लाल प्रकाश राही:
भारत में अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध चले 150 वर्षों के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के दौरान शहीद हुए लाखों भारतीय क्रांतिकारी शहीदों में “शहीद ए आज़म भगत सिंह” एक ऐसा नाम है जो आकाश में ध्रुव नक्षत्र के समान सदा के लिए प्रकाशमान है हो गया, सरदार भगत सिंह अपनी उच्च आदर्शवादी क्रांतिकारी, राजनीतिक, गतिविधियों की वजह से आने वाली पीढ़ियों के बीच क्रांतिकारी राजनीतिक पथ प्रदर्शक के रूप में सदैव विद्यमान रहेंगे।
भगत सिंह सरीखे क्रांतिकारियों को साम्राज्यवादी शासन ही नहीं बल्कि भारतीय दलाल सामंत वर्ग, दलाल पूंजीपति वर्ग के साथ ही साथ भारत का वह सामाजिक राजनीतिक वर्ग जो अंग्रेजी हुकूमत में हिस्सेदारी प्राप्त करने का महत्वाकांक्षी था,अपना दुश्मन मानता था। यहां तक की कांग्रेस के अनेक सदस्य भी भगत सिंह और उनके साथियों की क्रांतिकारी राजनीतिक गतिविधियों और उनके विचारों की पुरजोर मुखालफत करने से पीछे नहीं हटते थे। गांधी जैसे राष्ट्रीय नेता ने भी भगत सिंह जैसे विचारवान अद्भुत तर्कशील, देशभक्त, वैज्ञानिक समाजवादी को कभी भी उतना महत्व नहीं दिया, जिसके वह हकदार थे। इतना ही नहीं गांधी जी ने तो भगत सिंह और उनके साथियों को कुछ सिर फिरे आजादी के रास्ते में रोड़े अटकाने वालों की श्रेणी में रखा।
गांधी की सबसे बड़ी अदूरदर्शिता यह भी थी कि गांधी अंग्रेजों को भारतीयों और भारत का शुभचिंतक मानते थे। जबकि वास्तविकता इसे बिल्कुल अलग थी अंग्रेज हमेशा भारतीयों पर जुल्म ढाने और भारत की प्राकृतिक संपदा और भारत की श्रम संपदा को लूटकर ले जाने में ही लग रहे, सच कहा जाए तो अंग्रेजों ने भारत और भारतवासियों का कभी भी हित नहीं चाहा, लेकिन गांधी तो जैसे अंग्रेजो की भक्त ही बने बैठे थे ।
गांधी जी को यह भ्रम था कि वे अपने अहिंसा और सत्याग्रह के बल पर अंग्रेजों का हृदय परिवर्तन कर देंगे और अंग्रेज भारत को आजाद कर देंगे पर गांधी का यह भ्रम बहुत ही जल्द टूट गया ।
देश की जनता का कांग्रेस और गांधी जी पर से विश्वास उठने लगा था। अंत में गांधी जी को 1942 में भारतीय जनता से “करो या मरो” के आह्वान के साथ “अंग्रेजों भारत छोड़ो” आंदोलन की घोषणा करनी पड़ी। इस घोषणा के बाद गांधी समेत कांग्रेस के सभी राष्ट्रीय नेता गिरफ्तार कर जेल में डाल दिए गए और यह आंदोलन जनता का स्वतः स्फूर्त आंदोलन बन गया। जिसमें किसान, मजदूर, दस्तकार, समेत लाखों लाख की संख्या में छात्रों – नौजवानों ने खुलकर हिस्सा लिया इतना ही नहीं हजारों लोगों को अंग्रेजों की गोलियां खानी पड़ी। देश की जनता ने अंग्रेजी सरकार के जेलों को भर दिया। आंदोलनकारियों को रखने के लिए कहीं भी जगह नहीं बची अंत में अंग्रेजों ने एक समझौते के तहत देश की जनता की बागडोर देश के दलाल सामंतो, जमींदारों और देशी दलाल पूंजीपतियों की सरपरस्त कांग्रेसियों के हाथों में 15 अगस्त 1947 को सौंप कर अपने देश वापस लौट गये।
भगत सिंह ने अपनी फांसी से कुछ समय पहले यह भविष्यवाणी की थी कि आज से करीब 15 से 20 वर्ष बाद देश आजाद होगा लेकिन वह आजादी देश की जनता की वास्तविक आजादी नहीं होगी बल्कि देशी पूजींपतियों, सामंतों जमींदारों के साथ ही साथ विदेशी – पूजीपत्तियों, साम्राज्यवादियों के सरपरस्त दलालों की आजादी होगी तथा वही देश के समस्त सामाजिक आर्थिक व्यवस्था के संचालक होंगे।
वे देश की जनता पर शासन करेंगे और सामाजिक प्राकृतिक संपदा के साथ ही साथ देश की सर्वहारा जनता के श्रम का शोषण करेंगे। भगत सिंह की यह भविष्यवाणी पूर्णतः सत्य सिद्ध हुई। आज भगत सिंह की कही हुई बात देश की जनता महसूस कर रही है, भगत सिंह कांग्रेस के चरित्र के साथ-साथ इस देश के शासक वर्ग की मानसिकता को अच्छी तरह समझ चुके थे। वह जान चुके थे कि इस देश का शासक वर्ग क्रांतिकारी समाजवादी रास्ते पर चलकर देश की आजादी का हिमायती नहीं था, क्योंकि यह रास्ता उनके हित में नहीं था ।
