नौशेरवाँ आदिल :
ये कहानी सच पर आधारित है। यह बिहार के अररिया ज़िला के एक घर की कहानी है।
इस कहानी में आप पढ़ेंगे भाई-बहन का अपने साथी के साथ प्यार और उनके घर वालों के दोनों के प्रति अलग-अलग विचार। साथ ही यह लेख आपको समाज में फैले हुये लड़का-लड़की का फर्क और रुढ़िवादी सोच को भी दर्शाता है।
इस कहानी में असल किरदार को छुपाया गया है, उनकी प्राइवेसी को ध्यान में रख करके लिखा गया है।
तो चलिए शुरू करते हैं…
यह साल 2015-2016 की बात है। दो भाई-बहन एक ही स्कूल में पढ़ रहे थे। लड़के का नाम राजू और लड़की का नाम प्रिया था। राजू को स्कूल के दिनों में रिया नाम की एक लड़की से प्यार हो जाता है। राजू की बहन प्रिया, उसी साल उस स्कूल में जूनियर है। उसे भी सुरेश नाम के लड़के से प्यार हो जाता है। भाई ने तो प्यार किया और (अच्छा) गोपनीय तरीके से किया। घर वालों को पता भी चला तो थोड़ा बहुत विरोध हुआ पर कुछ दिनों में मामला शांत हो गया। भाई को वापस सम्मान मिल गया और उसकी पढ़ाई पर भी असर नहीं पड़ा। राजू पर शादी का भी परेशर नहीं पड़ा, आख़िर वह लड़का जो है। मगर कहानी में तब एक मोड़ आता है जब घरवालों को बेटी के प्यार करने की बात पता चलती है। अब घरवालों का नजरिया बदल चुका है। पूरे घर में विरोध शुरू हो गया और छोटा- बड़ा सब समझाने में लग गये, इज्जत का पाठ पढ़ाने लगे है। प्रिया की पढ़ाई में भी दिक्कत आने लगी है और उस पर शादी का परेशर बनने लगा है गया। बदचलन, बदतमीज़ जैसे शब्द सुनना तो मानो आम हो गया है। इसी परिस्थिति में भाई (राजू) का विरोध कम मात्रा में हुआ। उसे तो इज्ज़त और घर की शान मानकर भी कोई पाठ नहीं पढ़ाया गया।
हम पुरुष प्रधान समाज में रह रहे हैं और सभी पुरुष जाति का यही हाल है। खुद किसी के भी घर की लड़की से प्यार कर सकते हैं, मगर घर की लड़की किसी लड़के से प्यार करे तो बुरा है। फिर हर घर, गली, मोहल्ला, गाँव और शहर विडंबना में पड़ जाते हैं।
हमारा समाज अपने दो-चेहरे (दोगलापन) अकसर यह कहकर छुपाता है कि लड़की सही चुनाव नहीं की होगी, इसलिए उसका विरोध हुआ होगा, मगर ऐसा नहीं है। बात यह नहीं है कि उसने चुनाव कैसा किया है बल्कि बात यह है कि उसने लड़की होकर प्यार कैसे किया!! उसने घर की मान-मर्यादा की धज्जियां उड़ा दी और खानदान की इज्ज़त मिट्टी में मिला दी है।
मैं सबसे यही पूछना चाहता हूँ कि हमारे समाज में आखिर प्यार करना क्या सिर्फ हर घर के लड़के का जन्मसिद्ध अधिकार है, घर की लड़कियों के लिए यह बंधन क्यों हैं? प्यार को लेकर समानता क्यों नहीं?
लड़की को घर की इज्ज़त, रौनक, लक्ष्मी और बाकी पगड़ी की शान रखने वाली बताकर उस पर इन सब भारी शब्दों का बोझ डाल दिया जाता है, मगर लड़कों पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं डाला जाता है। उसे भी तो घर के इज्ज़त का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए।
कभी-कभी मैं हैरत करता हूँ कि जब हर घर की लड़की पर प्यार करने को लेकर इतनी पाबंदी है तो फिर ये लड़के प्यार कहाँ से और किससे कर लेते हैं!। जब लड़कियों को प्यार करने की इजाज़त ही नहीं है तो बताइए कि इन लड़कों को प्यार करने के लिए लड़की मिल कहा से जाती है। इसी लिए कहा जाता है कि मालिक जितना कठोर होगा उसका नौकर उतना ही फरेबी होगा। नौकर को भी इंसान समझो और बेटा हो या बेटी हो उसको भी एक समान देखो तब जाकर घर, परिवार और बाहर में सही सामंजस बैठेगा।
मेरा मानना है कि प्यार दो इंसान के बीच में एक पवित्र रिश्ता है। इस रिश्ते के बीच बंधनों का होना उचित नहीं है। कोई लड़का-लड़की प्यार करते हैं तो गलत हमेशा लड़कियों को ठहराया जाता है, हमें इस विचारधारा को भी बदलना होगा। इस विचारधारा के खिलाफ़ खुद लड़कियों को आवाज़ बुलंद करनी होगी। अब समय आ गया है इसे बदलने का, छोड़ो ताना बाना और आगे बढ़ो।
मैं सभी लड़कियों से कहूँगा कि सकारात्मक सोच के साथ सही समय और सही इंसान का चुनाव करो और उसके साथ प्यार करो। अपने हक़-अधिकार की लड़ाई लड़ो और अपनी आज़ादी के साथ समाज में अपनी स्थिति को मजबूत साबित करो। प्यार एक सुंदर, सकारात्मक विचार है, जिसे अपनाकर एक अलग विचार पैदा करो। समाज में फैली पितृसत्तामक सोच से लड़ो और बाकी लड़कियों के लिए भी मिसाल बनो। बंधनों से मुक्त प्यार को आज़ाद करो।

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