कोर्दुला कुजूर :

झारखंड के आदिवासी (उरांव) समुदाय में जतरा मनाने की परंपरा बहुत पुरानी है, आम तौर पर धान रोपाई के बाद भादो एकादशी को करम त्योहार मनाने के बाद जतरा का सिलसिला शुरू होता है। इस दौरान लोग व्यक्तिगत और सामूहिक रुप से नाचते गाते एक गाँव से दूसरे गाँव जाते हैं। आमतौर पर जहाँ जतरा नाचा जाता है वहाँ जतरा खूंटा होता है जिसके चारों तरफ परिक्रमा करते हुए लोग खोड़हा में नाचते हैं। उरांव समुदाय इसे  त्योहार के रुप में मनाते हैं। यह लोगों के मिलने-जुलने और आनन्द मनाने का स्थान होता है। कईं बार लोग जतरा और मेला को एक ही समझते हैं, किंतु ऐसा नहीं है। जतरा का मतलब होता है कि लोग समूह में नाचते-गाते हैं जिसे घोल कहते हैं, इस घोल में सभी उम्र के लोग शामिल होते हैं और सभी अपने-अपने खोड़हा (समूह) में नाचते हैं। 

मेला में हर तरह के चीज़ों की दुकानें सजती है जहाँ सभी जाति समुदाय के लोग खरीद-बिक्री करते हैं। 

दशहरे के सप्ताह दिन बाद मुड़मा जतरा होता है, उसके बाद सोहराई जतरा शुरू हो जाता है। कुछ जतरा गाँव स्तर पर मनाया जाता है और कुछ जतरा पड़हा के हिसाब से आयोजित होता है। सोहराई जतरा को लोग गाँव स्तर से आयोजित करते हैं। कार्तिक पूर्णिमा को कई जगह देव उठान जतरा का आयोजन होता है। इसके बाद डाइर जतरा और अगहन जतरा होता है। ये दोनों जतरा दोन खेत के फसल तैयार होने और कटने पर मनाया जाता है। ऐसे देखा जाए तो सभी तरह के जतरा सांस्कृतिक होते हैं, जहाँ लोग अपने-अपने खोड़हे के साथ नाचते हुए जतरा खूंटा (मैदान) तक आते हैं, एक-दूसरे से मिलते हैं, आनन्द मनाते और पुनः नाचते-गाते वापस लौट जाते हैं। कुड़ुख़ (उरांव) समुदाय का दो महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक जतरा, मुड़मा और बेड़ो पड़हा जतरा है, उसका जिक्र नीचे किया जा रहा है। पहले और अभी भी, ग्रामीण इलाकों में शादी के लिए लड़की और लड़का देखने का काम जतरा में ही होता था। उसके बाद ही पसंद होने पर सूत बंधनी के लिए लड़की का घर जाते थे।

समय के साथ यह रिवाज अब धीरे-धीरे खत्म होने लगा है। वैसे जतरा कई तरह के होते हैं –

  • मुड़मा जतरा 
  • दसई जतरा 
  • सोहराई जतरा
  • देव उठान जतरा 
  • ईंद जतरा 
  • अगहन जतरा
  • डाईर जतरा 
  • जेठ जतरा और 
  • पड़हा जतरा।

इन सभी जतरों के अलग-अलग महत्व हैं। इन जतरों में लोग अपने गाँव और खोड़हा का अथवा अपने पड़हा का प्रतीक चिन्ह के साथ अपने-अपने सांस्कृतिक टोली के साथ नाचते-गाते हुए जतरा मैदान तक जाते हैं।

मुड़मा जतरा झारखंड राज्य के छोटानागपुर में आयोजित होने वाला वार्षिक आदिवासी मेला है, जिसका आयोजन दशहरा के सप्ताह दिन बाद किया जाता है। यह राँची से लगभग २८ किलोमीटर दूर राँची-डाल्टेनगंज मार्ग पर स्थित मुड़मा गाँव में आयोजित होता है। इतिहास हमें बताता है कि जब उरांव आदिवासी लोग रोहतास गढ़ से पराजित होकर छोटानागपुर की धरती में पधारे, तब यहाँ मुंडाओं का अधिपत्य था। उरांव समुदाय ने मुंडा राजा से यहाँ रहने के लिए अनुमति मांगी। इस दौरान दोनों समुदायों के बीच समझौता किया गया और कहा गया कि आप लोग पश्चिम की ओर बसिए। इस क्रम में, उस क्षेत्र में रहने वाले मुंडा लोग, उस क्षेत्र को छोड़कर दक्षिण की ओर शिफ्ट हो गए।

