विनीत काण्डपाल :

सत्यनारायण व्यास जी की आत्मकथा ‘क्या कहूं आज’ उनके संघर्ष की कथा है। ऐसा अनवरत संघर्ष जिसने उन्हें जीवन जीना सिखाया। उनकी आत्मकथा में एक चरित्र जो आद्यंत उनकी प्रेरणा बनकर खड़ा दिखता है वह है उनकी माँ। लेकिन आत्मकथा पढ़कर एक प्रश्न सहज ही मन में उठता है कि जहाँ माँ पल-पल उनके साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से खड़ी हैं, वहाँ क्या पिता का इतना ही स्थान है कि उनको केवल एक अध्याय तक सीमित कर दिया जा। उस एकमात्र अध्याय में पिता की भूमिका अपने आप में बहुत बड़ी दिखाई देती है तो लेखक ने उनको इतना सा ही महत्व क्यूँ दिया होगा? ‘सुदामा का घर’ नामक इस पुस्तक को पढ़कर यह संशय दूर हो जाता है। वह एकमात्र अध्याय जो आत्मकथा ‘क्या कहूं आज’ के अंत में प्रस्तुत किया गया है वह तो उनकी इस पुस्तक की पृष्ठभूमि है। एक ऐसा पिता जो पौराणिक चरित्र सुदामा को यथार्थ रूप में पाठकों के समक्ष उपस्थित कर देता है, ये ‘सुदामा’ प्रतीक है उस पिता का जो अपने परिवार के प्रति पूर्ण कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार है, परिवार का आत्मसम्मान जिसकी सबसे बड़ी पूँजी है। साथ ही यह पुस्तक एक ऐसे पिता का आख्यान है जिसने यह बताया कि बड़ी से बड़ी विपत्ति के आगे विश्वास और धैर्य से बड़ा कोई शस्त्र नहीं है। कहा जा सकता है कि इस पुस्तक के माध्यम से लेखक ने अपने पिता को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की है। 

‘सुदामा का घर’ आत्मकथा नहीं बल्कि लेखक के पिता का संस्मरण है। इस संस्मरण को लेखक ने ग्यारह अध्यायों में विभाजित किया है। जहाँ पहला अध्याय ‘सुदामा दंपती’ है वहीं अंतिम अध्याय है ‘नई पीढ़ी: कहाँ वो घर कहाँ ये घर’, पुत्र से दादा बनने के इस लम्बे सफर में लेखक ने कई अनुभव लिए जिसमें पिता की प्रवृत्ति उनके लिए सबसे अधिक प्रेरणादायक रही। पिता के उस छोटे से अभावग्रस्त घर से शुरू होकर यह यात्रा आज के सुविधासम्पन्न माहौल तक उन्हें ले आई पर वे आज भी उस अभावग्रस्तता को भूले नहीं हैं। लेखक इस संस्मरण के प्रारंभ में ही सुदामा और कृष्ण की तुलना करते हुए लिखते हैं, “कुछ न होना सबसे बड़ा होना है। सब – कुछ होना, कुछ न होने से बढ़कर नहीं। एक द्वारिकाधीश थे दूसरे आत्माधीश।” यही आत्माधीश स्थिति उनके परिवार की भी थी, उनके पिता का विश्वास कभी डगमगाया नहीं। लेखक के लिए उनका घर ज्ञान और ममता के द्वैत से निर्मित था, जहाँ उनकी माँ ममता की मूरत थीं और काकासा यानि पिता ज्ञानी। पिता के प्रति उनका कथन ‘एकदम आकाशवृत्ति, भाग्य के अधीन’ बहुत कुछ कह जाता है। एक लम्बी यात्रा के बाद लेखक के पास मात्र स्मृतियाँ हैं जिसके संदर्भ में वे लिखते हैं, “काल-देवता सब कुछ लील गए हमारे मानस-पटल की जीवंत स्मृतियों को कभी नहीं लील सके। इस मामले में काल और परिवर्तन हमसे हार गया। स्मृतियाँ हमारा बल हैं काल का उन पर बस नहीं।” वास्तव में लेखक के पटल में पिता और परिवार की जो जीवंत यादें हैं वो पाठक को भाव विभोर कर देती हैं। कहानियों और उपन्यासों से परे एक पिता की सच्ची तस्वीर इस संस्मरण में उभर कर सामने आई है। 

