़ान, आंधी या कोई भी प्राकृतिक आपदा से झूझ सकता है, आग को जेब में रख सकता है, पंख न होने के बावजूद भी उड़ सकता है और ना जाने क्या क्या कर सकता है और क्या नहीं कर सकता है। 

श्रम ही वह सार है जिसने इस स्तनपायी प्राणी को बाकि स्तनपायी प्राणियों से अनोखा इंसान बनाया। ज़िन्दगी की खास जेद्दोजहद में आदिमानव ने हर प्रकार के श्रम किये और इस श्रम की विविधताओ ने उसे प्राणी कुल में सबसे खास एक प्राणी बनाया। श्रम ही वह विचार है जिसका अभ्यास इंसान सदियों से करते आया और करता रहेगा। नहीं तो बाक़ी जानवर जब आपस में और दूसरी प्रजातियों से सिर्फ विवाद रचते हैं तब इंसान अपने आपको और उसकी दुनिया को सुन्दर बनाने के प्रयास में समय-समय पर मतवाद (विचारधारा) की रचना करते रहा। अपनी लाखों सालों की इस महान समुद्र यात्रा में इंसान ने अपने विकास के न जाने कितने वाद को समुन्दर में फेंक गिराया या कितने वाद अपने आप ही सामुद्रिक दुर्घटना का शिकार हो गए। कुछ ने इतिहास बनाया तो कुछ सिर्फ इतिहास की तरफ बेबाक हो कर ताकते रहे पर उन्हें स्थान नहीं मिला। पर आज तक जो वाद जाने-अनजाने में इंसान के अंदर बने रहे, हज़ार सामुद्रिक आपदा भी जिन्हें कभी न मार सकी, इंसान बने रहने के हर एक संघर्ष में जो इंसान का साथ देता रहा, निरंतर, निर्विछिन्न, नैसर्गिक, वह है श्रमवाद। जब तक श्रमवाद है तब तक इंसान जीवित है। समय की गति के साथ इंसान जितना आगे बढ़ेगा उसके विचार बदलेंगे, विचारधारा बदलेगी और ऐसे सैकड़ो वाद आएंगे और जाएंगे पर सबके पीछे श्रमवाद एक ही वाद रहेगा, जब तक और जहाँ भी इंसान साँस लें। 

साला कम्बख्त काम
वह सब कुछ तोड़ सकता है
धरती, धारा, धारणा, धरोहर, ध्वजा और धर्म भी,
क्योंकि वह काम करता है।
वह सब कुछ गढ़ भी सकता है,
संगीत, साहित्य, सुंदरता, शस्त्र, शास्त्र
और यहाँ तक की, समय और सत्य भी
वह सब कुछ रच सकता है जो वह चाहता है
और फिर, वक़्त के एक इशारे पर
वह उसकी तमाम रचना को
एक निष्ठावान साधक की तरह हमेशा के लिए छोड़ भी सकता है
यह इतनी आसुरी शक्ति?
क्योंकि वह काम करता है।

उसे प्रेम से बेहद प्रेम है
और नफ़रत से बेशुमार नफ़रत
उसे पुराण से पुराना, आदि से अनंत
अतीत के हर सृजन से प्रेम है और सब किस्से भी याद है
वह भूल से भी भूलना चाहे तो भुल नहीं पाता
जैसे की दूर से आयी कोई गीत की राग,
बाग़ की खुशबू या पिछली फाग का रंग
जो ज़हन में एक बार चढ़ जाये तो लाख मिटाने से भी नहीं मिटता
यह इतना अद्भुत एक दिल?
क्योंकि वह काम करता है।
वह वर्तमान में जीता है पर उससे बेचैन भी रहता है
वह समय की हर नाक़ामयाबी
भविष्यों के स्वप्नों में पूरा करता है
और फिर, कल के लिए अपने आज को
कोयला जैसे आग में बाएं हाथ से झोंक देता है
यह इतना उन्मादी मन?
क्योंकि वह काम करता है।
वह जन्म को नहीं जानता
जीवन को पूर्ण रूप से नहीं पाता
जीने के लिए किसी झूठ को नहीं अपनाता
और मृत्यु जैसे सच को भी
कम से कम, दिल से नहीं मानता,
वह तो बस जी भर के जीना चाहता
और शायद इसीलिए, शहादत भी नहीं मांगता
पर फिर, ज़िन्दगी की जद्दोजहद में
वह एक दिन जीता जागता शहीद बन जाता
यह इतना कठिन द्वन्द?
क्योंकि वह काम करता है।