भगत सिंह ने यह बात हिंदुस्तान सोशलिस्ट प्रजातांत्रिक संघ के घोषणा पत्र में ही साफ कर दिया था कि भारतीय पूंजीपति वर्ग देश की जनता को धोखा देकर विदेशी पूंजीपतियों से इस धोखे की कीमत के रूप में सरकार में कुछ हिस्सा प्राप्त करना चाहता है। इसी कारण मेहनतकश जनता की तमाम आशाएं अब सिर्फ समाजवाद पर टिकी है और समाजवाद पूर्ण स्वराज स्थापित करने में और भेदभाव समाप्त करने में सहायक सिद्ध होगा। देश का भविष्य अब नौजवानों के हाथों में है भगत सिंह अपने छोटे से क्रांतिकारी जीवन में समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र, धर्म शास्त्र, दर्शन शास्त्र, इतिहास, साहित्य इत्यादि विषयों के साथ-साथ समाज और राजनीति में घटित होने वाली तमाम छोटी बड़ी घटनाओं पर अपनी पकड़ मजबूत कर चुके थे। जो किसी न किसी रूप में भारतीय समाज और राजनीति पर अपना प्रभाव छोड़ती थी।
भगत सिंह ने बम का दर्शन, भारतीय क्रांति का आदर्श, ड्रीमलैंड की भूमिका, मैं नास्तिक क्यों हूं, धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम, सांप्रदायिक दंगे और उनका इलाज, अछूत समस्या, सत्याग्रह और हड़तालें, विद्यार्थी और राजनीति, युवक, जैसे दर्जनों लेख लिखे जो तत्कालीन समाचार पत्र पत्रिकाओं में भगत सिंह के छद्म नाम से प्रकाशित होते रहते थे। जो विभिन्न विषयों पर भगत सिंह की गहरी समझ को दर्शाते हैं, भगत सिंह धार्मिक सामाजिक आंदोलन तथा विश्व राजनीति की गहरी समझ रखते थे।
अध्ययन की यही पर तत्परता और लगन भगत सिंह को देश के तमाम क्रांतिकारियों से अलग करती है और शहीद ए आज़म की उपाधि को सार्थक साबित करती है।
भगत सिंह एक अद्भुत शख्सियत के धनी थे जिन्हें ना तो अंग्रेजी हुकूमत पचा पा रही थी और ना ही कांग्रेस पार्टी मजे की बात यह है कि क्रांतिकारियों की आलोचना करने में कांग्रेसी अंग्रेजों से दो कदम आगे रहते थे। कांग्रेस पार्टी ने क्रांतिकारियों के खिलाफ देश भर में एक फरमान जारी किया था जिसमें साफ तौर पर कहा गया था कि पार्टी का कोई भी नेता कार्यकर्ता सदस्य तथा पार्टी में आस्था रखने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसे किसी भी व्यक्ति से किसी भी तरह का संबंध नहीं रखेगा। और ना ही ऐसे लोगों को किसी भी तरह की सहायता देगा जो अपने आप को क्रांतिकारी कहते हैं, और हिंसा में विश्वास रखते हैं। ऐसे ही अनेक कारण थे जिससे देश के क्रांतिकारियों को अपनी गतिविधियों को सतर्कता पूर्वक अंजाम देना पड़ता था।
भगत सिंह कांग्रेस की इन नीतियों को अच्छी तरह समझ रहे थे और महसूस कर रहे थे फल स्वरुप भगत सिंह ने देश भर में बिखरे क्रांतिकारियों और क्रांतिकारी संगठन को एक सूत्र में बांधने का काम किया। रूस की समाजवादी क्रांति तथा मार्क्सवाद के गहन अध्ययन के बाद संगठन का नाम बदलने और संगठन की कार्यशैली में व्यापक स्तर पर फेर बदल करने का निर्णय भगत सिंह का ही था। जिसके उपरांत 8 सितंबर 1928 को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला के किले में गुप्त मीटिंग बुलाई गई जिसमें पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल व महाराष्ट्र के कई क्रांतिकारी साथियों ने भाग लिया। इस मीटिंग का मुख्य उद्देश्य क्रांतिकारी संगठन का नाम “हिंदुस्तान प्रजातांत्रिक संघ” से बदलकर “हिंदुस्तान सोशलिस्ट प्रजातांत्रिक संघ रखना था। और संघ को व्यापक जनता से जोड़कर देश की आजादी की लड़ाई लड़ना था। अब संघ छोटी- छोटी डकैतियों के बदले सरकारी खजाने को लूटने और लूटे गये पैसों से गरीबों की सहायता करने संघ के कार्य को आगे बढ़ने का काम करने लगा था। भगत सिंह की जीवनी पुस्तक में भगत सिंह के सहयोगी साथी रहे जतिंद्र नाथ सान्याल ने लिखा है कि हिंदुस्तान सोशलिस्ट प्रजातांत्रिक संघ के गठन से पहले ही भगत सिंह के वैचारिक धरातल में क्रांतिकारी परिवर्तन हो चुका था, वह समाजवाद और अंतरराष्ट्रीयतावाद के कट्टर पुजारी हो गए थे।