लेखक का परिवार ईश्वर की भक्ति पर टिका था, क्यूंकि कथा, भागवत और पुराण उनके परिवार की आजीविका का एकमात्र साधन थे, उनकी भक्ति ऐसी थी जो कि आडंबर से रहित थी। निर्धनता के बीच आडंबर वैसे ही शून्य हो जाता है, वहाँ तो उस शक्ति के प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास ही सर्वोपरि रहता है यही लेखक के परिवार का संबल था। पिता को कहीं भी कथा में व्यास बनने का निमंत्रण मिलता तो इससे पूरे परिवार में ऊर्जा का संचार हो जाता, तो भला वो ईश्वर से कैसे मुँह मोड़ सकते। आज के दौर में जहाँ व्यक्ति को सारी सुविधाएँ और सुख मिलने पर भी वह एकाकीपन का शिकार है, वहीं लेखक का संयुक्त परिवार पिता को मिलने वाली कथा पुराण की चंद दक्षिणा पा कर भी परम सुखी था। इसका सबसे बड़ा कारण स्वयं लेखक के शब्दों में ‘संतोष’ है। माना कि सुख की चाह बुरी नहीं पर कई बार परिस्थिति से मुख मोड़ कर मनुष्य अति की चाह करने लगता है इसलिए वह तमाम दुःख और अवसादों से स्वयं को घिरा हुआ पाता है। अतः पिता से जो सबसे बड़ी सीख लेखक के परिवार को मिली वह यही संतोष था। लेखक ने एक वाक्य में इसकी बहुत अच्छी व्याख्या की है, “हमारा सबसे बड़ा धन क्या था? एक ही उत्तर है संतोष।”

प्रेमचंद की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है, जो व्यवस्था और तंत्र पर बहुत बड़ा प्रश्न खड़ा करती है। यह पुस्तक तो उस दौर की कथा है जब हमारे देश को आज़ाद हुए कुछ ही वर्ष बीते थे, इस समय में वे समस्याएं जिन्हें प्रेमचंद ने अपने उपन्यास और कहानियों में उठाया है लगभग हर ग्रामीण परिवेश में आम बात होंगी। इस पुस्तक का अध्याय ‘सिर उठाती समस्याएं’ मानो अनायास ही गोदान के प्रसंगों की ओर ले जाता है। पुत्री के विवाह की चिंता आम बात है पर लेखक ने जैसे इस घटना का वर्णन किया है वह सीधे होरी और धनिया के उन संवादों को जीवंत कर देता है जब वे अपनी पुत्रियों रूपा और सोना के विवाह को लेकर चिंतित होते हैं। बस भाषा का अंतर है जो यह बताता है कि भारत का ग्रामीण अंचल चाहे उत्तर से दक्षिण हो या पूरब से पश्चिम एक ही प्रकार के संस्कारों और परम्पराओं से निर्मित है, बस भाषा और स्वरूप में कुछ अंतर है। लेखक के इस वाक्य को पढ़कर आप स्वयं इस पर विचार कर सकते हैं, “काकासा की चुप्पी का मूल कारण रुपए – पैसे के इंतज़ाम का था। कुछ जमा पूँजी हो तो मन और पाँव आगे बढ़ें। ब्याव तो बाद में रहा रुप्या-नारेल, सगाई-दस्तूर में ही दो सौ-ढाई सौ की तो ज़रूरत पड़ेगी ही। फिर लड़का ढूँढना, वहाँ जा कर बात चलाना, खानदान, चाल चलन का पता करना- ये सब क्या मामूली काम हैं?” एक बार पढ़ने पर लगता है जैसे यह लेखक के पिता के प्रति नहीं बल्कि होरी के मन के को लेकर हो। 

