सौम्या रिहा:
जब आप ट्रेन में बैठते हैं तो मुझे लगता है कि आपको किताब और फ़ोन की ज़रुरत नहीं होती है। एक तरह से देखा जाये तो ट्रेन में नेटवर्क जाना बहुत हद तक बढ़िया ही है। कम से कम आप अपने आस-पास वालों से बातें तो कर पाते हैं, आप कईं नई कहानियों और लोगों से तो रूबरू हो पाते हैं।
मेरा सफ़र कुछ ऐसा ही था, जहाँ मैंने वंदे भारत ट्रेन से अपना सफ़र शुरू किया था, 3 घंटे का सफर मैंने एकदम शांति में निकाला। बस अपनी किताब को पढ़ कर। लोगों से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने उतना ही जवाब देना पसंद किया। वन्दे भारत में अमूमन लैपटॉप पर काम करने वाले या अपना-अपना अख़बार पढ़ने वाले ही लोग थे जो किसी और से बात करने में इच्छूक नहीं थे।
आगे का सफ़र जारी रखने के लिए मैंने दूसरी ट्रेन ली। जिसमें मेरा आगे का सफ़र स्लीपर कोच में था। स्लीपर कोच को देख कर दो मिनिट मुझे लगा की मैं जनरल डिब्बे में आ गई हूँ। बहुत मिन्नतों के बाद बैठने के लिए सीट मिल गई थी। शायद मेरे कपड़ों की वजह से। कुछ घंटों के इस सफ़र में, मैं पूरे टाइम बतयाती आयी हूँ, कभी पास वाले भैया से तो, कभी इन सुंदर महिला के पास जाकर। जो ज़मीन पर, बाथरूम के पास बैठी थी। मैंने इन्हें इशारे से अपर सीट पर बैठने का इशारा किया, पर उन्होंने मना कर दिया। क्योंकि उनके साथ बहुत लोग थे। वहीं एक ओर लोग हाथ धो रहे थे तो पानी उनके ऊपर आ रहा था। वे पल्लू से अपना चेहरा और बच्चे को ढकने की कोशिश कर रही थी, बढ़िया मजे से ठंडी हवा का आनन्द और परिवार की अन्य महिलाओं के साथ बातें कर रही थी, अम्मा को इतनी नींद आई थी कि वो ज़मीन ही पर सो गईं, लोग बार-बार उनके ऊपर से निकल रहे थे, पर उन्हें अपनी नींद बड़ी प्यारी थी। कुछ समय उनके साथ ज़मीन में बैठी और बातें की। ये जानने के लिए कि बाथरूम के पास बैठना कैसा लगता है?
जब लोग बार-बार आप पर चिल्ला कर निकल रहे हो, तब कैसा लगता है?
मज़दूर, मजबूरी और वक़्त की मंज़ूरी को भी देखा।
इंसान और इंसानियत में फ़र्क़ देखा।
और क्या-क्या बतलाऊँ हर पल, हर जगह कुछ ना कुछ नया देखा और नया सीखा।
नोट- ये एक ट्रेन के सफ़र की कहानी। बस ये बताने के लिए कि अच्छे कपड़े पहने हुए इंसान को तवज्जो ना दीजिए। यहाँ सब इंसान एक समान है। जिसे जिस चीज़ की ज़रूरत है ऐसे लोगो की मदद कीजिए। चाहे वो ट्रेन की सीट हो या कुछ और।
ज़िंदगी मुबारक

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