शैलेश सिंह:
महिला दिवस के दौरान मेरी मुलाकात एक नई साथी नाजिया बेगम से हुई, नाजिया की उम्र लगभग 18 साल के बीच की थी। नाजिया के घर में बहुत सख्ती होने के कारण वह पढ़ नहीं पाई थी। उसे बाहर आने जाने की आज़ादी नहीं थी। घर में उसके भाई और उसके पिता बाहर आने-जाने पर रोक-टोक लगाते थे। महिलाओं को लेकर उनकी सोच यह थी की महिलाएं ज़्यादा पढ़-लिखकर खराब हो जाती हैं। लेकिन नाजिया के मन में उथल-पुथल चलती रहती थी, कि मैं बाहर जाऊं, पढ़ाई शुरू करूँ और अपने आसपास की लड़कियों को भी शिक्षा से जोड़ पाऊं। उसका पढ़ने का मन बहुत था। नाजिया के घर में उनके पापा की बहुत चलती है। मुस्लिम लड़की होने के कारण नाजिया को ऐसा नहीं करना चाहिए, वैसा नहीं करना चाहिए और ऊपर से, मुस्लिम समुदाय से हो हमारे लिए सिर्फ उर्दू ही समझ आ जाए हम सीख लें, यही काफी है – ऐसी तरह-तरह की बातें सुनने को मिलती थी। नाजिया को उर्दू में आठवीं कक्षा तक पढ़ाया गया और फिर घर बैठा दिया गया, लेकिन उसे पढ़ने में मन लगता था। उर्दू के अलावा और भी किताबों को देखने-पढ़ने और समझने के लिए नाजिया का मन डोलता था। पर उसे उसके पिता और भाई घर से बाहर जाने नहीं देते थे। और ना ही किसी से ज़्यादा बातचीत करने देते थे। नाजिया तीन बहनें थी, किसी को भी पढ़ने का हक़ नहीं था। उनके पापा उन्हें लड़की होने के कारण पढ़ने की अनुमति नहीं देते थे, कहते थे लड़के स्कूल जाते हैं, लड़कियां नहीं। दो बहनों ने कुछ नहीं कहा लेकिन नाजिया ने अपनी इच्छाओं को नहीं मारा और अपनी बात को रखने की कोशिश की, उसने अपने परिवार में बोला भी की मेरा एडमिशन करवा दीजिए। लेकिन नाजिया के पापा ने हाँ नहीं भरी, वह हमेशा लड़की होने का दावा दिखाते और वह डराते भी रहे, कि ज़्यादा पढ़ने की बात की तो खेतों में काम करवाऊंगा और जल्दी तुम्हारे लिए लड़का देखकर शादी भी कर दूंगा , फिर वहाँ जाकर पढ़ना और अपने मन की करना।
नाजिया एक दिन अपने घर पर बैठी थी, वह बहुत परेशान थी, चेहरा मुरझाया हुआ था… पढ़ने -खेलने और उम्मीद के दिन में ना उम्मीद जैसी भावनाएं उमड़-उमड़ कर आ रही थी, लेकिन घर वाले नहीं समझ रहे थे। घर पर इतना शासन रहता था, कि उसको बिना दुपट्टा सर पर डाले घर से निकलने नहीं दिया जाता था। वह इन सब कारणों से बहुत ज़्यादा परेशान रहती थी।
उनके पापा का कहना था लड़के ही घर के सब कुछ होते हैं। लड़कियां शादी करके चली जाएगी तो उनको पढ़ाकर क्या करें, यह सब सुनकर नाजिया को बहुत दुख हुआ। नाजिया मन ही मन खुद से ही पूछने लगी कि क्या लड़की होना इतना बड़ा गुनाह है?? कि वह समाज में एक अच्छी शिक्षा ग्रहण करके सम्मान से जीवन जी सके क्या उसे और बाकी लड़कियों को इतना भी हक़ नहीं है??