कई बार मनुष्य जब विपरीत परिस्थितियों से गुजर रहा होता है तो वह भले ही टूटे ना पर सशंकित तो हो ही जाता है। लेखक के पिता ने अनवरत परिवार के लिए संघर्ष किया पर कई अवसर आए जब वे भी निराश हुए ऐसे में भगवान के अतिरिक्त वे किसे याद करते, सुदामा के पास तो अपने मित्र कृष्ण थे पर इस सुदामा का एकमात्र आधार वे स्वयं ही थे। ऐसी स्थिति में वे अपने ईश्वर के अलावा किससे प्रश्न करते, “नारायण, इस घर के संकटों का कोई अंत है या नहीं? परीक्षा लेने की भी कोई सीमा होती है या नहीं? ऐसा क्या अपराध हुआ है मुझसे? मुझे तो सताया जो ठीक है मरजी आपकी। पर इन बाल-बच्चों पर आपको जरा भी दया नहीं आती?” ये ऐसे प्रश्न हैं जो हर व्यक्ति जो ईश्वर पर विश्वास करता है उसके मन किसी ना किसी रूप में उठते हैं। कर्ज की समस्या से जूझते हुए घर की छत में लोहे की चादर लगाना भी आसान नहीं है। ऐसी भीषण परिस्थितियों से गुजर के यदि कोई व्यक्ति ऊपर उठता है तो उसके स्वभाव में नम्रता कैसे नहीं होगी। पिता से लेखक को विरासत में कुछ मिला है तो वह है ज्ञान । हिंदी के साथ साथ संस्कृत में भी अधिकार उनके पारिवारिक संस्कारों के कारण ही है। उनके पिता इस बात का बराबर ध्यान रखते कि श्लोकों का उच्चारण अशुद्ध ना हो। इसी संदर्भ में उन्होंने एक प्रसंग का उल्लेख किया है जहाँ पर वे ‘अहरहरनवद्यं’ को ‘अरहरनैवेद्यं’ उच्चरित करते हैं, उनकी इस गलती पर पिता टोकते हैं और इस श्लोक की व्याख्या करते हुए अंत में कहते हैं, “कोई सूँऽणीं तो कंई केई, यो वां ब्यासजी को बेटो है। अशुद्ध नें बोलणो।” इस प्रकार के अनेक संस्मरण हैं जो बताते हैं लेखक ने पिता को अपने भीतर से कभी जाने ही नहीं दिया। उनके संस्कार और शिक्षाओं को लेखक ने अपना आदर्श माना है। वे ज्ञान के प्रतीक के रूप में अपने पिता को मानते हैं और इसकी पुष्टि यदा कदा संस्मरण के कई प्रसंगों में होती रहती है। पिता के साथ होती इन्हीं चर्चाओं ने उनकी साहित्यिक और भाषिक समझ को विकसित किया होगा।

लेखक के पिता का सहज और सरल व्यक्तित्व कई बार उनके लिए ही घातक सिद्ध हुआ। उनकी आजीविका का साधन कथा और कर्मकांड से मिलने वाली दक्षिणा थी किन्तु उन्हें कठोर व्रत और पूजा का फल उनकी मेहनत के अनुरूप नहीं मिलता था। ऐसा ही एक प्रसंग है जब वे किसी सेठ के यहाँ बड़े उत्साह के साथ कथा पुराण करने गए पर अंत में उनको कार्य के अनुरूप दक्षिणा नहीं मिली बल्कि सेठ ने उनकी ही दक्षिणा से प्रसाद के पैसे भी काट लिए। किन्तु पिता का संतोषी स्वभाव कभी उनको उग्र नहीं होने देता था। लेखक के शब्दों में, “माया को परास्त करने का अस्त्र पिताजी के पास था – संतोष।” इसके विपरीत लेखक का आचरण थोड़ा अलग है एक ऐसे ही प्रसंग में जब वे सत्यनारायण कथा करवाने जाते हैं और अपने परिश्रम के अनुरूप उन्हें दक्षिणा नहीं मिल पाती तो उस दक्षिणा को वापस कर देते हैं, इससे यह भी पता चलता है कि प्रत्येक पीढ़ी में कुछ न  कुछ परिवर्तन होना स्वाभाविक है। लेखक के लिए पिता वे वटवृक्ष थे जिनकी छाँव में उनका परिवार पूरे आत्मविश्वास के साथ फल फूल रहा था व्यास जी लिखते हैं, “वे हमारे घर के वटवृक्ष थे। उनकी छतनार ठंडी छाया में हम भाई – बहन उछल – कूद करते हुए खेलने में मस्त रहते थे।” परिवार में पिता का महत्व ये ही होता है कि उनका होना ही पूरे परिवार को आश्वस्ति देता है। कुछ ऐब जो पिता को थे उसके प्रति भी लेखक बहुत उदार दिखते हैं। जैसे चाय और बीड़ी पीने का उनका शौक जिसके पीछे लेखक ने कई तर्क दिए हैं। 

