ज़ेबा वसी :

रात के 12 बजते ही ईद की मुबारकबाद के मैसेज आने लगे। अच्छा लगता है यह देखकर कि साल में कम से कम एक बार लोग याद कर लेते हैं कि हमें भी एक बधाई देनी चाहिए। लेकिन कुछ सालों से यह एहसास गहराता जा रहा है कि क्या यह बधाई सच में दिल से दी जाती है, या यह बस एक औपचारिकता भर है?  

ईद जैसे त्यौहार मुस्लिम समाज के लिए गहरे मायने रखते हैं। यह सिर्फ एक खुशी का दिन नहीं, बल्कि समुदाय की साझी पहचान, उनकी संस्कृति और अस्तित्व से जुड़ा होता है। लेकिन समाज में क्या यह खुशी सच में साझा की जाती है? क्या अल्पसंख्यकों के प्रति हमारी संवेदनशीलता सिर्फ इन त्योहारों तक सीमित है?  

त्योहारों पर एक दिन की बधाई देने से क्या हम यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि हम उनके साथ हैं? और अगर हम सच में उनके साथ हैं, तो बाकी दिनों में उनकी परेशानियाँ हमारी चिंताओं का हिस्सा क्यों नहीं बनतीं?  

हमें यह समझने की ज़रूरत है कि किसी समुदाय के साथ खड़े होने का मतलब सिर्फ उनके उत्सवों में शामिल होना नहीं, बल्कि उनके संघर्षों को भी महसूस करना है। उनके अधिकारों, अवसरों और न्याय के लिए उसी ऊर्जा के साथ खड़ा होना, जैसा हम अपने लिए चाहते हैं। हमें सभी समुदाय के लिए वैसे ही दिल से इज्ज़त देनी होगी जैसे हम अपने क़ौम वालों के साथ खड़े होते हैं। 

क्या हम उनकी सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक पहचान को सिर्फ त्योहारों तक सीमित रखते हैं, या उनके रोजमर्रा के संघर्षों को भी समझते हैं?

Author

  • ज़ेबा, बिहार- पटना की रहने वाली है और एक सामाजिक कार्यकर्ता है । वह पिछले 6 वर्ष से महिलाओं और बच्चों के मुद्दों पर कार्य कर रही है।

    View all posts

Leave a Reply

Designed with WordPress

Discover more from युवानिया ~ YUVANIYA

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading