शैलेश:
जैसा कि हम सभी जानते हैं, दीवाली रौशनी का पर्व है – एक ऐसा त्योहार जब कोई भी अंधेरा अच्छा नहीं लगता। लोग अपने घरों को दीपों और रोशनी से सजाते हैं, एक-दूसरे को उपहार देकर खुशियाँ बाँटते हैं। धनतेरस से शुरू होकर पाँच दिनों तक चलने वाला यह त्यौहार लोगों के जीवन में उत्साह और उमंग भर देता है।
कहते हैं, इस दिन भगवान श्रीराम चौदह वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे। वहीं कुछ लोग यह भी मानते हैं कि आज के दिन “घूरे” यानी कूड़ा-कचरा तक के दिन भी बदल जाते हैं। अलग-अलग स्थानों पर दीवाली को लेकर कई तरह की कहावतें और मान्यताएँ प्रचलित हैं। पाँच दिनों के इस पर्व का अंतिम दिन भाई दूज कहलाता है, जिसे हर क्षेत्र में अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है।
भाई दूज भाई-बहन के स्नेह और अटूट रिश्ते का प्रतीक है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करते हुए व्रत रखती हैं – वे न तो भोजन करती हैं, न ही पानी पीती हैं। पूजा के समय थाली में भुर्की, पेड़ा, बर्फी, चूड़ा जैसी मिठाइयाँ रखी जाती हैं। साथ ही काजल की डिबिया, कॉपी, किताब और पेन भी रखे जाते हैं, ताकि भाई के जीवन में ज्ञान, सफलता और समृद्धि बनी रहे।
भाई दूज न केवल प्रेम और आशीर्वाद का प्रतीक है, बल्कि यह रिश्तों में नई ऊर्जा और अपनापन भी लाता है। जैसे करवा चौथ में पुरुषों के लिए विभिन्न मान्यताएँ हैं, वैसे ही भाई दूज में भी भाइयों से जुड़ी कई परंपराएँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि भाई दूज की पूजा से पहले भाइयों को घर से बाहर नहीं जाना चाहिए, क्योंकि इस दिन बाहर जाने पर उन पर शेर या बाघ जैसे खतरे आ सकते हैं।
पूजा की तैयारी के दौरान थाली या डलिया में फूल, मिठाइयाँ और पूजन सामग्री रखकर उसे दुपट्टे या रुमाल से ढक दिया जाता है। कई महिलाएँ समूह बनाकर एक साथ पूजने जाती हैं – लगभग दस से पंद्रह लोगों का झुंड। छोटी-छोटी लड़कियाँ भी अपने भाइयों के लिए व्रत रखती हैं, साथ में गाना गाती और मस्ती करती हुई पूजा करने जाती हैं।
भाई दूज के दिन आँगन को साफ़ कर सुंदर रंगोली बनाई जाती है। रंगोली के बीच भाई और बहन का चित्र बनाया जाता है, जो इस पवित्र रिश्ते का प्रतीक होता है। रंगोली के चारों ओर कलश के चित्र बनाए जाते हैं, जिन पर बहनें अपनी पूजा की थाली रखती हैं। थाली के नीचे गेहूँ या चावल रखा जाता है। चित्र के बीच में गौरी जी और लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियाँ बनाई जाती हैं। सिलौटी और बट्टा भी रखा जाता है, और उस पर बेर जैसे काँटेदार पौधे की डालियाँ रखी जाती हैं। बीच में आग जलाकर गोबर से गौरी जी की प्रतिमा रखी जाती है, जिस पर सभी बहनें सिंदूर चढ़ाती हैं।
चित्र पूरा तैयार होने के बाद पूजा आरंभ होती है। हल्दी और चावल को पीसकर एक कटोरी में मिलाया जाता है और कपड़े या डंडी की मदद से हाथों पर लगाया जाता है। जितने भाई होते हैं, उतनी डंडियों से हाथों पर लकीरें बनाई जाती हैं। इसके बाद बहनें अपने भाइयों की खुशहाली की कामना करती हैं। रूई से बने अंगूठी जैसे निशान काँटों पर चढ़ाए जाते हैं।
इसके बाद बहनें पाँच या सात काँटों की पत्तियाँ तोड़कर सिलौटी पर रखती हैं और मन ही मन कहती हैं –
“हमारे भाइयों को रास्ते में बघवा ना मिले, शियरवा ना मिले।”
इस दौरान लाही (सरसों के दाने) को भी पीसा जाता है, अगरबत्ती और दीपक जलाकर आरती की जाती है। बहनें गौरी जी पर सिंदूर चढ़ाती हैं, माथे पर लगाती हैं, और आग में घी, चीनी, चूरा, भुर्की आदि पाँच बार डालकर अर्घ्य देती हैं।
फिर भाई-बहन की कथा सुनाई जाती है –
एक भाई अपनी बहन से मिलने भाई दूज के दिन निकल पड़ा। उसकी माँ ने उसे रोका, पर वह नहीं माना। रास्ते में उसे नदी में साँप मिला। साँप बोला, “मैं तुम्हें खा जाऊँगा।” भाई ने कहा, “पहले मैं अपनी बहन से मिल लूँ, लौटते वक्त तुम मुझे खा लेना।”
कहानी सुनने के बाद सभी महिलाएँ, मुँह में पानी लेकर सिलौटी को पाँच बार नाघंती हैं, और बाहर जाकर ईंटा पर मुँह के अंदर का पानी उगल देती हैं। सभी, पहरुआ के माध्यम से ईंटा को एक बार में ही तोड़ देती हैं और प्रसाद लेकर वापस आ जाती हैं।
उत्तर प्रदेश के बहराइच ज़िले के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएँ आज भी इस तरह भाई दूज मनाती हैं। उनका विश्वास है कि ऐसा करने से उनके भाइयों को कोई अनहोनी नहीं होगी। हालाँकि, इन मान्यताओं के कारण महिलाओं में एक डर भी बना रहता है – वे जब तक पूजा पूरी नहीं कर लेतीं, पानी तक नहीं पीतीं।
देखा जाए तो अधिकतर व्रत और त्यौहार महिलाओं के लिए बनाए गए हैं, पुरुषों के लिए नहीं। फिर भी, भाई दूज जैसा पर्व भाई-बहन के प्यार, विश्वास और सुरक्षा का प्रतीक है – जो सिर्फ़ तिलक और मिठाई से नहीं, बल्कि भावना और आशीर्वाद से मनाया जाता है।

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