वह दौर किसी भी परिवार के लिए आसान नहीं था, विशेष रूप से भारत के गाँवों के लिए तो यह और भी मुश्किल था। परिवार कर्ज में डूबे हुए थे, एक-एक वक्त का भोजन भी कई परिवारों को बहुत मुश्किल से मिलता था। उस समय में यदि गाँव में कोई व्यक्ति अच्छा भोजन करता था तो उसे संदेह की दृष्टि से देखा जाता था। जहाँ लोगों के पास मोटा अनाज उपलब्ध ना हो वहाँ कोई मिठाई कैसे खा सकता है। इसका उल्लेख लेखक ने इस प्रकार किया है, “यह माना जाता था कि मावा – रबड़ी के दोने चाटने वाला यह आदमी दिवालिया होकर रहेगा और इसके बाल-बच्चे भूखे मरेंगे।” ऐसे कठिन समय में भारी अभाव के चलते भी लेखक का परिवार जब छोटी छोटी खुशियां पूरे उत्साह से मनाता तो पड़ोसियों को इससे ईर्ष्या होती परिवार की सामूहिकता का उत्साह उनके सारे आर्थिक संकटों को दूर कर देता था। आज जो वस्तुएं साधारण मध्यवर्गीय परिवार के लिए आम हैं जैसे साबुन, तेल आदि उस समय में यह गाँव वालों के आकर्षण का केंद्र हुआ करते थे। कहने का अर्थ यह है कि उस समय में बाज़ारीकरण इस प्रकार से हावी नहीं था इसका सबसे बड़ा कारण पूंजी का अभाव था। आज के समय में जहाँ छोटी छोटी बीमारियां विकराल रूप ले लेती हैं वहीं उस दौर में गाँव के गरीब परिवार भारी से भारी बीमारी का इलाज स्वयं ही कर लेते थे। कोई दवा नहीं कोई डॉक्टर नहीं मानो बीमारी उनकी परिस्थिति देखकर उनके वीभत्स इलाजों से स्वयं ही भाग जाती थी। माता के आँखों के उपचार के लिए पिता के संघर्ष का उल्लेख भी उन्होंने किया है, ऐसा लगता है सब की देखभाल करते करते शायद वे अपनी ही पीड़ा भूल गए। इस विषय में लेखक लिखते हैं, “काकासा ने खुद अपनी पीड़ा का कभी इजहार नहीं किया। वे सिर्फ एक बार बीमार पड़े और बिस्तर पकड़ लिया। कोटड़ी से जगदीश भाई सा ने आकर इलाज किया तो स्वस्थ हो गए।”

भोजन और खाद्य पदार्थों को लेकर भी लेखक ने बहुत रोचक ढंग से इसकी व्याख्या की है। 56 भोग की अवधारणा तो उस समय कोई क्या ही समझता पर जिस तरह से माता के हाथ से बने सादे भोजन का वर्णन किया गया है वह अद्भुत है, “भोजन हमेशा सादा और स्वादिष्ट होता। गोज्यूं की रोटियां, भेलण की दाल, जिसमें मां नाममात्र का तैल डालकर आखी मिर्चों का बघार लगाती। कभी घाट, राब, और खीरों पर सिके हुए पान्या का स्वाद तो रोटी और बाटी से भी अलग ही प्रकार का होता।” ऐसा लगता है कि लेखक की कलम के साथ जिह्वा का भी तारतम्य जुड़ गया है। चाय के प्रचलन पर भी व्यंग्य करते हुए लेखक उसको उपेक्षा भाव से ही देखते हैं उनके अनुसार इसका प्रचलन 1970 ई. के बाद ही अधिक हुआ। अपने पिता की तपस्या को माता की तपस्या से भिन्न मानते हुए लेखक कहते हैं कि जहाँ माँ कभी कभी व्याकुल हो जातीं वहीं पिता कभी धैर्य नहीं खोते थे। पिता अपना ख्याल कभी रख ही नहीं पाए। इसके बाद भी पूरे संस्मरण के अंत तक पिता के क्रोध  का केवल एक प्रसंग मिलता है इसी से उनकी स्थिरता का अनुमान लगाया जा सकता है।

