विकास द्वारा संकलित :
रोहिणी गोडबोले, भारतीय विज्ञान संस्थान की प्रसिद्ध भौतिकविद्, का नाम कण भौतिकी और लैंगिक समानता के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए हमेशा याद किया जाएगा। पद्मश्री से सम्मानित प्रोफेसर रोहिणी एम गोडबोले का 25 अक्टूबर 2024 को निधन हो गया था। वह 71 साल की थीं और लंबे समय से बीमार थीं। उनकी अपने जीवन के आखिरी दिन तक वे विज्ञान और न्याय के लिए लड़ती रहीं। उनका शोध और उनकी लैंगिक समानता की पहल, दोनों ही उनके जीवन के केंद्र में थे। उन्होंने विज्ञान और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में वह संतुलन साधा, जो किसी भी महिला वैज्ञानिक के लिए चुनौतीपूर्ण है, विशेष रूप से भारत में।
विज्ञान के क्षेत्र में उपलब्धियां
1952 में जन्मीं रोहिणी ने एक ऐसी पारिवारिक पृष्ठभूमि से शिक्षा प्राप्त की जहाँ महिलाओं को हमेशा सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। 12 साल तक मुंबई विश्वविद्यालय में लेक्चरर के रूप में कार्य करने के बाद, उन्होंने शोध के क्षेत्र में कदम रखा और 1995 में भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु से जुड़ीं। इसी संस्थान में उन्होंने अपने जीवन का अधिकतर समय बिताया और कई उपलब्धियां हासिल कीं। उनके द्वारा किए गए “ड्रीज़-गोडबोले प्रभाव” का प्रयोग कण कोलाइडर के नए डिज़ाइनों में हुआ, जिससे उन्हें भौतिकी के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली। विज्ञान में उनके योगदान के लिए उन्हें भारत की तीन प्रमुख विज्ञान अकादमियों में चुना गया। पद्मश्री के अलावा 2021 में फ्रांस सरकार ने उन्हें “ऑर्ड्रे नेशनल दू मेरिट” से भी सम्मानित किया।
लैंगिक समानता के लिए संघर्ष
वैज्ञानिक जगत में लैंगिक असमानता के मुद्दे को भी उन्होंने सक्रियता से उठाया। 2000 के दशक में, जब विज्ञान सम्मेलनों में लैंगिक समानता पर चर्चा आम नहीं थी, तब रोहिणी ने भारतीय विज्ञान अकादमी से इस मुद्दे पर बात करने की पहल की।
इस विषय पर गंभीरता से काम करते हुए, उन्होंने अनेक रिपोर्टें और सर्वेक्षणों का सह-लेखन किया, जो महिलाओं की वैज्ञानिक संस्थानों में घटती संख्या के कारणों को उजागर करती हैं। इन रिपोर्टों में एक प्रमुख अध्ययन, जो उन्होंने अनिता कुरुप, मैत्रेयी आर., और कंठराजु बी. के साथ मिलकर किया, एक सर्वेक्षण पर आधारित था, जिसमें 2000 से अधिक महिला पीएचडी धारकों से बातचीत की गई। इस रिपोर्ट में बताया गया कि महिलाओं के विज्ञान छोड़ने के पीछे केवल पारिवारिक जिम्मेदारियां ही कारण नहीं हैं, बल्कि इसमें नीतिगत खामियों और पूर्वाग्रहों की भी बड़ी भूमिका है। इस रिपोर्ट ने चयन प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, लिंग आधारित आंकड़ों का अनिवार्य प्रकटीकरण, और समितियों में एक-तिहाई महिला सदस्यता की सिफारिशें भी दीं।
हालांकि, इस व्यापक रिपोर्ट का उद्देश्य विज्ञान में लैंगिक समानता की दिशा में बड़ा बदलाव लाना था, फिर भी 14 वर्षों के बाद भी इस पर अपेक्षित रूप से अमल नहीं हो पाया। इस पर रोहिणी ने एक बार निराशा व्यक्त की, “मुझे नहीं लगता कि लोग इस सर्वेक्षण को पढ़ते हैं। हमें समुदाय में पुरुषों के अधिक समर्थन की आवश्यकता है। यह केवल महिलाओं के लिए नहीं है, बल्कि विज्ञान की भलाई के लिए है।” फिर भी, रोहिणी ने कभी भी अपनी आशा नहीं खोई। 2020 में जारी विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार नीति (STIP) के मसौदे में “समानता और समावेशन” पर एक प्रगतिशील अध्याय था, जिसकी रूपरेखा उन्होंने ही बनाई थी। उन्होंने बताया, “यह पहली बार है कि किसी भारतीय नीति में समानता और समावेशन पर एक पूरा अध्याय शामिल किया गया है।”
वैज्ञानिक उपलब्धियों और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन
रोहिणी का जीवन अनेक प्रेरणादायक घटनाओं से भरा हुआ था। कोलकाता में एक वैज्ञानिक नेतृत्व कार्यक्रम में, जहाँ उन्होंने एक पुरुष-प्रधान सभा को संबोधित किया, एक पुरुष वैज्ञानिक ने उनसे सवाल किया कि “क्या आरक्षण गुणवत्ता को कम नहीं कर देगी?” उन्होंने तुरंत जवाब दिया, “क्या आप कह रहे हैं कि महिलाएं कम गुणवत्ता वाली होती हैं?” इस चुनौती ने सभी को स्तब्ध कर दिया और उपस्थित महिलाओं को प्रोत्साहित किया।
हालांकि रोहिणी कभी भी महिला अधिकारों की पैरोकार बनने का इरादा नहीं रखती थीं, लेकिन उन्होंने इस ज़िम्मेदारी को अपने कर्तव्यों में शामिल किया। उन्होंने इस बात को एक बार साझा किया, “मैं विज्ञान में महिलाओं के लिए मुहिम चलाती हूँ, लेकिन यह मेरे वैज्ञानिक होने के बाद आता है। फिर भी, कई बार मुझे लगता है कि जैसे भूमिकाएं बदल रही हैं। मैंने भौतिकी में महत्वपूर्ण योगदान किया है, फिर भी जब मेरे वैज्ञानिक योगदान को दरकिनार किया जाता है, तो यह दुखदायी होता है।”
*रोहिणी गोडबोले को याद करना उन चुनौतियों और प्रेरणाओं को जीवित रखना है जो उन्होंने विज्ञान और लैंगिक समानता की दिशा में प्रस्तुत कीं। उनके योगदान को सम्मानित करने का सबसे अच्छा तरीका यह होगा कि हम इस दिशा में आशा बनाए रखें और प्रयास जारी रखें।*
फ्रंटलाइन में प्रकाशित नंदिता जयराज लेखिका के मूल लेख का संक्षिप्त संस्करण ।
फीचर्ड फोटो आभार : द हिन्दू

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