दीपक रंजीत:
भारत का संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है। लेकिन भारत एक विविधताओं से भरा देश है, जहाँ हर समुदाय की अपनी परंपराएं, अपने तरीके और जीवन की अलग समझ है। खासकर आदिवासी समाज की व्यवस्था, न्याय और भूमिका की परिभाषा अलग होती है। वहाँ जो बातें किताबों में नहीं मिलतीं, वे जीवन के अनुभवों और मौखिक परंपराओं में मौजूद होती हैं।
जब अदालतें “कानूनी उत्तराधिकारी”, “लैंगिक समानता”, या “संपत्ति पर अधिकार” जैसी बातें कहती हैं, तो वे संविधान के मौलिक अधिकारों का पालन करती हैं। लेकिन आदिवासी समाज में महिला का सम्मान, उसकी भूमिका और उसका हक सिर्फ कानून की भाषा में नहीं, बल्कि जीवन की व्यवस्था में होता है। वहाँ महिलाएं परिवार और समाज के केंद्र में होती हैं, भले ही उनके पास कोई कानूनी दस्तावेज न हो।
आदिवासी समाज की न्याय प्रणाली बोलचाल और परंपराओं पर आधारित होती है। वहाँ फैसले सामूहिक रूप से होते हैं, पंचायतों या बुज़ुर्गों के अनुभव से तय होते हैं। इनकी कोई लिखित किताब नहीं होती, लेकिन यह व्यवस्था सदियों से चली आ रही है और वहाँ के लोगों के लिए सही भी है।
अगर अदालतें बिना आदिवासी समाज से बात किए, सिर्फ संवैधानिक तर्कों के आधार पर कोई फैसला थोप देती हैं, तो यह न्याय नहीं, एक तरह का सांस्कृतिक दखल बन जाता है। संविधान का अनुच्छेद 244 और पांचवीं अनुसूची आदिवासी इलाकों की विशेषता को मान्यता देते हैं। लेकिन व्यवहार में कई बार इन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
न्याय का मतलब सभी को बराबर समझना है, लेकिन सभी को एक जैसा बना देना नहीं। आदिवासी समाज की अपनी पहचान, अपनी सोच और अपने तौर-तरीके हैं। अगर हम सच में न्याय चाहते हैं, तो पहले उनकी भाषा और जीवन को समझना होगा, न कि केवल किताबों की भाषा को लागू करना।
संविधान लचीला है, वह समाज के साथ चल सकता है। जरूरत है कि हम उसकी व्याख्या करते समय समाज की विविधताओं का सम्मान करें। तभी न्याय सबके लिए न्याय बन पाएगा, खासकर उनके लिए जिनकी आवाजें अक्सर अनसुनी रह जाती हैं।

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