सच कहा जाए तो भगत सिंह अपने जीवन में साम्यवाद अपना चुके थे, अब भगत सिंह अनुशासित एवं सुनियोजित तरीके से साम्यवाद के सिद्धांतों के आधार पर अपनी हर गतिविधि को अंजाम देते थे। 8 अप्रैल 1929 को देश की नेशनल असेंबली में बम फेंकना और क्रांतिकारी विचारों से युक्त लाल पर्चा इन्हीं विचारों और सिद्धांतों का परिणाम था।
अपनी फांसी के अंतिम दिनों में जेल से नौजवानों को भेजे गए संदेश में भगत सिंह ने कहा था आज मैं देश के छात्रों नौजवानों से पिस्तौल और बम उठाने को नहीं कहूंगा आने वाले समय में कांग्रेस देश की आजादी के लिए जबरदस्त लड़ाई की घोषणा करने वाली है। जिससे देश के छात्रों और नौजवानों के कंधे पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी आन पड़ेगी।
नौजवानों को क्रांति का यह संदेश देश के कोने-कोने तक पहुंचाना है, फैक्ट्री कारखाने में गंदी बस्तियों में, गांव की जर्जर झोपड़िया में रहने वाले करोड़ों करोड़ लोगों में क्रांति की अलख जगानी होगी। तब कहीं जाकर देश में आजादी आएगी और “एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण संभव हो जाएगा” पंजाब वैसे ही राजनीतिक तौर पर पिछड़ा हुआ माना जाता है। इसकी भी जिम्मेदारी युवक वर्ग पर ही है आज देश के प्रति अपनी श्रद्धा और शहीद जितेंद्र नाथ दास सान्याल से प्रेरणा लेकर यह सिद्ध कर दें की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष में भी वे दृढ़ता से टक्कर ले सकते हैं।
विद्यार्थियों नौजवानों के नाम भगत सिंह का यह संदेश उग्रवादी क्रिया कलापों से अलग कर उन्हें एक दार्शनिक क्रांतिकारी के रूप में स्थापित करता है। देश की व्यापक जनता के साथ जुड़कर देश में अंग्रेजी गुलामी से मुक्ति दिलाने के ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में समाजवाद की स्थापना कर मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त करने के हिमायती थे। उनके यही विचार उन्हें विश्व दृष्टिकोण प्रदान करते हैं भगत सिंह में अध्ययन की एक उत्कट लालसा थी और यही लालसा उन्हें एक दार्शनिक, राजनीतिक और समाजशास्त्री की श्रेणी में लाभ लाकर खड़ा करती है। संघर्षों से भरे अपने छोटे से जीवन में उन्होंने दुनिया भर के दार्शनिको, राजनीतिज्ञों, समाजशास्त्रियों और वैज्ञानिकों का अध्ययन किया और नोट्स इकट्ठा किया। भगत सिंह की बुद्धिजीविता दूरदर्शिता और जनमानस के प्रति असीम प्रेम उनको भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर के तमाम क्रांतिकारी सामाजिक चिंतकको, बुद्धिजीवों के ऊर्जा के स्रोत के रूप में सदैव के लिए स्थापित कर दिया भगत सिंह इसीलिए पूरी दुनिया में एक विचारवान दार्शनिक और साम्यवादी क्रांति के पक्षधर के रूप में देखे जाते हैं।
आज भी भगत सिंह को देशभर के तमाम क्रांतिकारी विचारधारा में विश्वास और आस्था रखने वाले लोग अपनी प्रेरणा के स्रोत में देखते हैं अपना आदर्श मानते हैं आज भी भगत सिंह के वैज्ञानिक चेतना से लैस क्रांतिकारी विचारधारा की जरूरत है आज युवाओं को भगत सिंह को अधिक से अधिक पढ़ना चाहिए और उनके विचारों को आत्मसात कर एक नई दुनिया बनाने के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

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