इस जतरा का कोई लिखित प्रामाण तो नहीं मिलता है, लेकिन लोकगीतों एवं कथाओं में इसका जिक्र निहित है। उरांव समुदाय ने जंगल, झाड़ को साफ कर और गढ़ा-ढोड़हा को समतल कर रहने लायक बनाया और पश्चिम दिशा में रच-बस गए। उसी की यादगारी में उराँव समुदाय के ४० पड़हा के लोग उस ऐतिहासिक समझौते की स्मृति में ‘मुड़मा जतरा’ मनाते हैं। 

इस दिन ४० पड़हा के पाहन शक्ति के प्रतीक जतरा खूंटा की परिक्रमा कर, जतरा खूंटा की पूजा करते हैं। 

सभी पड़हा के पाहन (पुजारी) झंडे के साथ जतरा स्थल पर अपने समूह के साथ नाचते-गाते आते हैं और जतरा स्थल पर पाहन लोग पारम्परिक रूप से सरगुजा (जटंगी) के फूल सहित अन्य पूजन सामग्रियों के साथ धरमेस (भगवान) का आहवाहन करते हुए ‘जतरा खूँटा’ की पूजा करते हैं और प्रतीक स्वरूप दीप भी जलाते हैं। इस पूजन में सफ़ेद एवं काला मुर्गा की बलि भी चढ़ाई जाती है और इस प्रकार जतरा का शुभारंभ किया जाता है।

गाँव के सभी लोग लकड़ी से बने अपने टोटेम और प्रतीक चिन्ह रंपा-चंपा, बाघ, घोड़ा, हाथी, मगरमच्छ, नाव, शेर, मछली, छाता और अन्य समुदायिक प्रतीकों के साथ नाचते-गाते और शक्ति स्थल की परिक्रमा करते हैं। इस दौरान लकड़ी के बने घोड़े को सजाकर पड़हा राजाओं को उसमें बैठाकर नचाया जाता है। जतरा खूंटा को यहाँ के उरांव आदिवासी अपना शक्ति पीठ मानते हैं। 

मुड़मा गाँव उरांव तथा मुंडा आदिवासी समुदायों का मिलन स्थल है। इस मेले में सभी समुदाय के लोग आते हैं और सुख-समृद्धि व शांति की कामना करते हैं। इस जतरा में आदिवासी समुदाय के प्रतिदिन काम आने वाली सामग्रियां तथा उनके संस्कृति से जुड़ी सभी चीजें मिलती है। पारंपारिक कपड़े, मांदर, नगाड़ा, ढोल, ढांक, कुमनी (मच्छली फंसाने का औजार) जाल और बहुत सारी चीज़ें खरीदने के लिए लोग बहुत दूर-दूर से आते हैं। इन सारी चीज़ों के लिए भी यह जतरा बहुत प्रसिद्ध है।

बारीडीह पड़हा जतराः – रांची से लगभग ४० कि.मी. दूर बेड़ो बारीडीह बगीचा में, प्रत्येक वर्ष केंद्रीय पड़हा संचालन समिति की अगुवाई में ०१ जून को पड़हा जतरा का आयोजन किया जाता है। इस जतरा में २२ पड़हा के लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा, पड़हा झंडे के प्रतीक चिन्ह, लकड़ी से बने घोड़े, हाथी, रंपा-चंपा, टेंगरा, छाता व खोड़हा नृत्य दल के साथ गाजा-बाजा लेकर आते हैं। सांस्कृतिक दल मंच के समीप पहुँचते ही विशाल जनसभा में तब्दील हो जाती है। वहाँ पहुँचने पर पड़हा राजा और पड़हा व्यवस्था के अगुवाओं को अंग वस्त्र देकर सम्मानित किया जाता है। लगभग ९० वर्षीय पड़हा राजा पद्मश्री सिमोन उरांव का इस जतरा को संभालने और अभी तक सफलता पूर्वक चलाने में बहुत बड़ा योगदान है। 

इस जतरा का मूल उद्देश्य इस बदलते परिवेश में पूर्वजों द्वारा दिए गए पड़हा समाज, पारंपारिक स्वशासन व्यवस्था, आदिवासी संस्कृति और परंपरा को बचाना है। पड़हा व्यवस्था ही समाज के सभी वर्गों को एक साथ जोड़कर रखती है।

वर्तमान समय में, अपनी परंपरा, संस्कृति और भाषा को बचाए रखने में ही हमारी पहचान है, जिसमें सभी तरह के जतरा का अहम रोल होता है।

Author

  • कोर्दुला कुजूर आदिवासी एक्टिविस्ट हैं और रांची, झारखंड में रहती हैं। महिलाओं और बच्चों के सवालों पर वह लंबे समय तक काम करते आ रही है और झारखंडी आदिवासी वुमेन्स एसोशियन शुरुआत करने में प्रमुख भूमिका निभाई हैं। साथ ही झारखंडी आदिवासियों के भाषा आंदोलन के सहभागी बनकर कुड़ुख भाषा को बचाए रखने का महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आयी हैं।

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