सिम्मी, जागृति और शकुन्तला : 

‘कर्ज़’ ये शब्द सुनते ही हमारे दिमाग में ऐसी छवि बन जाती है जिससे हर व्यक्ति घबरा जाता है। वैसे अगर हम कर्ज़ की बात करे तो पूरी दुनिया का कुल कर्ज़ 102 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गया है। जिसमें भारत इस लिस्ट में 7वें नंबर पर आता है। भारत पर 3,057 अरब डॉलर कर्ज़ है यह सुनकर अकसर हम चौंक जाते हैं और सोचते हैं कि किन कारणों की वजह से देश को इतना कर्ज़ लेना पड़ा होगा? वहीं अगर हम अपने परिवेश की बात करें तो परिवार की बढ़ती ज़रूरतों को इस महंगाई के दौर में पूरा कर पाना मध्यम और निम्न वर्ग के लिए मुश्किल हो रहा है। ऐसे में इन परिवारों को किसी न किसी से अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कर्ज़ व लोन लेना पड़ता है। जिसकी भरपाई पूरी ज़िंदगी करनी पड़ती है। 

भारत में मध्यम और निम्न वर्ग के लोग अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए और रोज़गार को आगे बढ़ाने के लिए बैंकों से लोन, सप्ताह समूह से लोन लेते हैं। भारत में लगभग कामकाजी पेशेवर के 77% परिवार कर्ज़ लेती है। समुदायों में बी सी खेलने का चलन भी है जिसमें लोगों का कहना है,कि वह किसी व्यक्ति से कर्ज़ नहीं ले रहे जिससे उन्हें कभी किसी से ताने नहीं सुनने को मिलता है। इस तरह के लोन लोगों को बहुत ही आसानी से मिल जाते हैं। जिसके लिए किसी कठिन प्रक्रिया का सामना भी नहीं करना पड़ता है। आज कल हर गाँव का परिवेश ऐसा होता जा रहा है की हर लोग माइक्रोफाइनेंस कंपनी के लोन से डूबे हुए हैं और कहीं ना कहीं इसमें सब के सब दुखी ही हैं।

माइक्रो फाइनेंस कंपनी का काम होता है आसानी से लोन देना। इनका प्रपंच होता है उद्यमी महिला को लोन देना है। जिससे लोन दूं वह कोई ना कोई बिजनेस करें, लेकिन वही बिजनेस ना करके गाँव के लोग अपने घरेलू खर्च में पैसे का इस्तेमाल कर लेते हैं फिर इनके बाद में किश्त नहीं देने पर काफी दिक्कतें आती हैं। गाँव में एक एजेंट आता है, एजेंट आपके 40 महिलाओं का एक ग्रुप बनाता है और उसे ग्रुप में सभी का आधार कार्ड, पैन कार्ड, फोटो कॉपी लेकर जाकर फाइनेंस कंपनी में मैनेजर के साथ महिलाओं की बात करवाता है। और आसानी से एक-एक महिला को तीस हज़ार का लोन पास होता है। लोन देने वाली कंपनी जैसे आरबीआई, एसबीआई, भारत ब्लू स्टार, एचडीएफसी बैंक और भी कई बैंक होती हैं, जो प्राइवेट कंपनियों को लोन देती हैं। एक गाँव में बहुत सारे ग्रुप बनाए जाते हैं और एजेंट को एक ग्रुप का लोन पास होने पर, और एक लाख के लोन पर उस एजेंट को एक प्रतिशत का कमीशन मिलता है। और उनकी शर्त यह होती है की सारी महिला को बराबर मासिक या साप्ताहिक किश्त देना होता है। उनकी शर्त होती है अगर आपके घर में किसी की डेथ हो जाती है तो मुर्दे को न देखकर, आपको आकर किश्त चुकाना होगा। आपके घर में अगर खाने की व्यवस्था नहीं हैं फिर भी हर हाल में किश्त चुकाना है। अपनी किश्त देते हैं अगर ऐसा न करने पर एजेंट उनके घर में जाते हैं और ऐसा वहीं पर बेइज्जत करते हैं लगता नहीं की मुर्दा मरा हुआ है। और अगर घर में खाना हो या ना हो उनको उनकी किश्त चाहिए। अगर इसी व्यवस्था में अगर उन्हें किश्त नहीं मिलती है तो सारी महिलाएं मिलकर किश्त को भर्ती हैं। एक महिला की किश्त सारी महिलाएं मिलकर भर्ती है। अगर जो महिला किश्त नहीं चुका पाती उस महीने का या उस सप्ताह तो इससे उन्हें वित्तीय बोझ, मानसिक तनाव और कानूनी कार्रवाई का भी सामना करना पड़ता है। एक सदस्य के किश्त ना देने से उसका प्रभाव सारे समूह पर पड़ता है और इससे सारे समूह को झेलना पड़ता है। इसमें अगर वह सदस्य जो किश्त नहीं दे पाती है उससे भी  सामाजिक तनाव और कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है और इससे कहीं ना कहीं उसके आत्म सम्मान को ठेस भी पहुंचती है। और ऐसे हालात में टूट कर गलत कदम भी उठाती हैं।