लेखक के पिता के चरित्र की एक और विशेषता ध्यान आकर्षित करती है, वह है कर्मकांड आदि को लेकर उनके निजी विचार। यद्यपि उनकी आय का साधन कर्मकांड और विविध पूजा पद्धतियां  रहीं, पर वे रूढ़ियों को भलीभांति समझते थे। उनके लिए ये सब केवल आय का स्रोत था। लेखक की जीजी द्वारा अपना भविष्य जानने की जिज्ञासा पर उनका यह कथन आश्चर्य में डालने वाला है, “कंई कौने रे बेटा! ये ज्योतिष-वोतिष सब ब्राह्मणां की कमाई का प्रपंच है। यां में कंई नँ धर्यो। एक परमसत्ता की इच्छाऊं जो व्हेणो व्है ऊईज़ व्है’र रैव। ग्रह-नक्षत्र, कुंडली और भाग्य-फल यांकाऊँ कंई भी फोराई नँ व्है।” यद्यपि ईश्वर पर उनकी श्रद्धा अनन्य रही पर वे जानते थे कि अपने परिवार के लिए उचित अनुचित क्या है। भागवत और गीता भाग्य की महत्ता को नहीं बल्कि कर्म की प्रधानता को व्याख्यायित करते हैं बस व्यक्ति पर निर्भर है वह उसे किस रूप में ग्रहण करता है। लेखक ने पिता के खड्या अर्थात झोले को प्रतीक रूप में लिया है, खड्या के रूप में ये वह बोझ था जिसे पिता ने अपने कंधे पर उठाया हुआ था, उसी में उनके परिवार का खजाना छिपा था। एक फिल्म का संवाद है ‘जिंदगी लम्बी नहीं बड़ी होनी चाहिए’ उसी तर्ज में लेखक ने अपने पिता के लिए एक वाक्य लिखा है जो उनके चरित्र को चरितार्थ करता है, “उनकी जिंदगी लम्बी नहीं थी पर महान थी।” इसी में आगे उन्होंने जीवन के परिमाण नहीं बल्कि उसकी गुणात्मकता पर विशेष जोर दिया है। पिता की आयु भले ही अड़सठ वर्ष रही पर इन वर्षों में उन्होंने कभी अपना और अपने परिवार का सिर झुकने नहीं दिया।

जीवन में संघर्ष करते हुए लेखक ने अपने माता पिता को कभी अकेले नहीं छोड़ा उनकी छाँव सदा लेखक के साथ बनी रही। ‘अजमेर और डूंगरपुर का प्रवास’ नामक अध्याय में इसका वर्णन है जब वे अपने माता और पिता को अपने साथ इन स्थानों पर ले गए। एक लम्बी उम्र गाँव के अपने घर में बिताने वाले उनके पिता जो ग्रामीण स्वच्छंदता से परिचित थे उनका 2 कमरों के साधारण से बदबूदार कमरों में कैसे मन लग सकता था, भले ही गाँव में आर्थिक समस्याएं रही हों पर अपना परिवेश किसी भी व्यक्ति के लिए ख़ास होता है। लेकिन उन्होंने अपने पुत्र से कोई शिकायत नहीं की बल्कि उस परिवर्तन को सहर्ष स्वीकार कर लिया लेखक के शब्दों में, “उनकी महानता इसी में थी कि उन्होंने मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं की।” परिस्थिति के साथ सामंजस्य बैठाने की यह कला अनुकरणीय है। लेखक जो उस समय अपने माता पिता की पीड़ा नहीं समझ पाए एक लम्बे समय के बाद जब वे इस दौर से गुजरे तो उनको भी इसका अनुभव हो गया। शायद इसीलिए कहा गया है कि समय बहुत बलवान होता है। आज लेखक को यह पछतावा है कि पिता के कष्ट को जब समझना था वे समझ ही नहीं पाए, पिता के प्रति उनकी माता और अन्य लोगों को हमेशा शिकायत रही पर कोई उनकी मजबूरी समझ ही नहीं पाया। आज हिंदी साहित्य में एक पक्ष वृद्ध विमर्श को केंद्र में रखता है, ज्ञानरंजन की ‘पिता’ कहानी में जिस प्रकार के पिता को चित्रित किया गया है उसमें भी कुछ ऐसी ही समस्याएं हैं, प्रत्येक नई पीढ़ी यह भूल जाती है कि उससे पहले का दौर वैसा बिल्कुल नहीं रहा होगा जैसा आज है। जब तक उनको यह अहसास होता है समय उनके हाथ से निकल जाता है। पिता की मृत्यु का प्रसंग सबसे मार्मिक है, तमाम उपचारों के बाद भी जब उनकी मृत्यु सामने थी तब लेखक उनसे हमीरगढ़ रूपी उनकी तपस्थली में ले जाने के लिए पूछते हैं उसके उत्तर में पिता का यह कथन उनके निःस्वार्थ प्रेम को अभिव्यक्त करता है,