मेरे घर वाले ही मेरे दुश्मन क्यों बने हैं…
वह सोच रही थी क्या लड़की होना इतना पाप है। इसी बात से वो बहुत परेशान रहने लगी थी, जिससे वह अकेले बैठना, चुप रहना और हमेशा कुछ सोचते रहना इस तरह की गतिविधियों मैं उलझी रहती थी।
और फिर धीरे-धीरे घर वालों ने उसकी दिमाग की स्थिति सही नहीं है, यह भी बोलना शुरू कर दिया। खैर उसे यह सब भी सुनना ही पड़ेगा, यह स्वीकार करते हुए नाजिया चुप होकर ये सब बातें इसी तरह से सहन करने लगी।
जब हमने समुदाय में सिलाई सीखने को लेकर कार्य की शुरुआत की तो हमने लड़कियों के साथ मीटिंग करना शुरू किया, जिसमें नाजिया को भी बुलाया। कई बार बुलाने पर भी नाजिया नहीं आई। फिर हमने नाजिया के घर पर जाकर उससे मिलने की कोशिश की, जिससे घर वालों का यह जवाब मिला की उसकी तबीयत ठीक नहीं है और वह नहीं जाएगी। और ऐसे लगातार कोशिश के दौरान एक दिन हम लोगों ने रविवार लाइब्रेरी के दौरान फिर से नाजिया को जोड़ने की कोशिश की। उस दिन नाजिया रविवार लाइब्रेरी में नाजिया आई और सारी बातों को चुपचाप सुनती रही। उसने लाइब्रेरी में रखी किताबों में से एक किताब उठाई, जिसका नाम था ‘खिचड़ी’। उसे पढ़ते हुए उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। यहाँ उसे किताबों की दुनिया के ज़रिए अलग-अलग जगहों के बारे में जानने और इतिहास के बारे में पढ़ने का मौका मिला। यहीं से उसकी पढ़ाई में रुचि फिर से जाग उठी और नई चीज़ें सीखने की उसकी चाह बढ़ने लगी।
इसके बाद नाजिया लगातार जुड़ने की कोशिश करने लगी और उसका जुड़ाव सिलाई सेंटर, पुस्तकालय, पर्यावरण और संविधान के मूल्यों को जानने, समझने और उन्हें अपने जीवन में अपनाने से शुरू हुआ। धीरे-धीरे नाजिया ने किताबों को अपने पास रखना और जमा करना शुरू कर दिया। इसी से उसने अपने आस-पास की किशोरियों के लिए ‘घर-घर लाइब्रेरी’ की शुरुआत की। अब नाजिया समुदाय के लोगों के साथ मिलकर विज्ञान, बच्चों की कहानियों, पर्यावरण और संविधान जैसे अलग-अलग विषयों पर समझ बनाने के लिए किताबों का वितरण करती हैं। इसके साथ ही नाजिया हफ्ते में एक बार सबके साथ बैठकर यह भी जानती है कि उन्होंने क्या सीखा और कैसे समझा, और उनका फीडबैक लेती है। इन सब कामों को करते-करते नाजिया को खुद भी पढ़ने-लिखने का मौका मिला और घर व समुदाय के लोगों से सम्मान भी मिलने लगा।
फिर नाजिया ने अपने परिवार में दोबारा से बात करने की कोशिश शुरू की। उसने घर पर अपने पापा से बात की और बहुत सहजता से अपनी बात रखी। नाजिया ने कहा, “अगर हम पढ़ेंगे तो आपका ही नाम रोशन होगा।” उसने अपने पापा को आसपास के उदाहरण भी दिए। उसने गाँव की दूसरी लड़कियों के बारे में बताया, “देखो, सब लोग अपनी बेटियों को पढ़ा रहे हैं। पढ़ाई से कितने फायदे होते हैं, और पढ़ाई न करने से क्या नुकसान होता है।”
नाजिया ने अपने पापा से कहा, “आप भी हमें पढ़ाइए। हम भी कुछ बनकर दिखाएंगे। यह बिल्कुल सच नहीं है कि मुस्लिम समुदाय की लड़कियां ज़्यादा पढ़ नहीं सकतीं या समाज में बाहर निकलकर नौकरी नहीं कर सकतीं और आत्मसम्मान से नहीं जी सकतीं।” नाजिया ने बगल के गाँव की रेशमा का उदाहरण दिया। उसने कहा, “रेशमा भी हमारी ही तरह है। वह भी लगातार समूह के कामों में जुड़ी रहती है। गाँव में चल रहे यूथ अड्डे पर भी आती है और अपनी समझ बढ़ा रही है। इन्हीं कामों के दौरान उसने अपनी पढ़ाई भी शुरू की थी और अब वह B.A. पास कर चुकी है।”
और पापा आप भी उनसे बहुत सम्मान से बात करते हैं और उनकी तारीफ़ भी करते रहते हैं, तो मेरे लिए ही क्यों इतनी बंदिशे हैं। नाजिया के पापा ने अपनी बेटी की बातों को सुना और शुरुआत में सुनकर अनसुनी किया; लेकिन एक हफ्ते बाद नाजिया का एडमिशन करवाने के लिए राजी हो गए।
नाजिया ने अपनी पढ़ाई की शुरुआत नवीं कक्षा से शुरू की है। और अभी वह पढ़ाई के साथ-साथ समूह में जुड़कर समूह का भी कार्य देख रही हैं। अब वही नाजिया स्वयं सहायता समूह से जुड़कर महिलाओं के लिए नए रास्ते बनाने का कार्य कर रही है। और खुद भी साथ-साथ पढ़ाई करते हुए सरजू फाउंडेशन किशोरी रिसोर्स सेंटर से लगातार जुड़कर घर-घर लाइब्रेरी की प्रक्रिया जैसे बदलाव का कार्य कर रही है।

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