कभी-कभी ऐसा होता है कि जो महिला किश्त नहीं चुका पाती उसे लोन को देने के लिए घर के जेवर, बर्तन, अपने चलने वाले मोबाइल, साइकिल तक बेचकर लोन भर्ती हैं। ज्यादा डिप्रेशन के चलते महिला सुसाइड भी कर लेती हैं। आखिर में सहना सब महिलाओं को ही पड़ता है। लोन के पैसे पति लोग लेते हैं नाम महिला का होता है। समाज क़ानून महिला को ढूंढता है। कहीं न कहीं महिला जिम्मेदार होती है पति के कहने पर लोन उठा लेती है। इसी तरह से एक तरह की बीसी भी है, जो समाज में बहुत तेजी से चलन में है कि महिलाएं के बीच में समूह में 10 से 20 महिलाएं या 15 महिलाएं बीसी खेलती हैं। नंबर डाला जाता है, जिसका नंबर पहले आता है वह पहले नंबर को पहले पैसा दिया जाता है। और 15 महीने 20 महीने की प्रक्रिया के तहत यह सारा खेल चलता है। जो महिला पहले पैसा ले लेती है वह 20 महीने तक पैसे को थोड़ा-थोड़ा कर जितनी भी धनराशि होती है उसकी अदा करती है। अगर 2000 की बी सी चलेगी 20 महीने में तो 40000 पहले इंसान को दिया जाएगा, और वह 20 महीने तक दो ₹2000 जमा करेगा। अगर वह ₹40000 ले करके अगर कोई भी गोल्ड का सामान खरीद कर शादी ब्याह में जाती है और सोनार (ज्वेलर्स) से सोना खरीद कर लाती है। और धीरे-धीरे किसी का पैसा नहीं अदा कर पाती है तो इस सोने को फिर से वह ज्वेलर्स के पास जाकर के गिरवी रख देती है, और वहां से पैसे लेकर के बीसी अदा करती है। इस तरह की प्रक्रिया कई बार देखी गई है जो कि हर महीने भी बीसी के पैसे देने पड़ेंगे। इन सरी प्रक्रियाओं से महिलाएं मानसिक रूप से बहुत परेशान हो जाती हैं, क्योंकि उनके ऊपर एक तरह का हर महीने पैसे देने का जो प्रेशर होता है और फिर और लोगों को भी महीने में अगला पैसा देना होता है। 