“हमीरगढ़ न जाणो रे! जठै राम है उठै ही अयोध्या।” इन्हीं वाक्यों के साथ पिता की पीड़ाओं और संघर्षो का अंत होता है और लेखक के पास कुछ बच जाता है तो पिता की स्मृतियाँ जो उनसे कोई नहीं छीन सकता। पिता  के बाद लेखक का सिर कुछ समय माँ के आँचल में छिपा रहा। माता के प्रति लेखक का स्वभाव आद्यंत छोटे से बच्चे के समान ही रहा। अपनी माँ के साथ उनकी हंसी मज़ाक हमेशा चलती रही। यद्यपि माँ पढ़ी लिखी नहीं थी पर उनके पास अनुभवजन्य ज्ञान था। उनका यह कथन इस बात का प्रमाण है, “बेटा, एक तो कदीं अभिमान न करणों। ध्यान राखजै धन को अभिमान व्है जावै। उस्यांनी ज्ञान को भी अभिमान व्है जावै। थारा काकासा के अभिमान भड़े ही नाँयो कदीं।” ये वाक्य लेखक के लिए अमर हो गए। माता की मृत्यु के पश्चात् अब लेखक के जीवन में परिवर्तन आ गया, अब उनके पास अपना एक भरा पूरा परिवार है जो स्थान कभी उनके माता पिता का था आज उस स्थान पर वे स्वयं हैं । समय का चक्र अनवरत चलता रहता है। वो रिश्ते जिनकी भौतिक उपस्थिति समय के साथ समाप्त हो जाती है वही रिश्ते नया रूप ले कर पुनः आ जाते हैं। यह प्रक्रिया विज्ञान के उस नियम के अनुरूप है जो कहता है कि ऊर्जा न तो उत्पन्न होती है और ना ही नष्ट, उसका रूपांतरण हो जाता है। नई पीढ़ी में घर बदल गया, अब अभाव के स्थान पर सम्पन्नता है पर बस उस सम्पन्नता में उनके बाई और काकासा की यादें ही शेष हैं। लक्ष्मी अर्थात धन और सरस्वती अर्थात बुद्धि दोनों का सामंजस्य ही जीवन को सफल बनाता है, धन तब ही उपयोगी है जब वह बुद्धि को पथभ्रष्ट न करे, व्यक्ति में यदि धन अहम् भाव उत्पन्न करे तो वह किसी काम का नहीं। लेखक ने बहुत सुन्दर ढंग से इसकी व्याख्या की है, “यह जीवन लक्ष्मी और सरस्वती के स्वभाव और वरदानों को बारीकी से समझकर चलने की कसौटी है। लक्ष्मी को तिरस्कार की दृष्टि से देखना भी मूर्खता है, और उसे जीवन की जड़ी समझना भी भयंकर भूल है। न तो धन में सुख है और न गरीबी में दुख है – सुख का निवास जीवन के विवेक में है।” वास्तव में जीवन तब ही सफल है जब वह सार्थक है। लेखक के माता पिता ने जिस प्रकार अपना और परिवार का पालन पोषण किया वह वास्तव में सुदामा के तप से भी कठिन था क्यूंकि यहाँ कोई द्वारिकाधीश नहीं थे जो उनको तीनों लोक सहर्ष दान में दे दें। ‘सुदामा का घर’ आज जिस फल का भोग कर रहा है इसमें सबसे बड़ा योगदान स्वयं सुदामा और उनके परिवार के परिश्रम का है न कि किसी और का।

Author

  • विनीत काण्डपाल वर्तमान में सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय, अल्मोड़ा से अपना शोधकार्य ‘राहुल सांकृत्यायन के आत्मकथा साहित्य’ पर कर रहे हैं। इन्होंने इससे पहले हिन्दू कॉलेज से हिंदी विषय में स्नातक और परास्नातक दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज से किया है। शोध के साथ  यह अलग – अलग विषयों पर अपना लेखन कार्य करते हैं ।

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