उपरोक्त लेख वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता सौरव बनर्जी द्वारा लिखित है। श्रमवाद को व्यवहार में परिवर्तित करते हुए पांच वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश के देवास ज़िला स्थित आदिवासी बाहुल्य ग्राम शुक्रवासा में उन्होंने एक सामाजिक प्रयोग शुरू किया।

सौरव ने हाउल, यानी हाऊ ऑट वी लिव (हमें कैसे जीना चाहिए), जो एक सामाजिक संगठन है, उसकी शुरुआत की। समूह में पत्रकार, मेडिकल छात्र, कलाकार, इंजिनियर इत्यादि नौजवान शामिल हैं। आत्मनिर्भर और स्वशासित समाज गढ़ने के प्रयास में हाउल द्वारा आदिवासी, दलित, मजदूर एवं किसानों के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं आर्थिक मंच तैयार किये गए। अनौपचारिक वैकल्पिक शिक्षा मॉडल, लीगल सहायता, स्वास्थ्य जागरूकता एवं सहायता, रोजगार निर्माण, भूमि अधिकार इत्यादि क्षेत्र में सहायता देने से लेकर किसान और मजदूरों को शिक्षित कर पंचायत स्तर समिति का गठन किया गया जिसने आगे चल कर पंचायत एवं विधानसभा चुनाव लड़ा।

गौरतलब है कि वर्ष 2023 से सौरव बनर्जी एवं हाउल ग्रुप पर लगातार हमले किये जा रहे थे। साल 2025 में उग्रवादी दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा साज़िश रच कर संगठन के खिलाफ मीडिया ट्रायल चलाया गया और पुलिस एवं प्रशासन की मदद से दमनचक्र की शुरुआत हुई।

सौरव बनर्जी पर धार्मिक भावनाएं आहत करने का झूठा केस दर्ज हुआ और जेल डाला गया। वहीं ग्रामीणों और समिति सदस्यों को डराया गया और हाउल द्वारा तैयार किये गए जन पुस्तकालय, सामूहिक रसोईघर, कला एवं शिक्षा केंद्र, स्वास्थ्य केंद्र एवं रोज़गार माध्यम (आटा चक्की और पोल्ट्री फार्म) को अवैध रूप से बुल्डोज किया गया और फिर आगजनी को अंजाम दिया गया। वर्तमान में हाउल ग्रुप कानूनी लड़ाई लड़ रहा है।

फीचर्ड फोटो आभार : गेटी ईमजेस

Author

  • सौरव बनर्जी / Saurav Banarjee

    सौरव बनर्जी एक सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता, अनुवादक, पत्रकार और संपादक हैं। उनका जन्म पश्चिम बंगाल के कृष्णनगर में हुआ था और उन्होंने बेंगलोर विश्वविद्यालय से बीएससी (कंप्यूटर साइंस) की पढ़ाई पूरी की। वे पिछले दो दशक से सामाजिक कार्य में सक्रिय हैं और इंदौर में निवासरत हैं। उन्होंने फ्री प्रेस और ग्लोबल हेराल्ड समाचार पत्र में संपादक के रूप में काम किया है। उन्होंने हाउल ग्रुप की स्थापना की, जिसका उद्देश्य आदिवासी, मजदूरों, किसान और खेत मजदूरों के बीच काम करके आत्मनिर्भर और स्वशासित समाज बनाना है।

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