ଶୁକ୍ଳ ଶବର || शुक्ल सबर :

୧)ମୁଁ କଣ ଲେଖୁ ମୋ ମା ପାଇଁ…..
ସେ ତ ମତେ ଲେଖୁଛି……..
ଆଉ ତାହାକୁ କେମିତି ମୁଁ ଭୁଲି ପର…….
ଯିଏ ମତେ ଏ ଦୁନିଆ ଦେଖେଇଛି…
୨)ମା ରୁ ଛୋଟ ଶବ୍ଦ ନାହିଁ ଏ ଦୁନିଆରେ…
ତାରନୁ ବଡ଼ କିଏ ଅଛେ ବେଳେ କୁହ……
ଆଉ ପାଇବାବେଳେ ଖୁଜି ପକ ସାରା ଦୁନିଆରେ…..
ଯିଏ କି ତମକୁ ଭଲପାଉଛି ତମ ମା ଠାରୁ ବେଶୀ…..
୩)କାହାର ଗୋଡ଼ ର ଯଦି ଗୋଟେ ହାଡ଼ ଭାଙ୍ଗି ଯିବ କିଏ ଆଉ ଚାଲିପାରିବ….
ଦେହ ସବୁ ହାଡ ଭାଙ୍ଗିଗଲେ ଯେତିକି ଦରଦ ହୁଏ….
ତମକୁ ଜନ୍ମ ଦେଲା ବେଳେ ତମ ମା କୁ ହେତକି ଦରଦ ହୁଏ..
୪)ମନେ ରଖ ଗୋଟିଏ ଭଲ ମା ସମସ୍ତଙ୍କ ପାଖେ ଥାଏ….
ହେଲେ ସବୁ ମା ପାଖେ ଭଲ ସନ୍ତାନ ନ ଥାଏ…..
ମା ବିନା ଏ ଦୁନିଆ କେମିତି ଯେ ତାହାକୁ ପଚାର ଯାହା
ପାଖେ ମା ହିଁ ନଥାଏ……..

इस ओडिया कविता का सारांश हिंदी में इस प्रकार है:

यह कविता माँ के कष्ट, प्रेम और बलिदान को उजागर करती है, जो उसे हर किसी से अलग और अनमोल बनाता है। कविता में कवि अपनी माँ के प्रति गहरी श्रद्धा और प्यार व्यक्त कर रहा है। वह कहता है कि वह अपनी माँ के लिए क्या लिखे, क्योंकि माँ खुद ही उसे हर पल लिख रही है। माँ ही है जिसने उसे इस दुनिया का सच दिखाया है, और उसे इस प्यार को कभी भूलने नहीं दिया।

कवि कहता है कि इस दुनिया में माँ शब्द में छोटी लगती है पर माँ के प्यार के मुकाबले किसी और का प्यार कभी नहीं हो सकता। जब लोग माँ से दूर जाते हैं और दुनिया में सच्चा प्यार ढूंढते हैं, तो उन्हें समझ में आता है कि माँ का प्यार सबसे बड़ा होता है। वह यह भी कहता है कि अगर किसी के शरीर का एक हड्डी टूट जाए तो वह फिर से चल पाने में कितना दर्द होता है, लेकिन जब माँ अपने बच्चे को जन्म देती है, तो उसे क्या दर्द सहना पड़ता है, यह हम कभी नहीं समझ सकते। 

कविता माँ के अद्वितीय प्यार, बलिदान और महिमा को समर्पित है। माँ के बिना यह दुनिया कैसी होगी, यह सवाल कोई नहीं पूछता, क्योंकि माँ के बिना कुछ भी संभव नहीं।

Author

  • शुक्ल सबर / Shukla Sabar

    शुक्ल सबर, ओड़िशा के बलांगीर ज़िले के रामोड़ा गाँव से हैं। वे ओड़िशा राजिय-स्तरीय समाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और आदिवासी समुदाय और प्रव्सी मज़दूरों के मुद्दों को लेकर क्षेत्रीय समूह – ज़िंदाबाद संगठन के साथ जुड़कर समुदायों के हक़-अधिकारों के लिए कार्यरत हैं।

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