जागृति सोनकर :
फैजाबाद शहर में मिट्टी से बने बर्तन और खिलौने की बहुत ही मांग रहती थी। इनको बड़े पैमाने पर बनाने का कार्य, मझवा गद्दोपूर और दर्शन नगर में होता है। यहाँ पर छोटे-छोटे त्योहार और मेलों में मिट्टी के खिलौने और बर्तनों की खरीदारी जोरों-शोरों से होती थी। लेकिन बीते कई सालों में इसकी गिरावट भारी मात्रा में देखी गई। अब इसकी मांग सिर्फ दिवाली में ही होती है। जिसमें मिट्टी से बने बर्तनों और खिलौने की दुकानों की कमी दिखाई देती है। देश के विकास और नवीनीकरण में इस काम में गिरावट कैसे आ रही है, इस बात को समझने के लिए हमने अपने शहर के कई कुम्हार से इस काम के बारे में जानने और इस काम में कम मांग होने के क्या कारण है यह समझने की कोशिश की। इसके लिए हमने अपने शहर के महिला व पुरुष कुम्हारों से इस विषय पर बातचीत किया।
इस विषय पर अधिक जानकारी पाने के लिए हमने रिकाबगंज, नियावा और कुमारटोला जैसे समुदायों में लोगों से बात की जहाँ पर हमारी मुलाकात पंचम लाल प्रजापति जी से हुई। उन्होंने अपना परिचय देते हुए यह बताया कि यह काम उनके 4 से 5 पीढ़ी के लोग करते आ रहे हैं। उनका स्थाई कार्यक्षेत्र चौरे बाज़ार था। वहाँ पर वह अपने परिवार के साथ मिलकर काम करते थे लेकिन किसी पारिवारिक मतभेदों के कारण वह फैजाबाद शहर में इस काम को करने के लिए आये। उन्होंने बताया कि वह अपनी पत्नी बच्चों के साथ मिलकर यह काम करते हैं। मिट्टी से दिया, प्याली, कुल्हड़, तंदूर, घड़ा, गमला, सुराही, घरौंदा आदि वस्तुएं अपने घर से ही बनाते हैं। इन सभी वस्तुओं को वह खुद बाज़ार में बेचने का काम करते हैं। उनके द्वारा बनाए गए कुल्लहड शहर की चाय की दुकानों पर बिकते हैं। मिट्टी के बर्तनों की खरीदारी शहरों में बहुत ही कम हो गई है। ना ही उसके अच्छे दाम मिलते हैं। इसीलिए ज़्यादातर बाहर के व्यापारी को वह वस्तुएं बेचने में सहज महसूस करते हैं और सहालक (wedding season) के समय कई सारे कैटरर्स को तंदूर थोक और फुटकर रेट में भी बेचते हैं। इसी बातचीत में यह बात भी निकलकर आई थी। मिट्टी के बर्तनों को बनाने के लिए चिकनी और साफ मिट्टी की ज़रूरत होती है। वह हवाई अड्डे के पास से ₹4000 ट्रॉली लाते हैं। जिससे वह तरह-तरह की वस्तुएं बनाते हैं। मिट्टी के बर्तन बनने के बाद उन्हें पकाने के लिए लकड़ी का बुरादा पर कंडी, इन सभी चीजों को घोसियाना से खरीदा जाता है क्योंकि घोसियाना में घोसियों द्वारा भैंस पालने, दूध बेचने का काम होता है। जहाँ से कंड्डी आसानी से उपलब्ध हो जाती है। वहीं अगर मिट्टी से बने दिए के रेट की बात करें तो सभी ने यह बताया कि एक पीस दिया तीन से चार रुपए में बिकता है। ₹300 सैकड़ा वह बाज़ार में बेचते हैं। जिसके लिए वह दिन में 10 से 12 घंटे काम करते हैं और एक दिन में 1000 दिया बनकर तैयार होता है। दिया, कुल्लहड और प्याली बनाने में कम समय लगता है इसलिए इसको अधिक मात्रा में बनाया जाता है। वहीं अगर घरौंदा, खिलौने और तंदूर की बात करें तो इसको बनाने में 3 से 4 दिन लगते हैं। जिसके कारण इसका दाम अधिक होता है। इन सभी बातों के साथ सभी कुम्हारों से यह पूछा गया कि अयोध्या में होने वाले दीपोत्सव में जलने वाले लाखों दिए का आर्डर उन्हें भी मिलता है कि नहीं।? सभी कुम्हारों का यही कहना था कि दीप उत्सव में दिया बनाने का आर्डर उन्हें नहीं बनाने दिया जाता है। वह डाई मशीन के द्वारा बनता है। इसी कड़ी में मोहित प्रजापति का यह कहना था कि इस साल दीपोत्सव में 28 लाख दिया जलाने का रिकॉर्ड बनाया जा रहा है, लेकिन इस दिया को बनाने के लिए शहर के किसी भी कुमार को ऑर्डर नहीं दिया गया। यह सभी दिया डाई मशीन से बनता है या फिर दर्शन नगर के गाँव में कुछ कुम्हारों को 50,000 दिया बनाने का आर्डर दिया जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि ग्राम उद्योग द्वारा चलाई गई योजना जिसमें उन्हें बिजली से चलने वाली चाक का वितरण से 5 साल पहले किया गया था। लेकिन उनका यह कहना था कि वह चाक बिजली की खपत को ज़्यादा करती थी। जिससे बिजली का बिल ज़्यादा आता था और वह चाक बहुत धीरे चलता था। इसीलिए उन्होंने चाक का उपयोग करना बंद कर दिए और अपने पत्थर वाले चाक से ही वस्तुएं में तैयार करते हैं। इसी के साथ उन्होंने आप ही बताया कि बारिश में इस काम को करने में बहुत कठिनाई होती है क्योंकि मिट्टी सूखने की जगह कम पड़ जाती है। यह काम गर्मी में बहुत तेज़ी से चलता है। उन्होंने यह बताया कि यह जो कार्य है इस काम में पूरे परिवार को जुट कर काम करना होता है। जिसमें बच्चे मिट्टी का ढेला मिट्टी को सामने छानने का काम करते हैं और घर के पुरुष मिट्टी से मूर्तियां दिया वस्तुएं बनाने का काम करते हैं। उसी घर की महिलाएं मिट्टी को सुखाने व भट्टी तैयार करती है जिसमें उन सभी बर्तनों को पकाया जाता है उन्होंने इस पर बनी कहावत के बारे में बताया कि:-
एका बढ़ाई, दुका लोहार,
लड़के बच्चे, जुटे कुम्हार।
इस स्टडी के दौरान हमें यह देखने को मिला कि समुदायों में लोगों के पास टेराकोटा शिल्पकार जैसी कौशल है लेकिन बाज़ार में इसकी मांग न होने के कारण और सस्ते दाम में इन सभी वस्तुओं के बिकने के कारण लोग इस काम को अब छोड़ना चाहते हैं क्योंकि उनका कहना था कि इस काम में पूरा परिवार मिलकर काम करता है। उसके बावजूद बाज़ार में उसकी मेहनत आना उन्हें सही नहीं मिलता और दिया मशीनों के द्वारा निर्मित वस्तुओं के कारण हस्तशिल्प कलाओं में भारी गिरावट देखने को मिलती है। जिसके कारण कुम्हार जाति के लोग अब इस काम को करने से पीछे होते हैं।

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