सूर्यकांत गिरि:
तुम तो एक पहेली हो, मैं कैसे तुमको सुलझाऊँ।
नीरव रजनी में जगने पर, मैं कैसे मन को बहलाऊँ ।।
मैंने तो बस इतना जाना, तुम से रिश्ता अंजाना।
तुम उत्सुक रही सदा, करती रहती हो मनमाना ।।
तुम बरसात आग विरह की, कैसे उसे बुझाऊँ।
नीरव रजनी में जगने पर, मैं कैसे मन को बहलाऊँ।।
तेरी निसंकोच बातें, तेरा मृदुल निश्छल व्यवहार।
तेरे मनमोहक भावों पर, रह रह कर आता है प्यार।।
कैसे करूँ नियंत्रण खुद पर, कैसे उद्गार छिपाऊँ।
नीरव रजनी में जगने पर, मैं कैसे मन को बहलाऊँ ।।
तुम केवल मेरे अपने ही हो, इस का एहसास करा दो।
असमंजस से ढके हुए, मन का आवरण हटा दो।।
ज्यों ज्यों प्रयत्न करूँ बचने का, त्यों त्यों फँसता जाऊँ।
नीरव रजनी में जगने पर, मैं कैसे मन को बहलाऊँ ।।

Leave a Reply