समिक्षा गणवीर:

मैं एक महिला हूँ और वर्तमान भारत में मैं और मेरी जैसी बहुत-सी महिलाएँ यह महसूस करती हैं कि हम इस समाज में स्वतंत्र नहीं हैं। हमने यह भी महसूस किया है कि हमारी आवाज़ को दबाने की जंजीरे मजबूत होती जा रही हैं।

चलिए आपको बताते है स्वतंत्र भारत में महिलाओं की स्तिथि क्या है? नागपुर ज़िले में गोसेखुर्द बांध के बनने से  अब गाँव के लोग पुनर्वासित गाँव में रहने आए हैं। गोसेखुर्द बांध से विस्थापित लोगों का संघर्ष लंबे समय तक चला है। गोसेखुर्द विस्थापितों का पुनर्वास जब हुआ, घर और ज़मीन के मुआवज़े के साथ रोज़गार और नौकरी मिली, यह सब संघर्ष की वजह से ही मुमकिन हुआ। मगर इस पूरी प्रक्रिया में घर और ज़मीन का मुआवज़ा परिवार के प्रमुख पुरुषों के नाम पर ही मिला। महिला अपने घर और खेती में चाहे जितना भी काम करले लेकिन वह न कभी मालिक बनती है और न कभी मज़दूर। इसलिए जो पैसा मिला उससे लोगों ने घर बनाए, गाड़ियाँ खरीदी, और कुछ पैसे बच्चों की शादियों में और शराब में उड़ा दिए। पैसा खर्चा करते समय न महिला से पूछा गया, न उनसे कोई राय ली गई। अब नये गाँव बनने पर परिवार की पूरी ज़िम्मेदारी घर की महिला पर आ गई है। इस के चलते परिवार चलाने हेतु, महिलाएँ मज़दूरी के लिए पुछताछ करके, गाँव से बाहर मज़दूरी करने जा रही हैं।

वे रोज सुबह 4 बजे उठकर, परिवार के लिए खाना बनाकर, 7 बजे घर से निकलती है तो शाम 7 बजे घर वापिस आती है। गाँव में मिनी टान्सपोर्ट (पिकअप) गाड़ी आती है और एक गाड़ी में 30 से 35 महिला घुसकर 35 से 40 की.मी. तक मज़दूरी करने जाती हैं। परिवार की ज़रूरतें और भूक को मिटाने का संघर्ष इन महिलों का 10 साल से जारी है। इस पिकअप गाड़ी के सफर में इन महिलाओं की जान को सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी कौन लेगा यह एक बड़ा सवाल हैं जिसका कोई जवाब दूर-दूर तक नज़र नहीं आता है।

भारत के संविधान ने सभी नागरिकों को सम्मान से जीने का हक़ दिया है लेकिन स्वतंत्रता के इतने साल बाद भी हमारी महिलाएँ परिवार की भूक को मिटाने के लिए भटक रही हैं। 1अगस्त को जिवनापुर गाँव की महिलाओं का मज़दूरी के लिए जाते समय एक्सीडंन्ट हो गया। जिसमें 28 परीवारों की महिलाएँ ज़ख़्मी हो गईं। इनमें से कुछ महिलाएँ विधवा हैं, जिनके पीछे परिवार को सँभालने वाला कोई नहीं है। कुछ महिलाएँ तो इतनी ज़ख़्मी थी कि एक जगह से दूसरी जगह हिल ही नहीं पा रही थीं। यदि इन महिलाओं को कुछ हो जाता है तो इनके बच्चों की भूक को कौन मिटाएगा? बिना रोज़गार, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थय कैसे ठीक होगा? इन गाँव की महिलाओं का भूक मिटाने का संघर्ष कब खत्म होगा? आखिर महिलाओं के सपने कब तक कैद रहेंगे? हमें हमारी भूक से आज़ादी कब मिलेगी? यह बड़े सवाल आज भी गोसेखुर्द की महिलाओं के हैं जिनके जवाब वह तलाश रहीं हैं।

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  • समीक्षा, महाराष्ट्र के नागपुर ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं। वह कष्टकारी जन आन्दोलन के साथ जुड़कर स्थानीय मुद्दों पर काम कर रही हैं।

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