नीतिशा खलखो:

नौकरी के खातिर – लघुकथा 1

कुमार : डॉ अमरेंद्र जादव का फेसबुक प्रोफाइल जाने क्यों इन दिनों फेसबुक में नहीं मिल रहा।
नितिन : वर्तमान सत्ता में नौकरी पाना है तो सभी आंदोलनधर्मी को आज यह करना पड़ रहा।
कुमार : अच्छा, तो आन्दोलनजीवी वाला जुमला काम कर ही गया।
नितिन : प्रैक्टिकल होना, समझदार होना इसी को तो कहते हैं। देखते हैं हम सब कब तक बचे रहते हैं इससे !!

नौकरियाँ या चाटुकारियाँ – लघुकथा 2
इमरोज : भाई अजय यकीन करो मुझे मेल सिर्फ कुछ कॉलेज से आया है और कई कॉलेज से मेल तक नहीं आया और वहाँ परमानेंट नियुक्तियां हो भी गई। ना कोई लेटर आया, न ही कोई मेल, न ही कोई एसएमएस। यह लोग 1000-2000 रूपये फॉर्म भरने का रखते हैं और जरा सी जेहमत नहीं उठा सकते कि कैंडिडेट को इन्फॉर्म कर सके। और तो और सभी पात्रता पूरी करने के बाद, ए पी आई स्कोर भी 85-90 तक लाने के बाद भी यह छिप-छिपा के असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरियों को भर दिया जा रहा है।
खास पार्टियों के झंडे ढोने वालों को आगे किया जा रहा। मैं तो 47 कॉलेज के फॉर्म भर चुका हूँ और अब सच बताऊं बहुत निराश हो चला हूँ।

(फ़ोन में बातें चल रही है और तनाव दोनों के माथे की रेखाएं उभार रही)

अजय : इमरोज मुझे भी बहुत ताज्जुब हुआ कि देश की राजधानी का इतना बड़ा विश्वविद्यालय जिसे नैक (NAAC) द्वारा ए++ से नवाजा गया हो वहाँ यह हाल है। मेरे साथ भी यही हुआ है, और जब मैंने इक्वल ओपोर्चुनिटी ऑफिस को मेल डालने के लिए वेबसाइट चेक किया तो वह भी अनुपस्थित। 70 से ज्यादा कॉलेज में पोस्ट आएं हैं, आ रहे हैं, पर न इंटरव्यू की सूचना मिलती है, न ही वहाँ जाने पर कुछ हासिल होता है। पैनल तय करके आती है कि यह मेरा रिश्तेदार है, वह मेरी जाति और मेरी विचारधारा का है, उसने संगठन के लिए  कई काम किये हैं, वह उस नेता की सिफारिश के साथ आया है आदि।

एक दो इंटरव्यू में मैं गया भी तो वहाँ ऑब्जेक्टिव सवाल पूछकर किसी बातचीत का मौका दिए बाहर कर दिए जाते हैं। अजीबोगरीब ह्यूमिलेशन के साथ वहाँ से खदेड़े जा रहे।
कई जगह तो वर्षों से पढ़ने वालों को दरकिनार कर बिल्कुल मात्र एम ए और नेट पास को रख लिया गया जबकि कई पीएचडी धारी भी वहाँ अपने कई रिसर्च पब्लिकेशन के साथ पहुँचे है।
इमरोज तुम्हे लगता है कि क्या ईमानदारी से हम सभी पढ़ने लिखने वालों को सिस्टम जगह दे पाएगा ?

शिक्षा को बेहतर और बेहतर करने वालों की जगह इन चमचों की बहालियों पर क्या कहेंगे !

जितने लोग परमानेंट नौकरियों में इंटरव्यू के आधार पर चयनित हुए हैं उनके सोशल मीडिया के एकाउंट देख लें। सभी एक खास सत्तारूढ़ पार्टियों से जुड़े हुए संगठन और विचारधारा को पालने पोसने में रहने वाले जुगाड़ू लोग हैं।

देश में अकडेमिया आज पूरी तरह से तबाह हो चुका है। इसी बीच में हमें और तुम्हें गुज़ारा करना है।

इमरोज : हौसला रखो अजय, समय की गति हमेशा एक नहीं रहती, चीज़ें बदलती भी हैं।

अजय : हाँ बस हमारे साथ ज़िन्दगी भर कष्ट उठाने वाले हमारे पैरेंट्स मरते मरते तक अपने बच्चों को एक नौकरी में नहीं देख पाते, न ही कोई सुख भोग पाते हैं। तकलीफ उनके लिए होती  है। अपना क्या है, सीखने में ज़िन्दगी गुजर जाएगी। हज़ारों साल  भी कम  है इस दुनिया में जितनी चीज़ें लिखी जा चुकी है उससे एक बार पढ़ गुजरने के लिए।

इमरोज : तुम्हारी यह पढ़ने और सीखने की भूख देख ताज्जुब होता है। पॉकेट में 10 रुपये नहीं होते कई  बार और फिर भी तुम रमे रहते हो अपने ही इस राम में।

अजय : सही कहा दोस्त तुमने, दुनिया के लिए राम में रमना सत्तारूढ़ बन जाना है, और मेरे लिए रमना सिर्फ इन काले काले हर्फ़ों में ही है। 

(एक ठंडी लम्बी आह के साथ थोड़ी सी मुस्कान, के साथ दोनों के माथे की लकीरें पल भर के लिए स्थिर होती हैं। सूरज ढलकर अगले दिन के उजास को लाने की प्रक्रिया में वह भी रम जाता है। फ़ोन अब कट चुका है।)

फीचर्ड फोटो आभार – गूगल

Author

  • नीतिशा, झारखंड की रहने वाली हैं। वह वर्तमान में झारखंड के धनबाद ज़िले में स्थित बी.एस.के. कॉलेज, मैथन में विभागाध्यक्ष हैं। नीतिशा कई आदिवासी आंदोलनों, विशेषकर साहित्यिक आंदोलनों से जुड़ी हैं।

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