यह चलन गाँव और शहर में बहुत तेजी से फैल रहा है। बीसी का चलन और एक दूसरे को महिलाएं इसमें जोड़ती हैं क्योंकि जितनी ज्यादा महिलाएं होंगी धनराशि उतनी ज्यादा बढ़ती जाएगी। कहीं – कहीं पर बोली की बीसी भी खेली जाती है।ये बीसी लाखों में खेली जाती है और इसमें पुरुष – महिलाएं दोनों शामिल होती हैं। ज्यादातर वह पुरुष होते हैं जो बिजनेस करते हैं जो इंसान पहली बीसी लेता है उसको कुछ कम पैसे दिए जाते हैं। जो इंसान आखिरी बीसी लेता है उसे ज्यादा धनराशि दी जाती है। पर इस खेल में कभी-कभी सुनने को मिला है कि कई इंसान बीसी लेकर भाग भी जाते हैं और लोगों का बहुत नुकसान भी हुआ है। यह सारी चीज एक तरह से इलीगल प्रेक्टिस है पर लोग समूह में यह सारी चीज कर रहे हैं। गाँव और शहर दोनों में यह सारी चीज बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं और लोगों को अपनी जरूरत के हिसाब से खेल भी रहे हैं।  इसमें काफी लोग डिप्रेशन में आ जाते हैं और मानसिक तौर से डिस्टर्ब भी हो जाते हैं। कई ऐसे केस में लोगों को अपने घर प्रॉपर्टीज को बेचना भी पड़ता है। 

ऐसा देखने को मिल भी रहा है पर लोगों को अपनी जरूरत के हिसाब से बिजनेस के लिए इस तरह के बीसी खेल रहे हैं। इसमें अगर बात करें तो आज के यंग किशोर इस तरह के छोटे-छोटे लोन ले रहे हैं या फिर सप्ताह समूह से पैसे ले रहें। जिससे नए फोन और बाइक स्कूटी लेते हैं, जिसकी किश्त वह एक से दो साल तक भरते हैं और इसका ब्याज भी भरते हैं। कई जगहों पर देखा गया कि यंग किशोर ऐसे समूहों से लोन लेते हैं जिससे वह सट्टा खेल सके जबकि यह ज्यादातर लोन अपने रोजगार को आगे बढ़ाने के लिए होता है। किशोरों में इसका क्रेज बढ़ रहा है जहां पर वे इस तरह का लोन लेकर आई फोन या फिर स्टालिश बाइक खरीद रहे हैं। ज्यादातर यह देखा गया है कि बच्चों की पढ़ाई और रोजगार के लिए नहीं बल्कि शादी,फोन बाइक खरीदने के लिए ऐसे लोन लेते हैं।

Authors

  • सिम्मी, फैज़ाबाद उत्तर प्रदेश से हैं। वह अवध पीपुल्स फोरम के साथ जुड़कर युवाओं के साथ उनके हक़-अधिकारों, आकांक्षाओ, महिलाओं के सवाल, शिक्षा, स्वास्थ्य, और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर काम करती हैं।

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  • जागृति, दिलकुशा फैज़ाबाद की रहने वाली हैं और 5 सालों से समुदाय में शिक्षिका के रूप में काम कर रही हैं। जागृति उन किशोरियों को पढ़ाने का काम करती हैं जो कई कारणों से स्कूल नहीं जा पाती या जिन को स्कूल छोड़ना पड़ता है। वे महिलाओं के कानूनी हक-अधिकारों को लेकर फैज़ाबाद के 10 समुदायों में अवध पीपुल्स फोरम के साथ काम करती हैं। जागृति ने एन.टी.टी किया है और संविधान मित्र मंडली के समूह का संचालन करती है। इनके साथ 500 किशोरियाँ जुड़ी है जो अपनी ज़िंदगी को शिक्षा के माध्यम से बेहतर कर रही है।

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  • शकुंतला भारती बहराइच जिले के रिसिया ब्लॉक से हैं। वह महिलाओं के साथ मिलकर हैंडक्राफ्टिंग के छोटे-छोटे कार्यों में जुटी हुई हैं और उन्हें बाजार से जोड़ने का कार्य करती हैं। इसके अलावा, वह किशोर बालिकाओं की शिक्षा के लिए महिलाओं के साथ जुड़ाव बनाने का कार्य भी करती हैं।

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