नीतिशा खलखो:

कुमार : पता है कल यूनिवर्सिटी में फ़िल्म स्क्रीनिंग के दौरान मारपीट हो गई?

नितिन : कौनसी फ़िल्म चल रही थी ?

कुमार : ‘राम के नाम’ आनंद पटवर्धन ने क्या शानदार सच बोलती हुई डाक्यूमेंट्री बनाई है, उसी के स्क्रीनिंग में यह घटित हुआ अपने नर्मदा ढ़ाबे में। कुछ लोगों को लगा कि इससे उनके राजनीतिक उद्देश्यों को हानि पहुँचती है सो वह इस फ़िल्म को बंद करने के लिए अड़ गए।

नितिन : फिर !

कुमार : फिर क्या फिर! ऑर्गनाइज़र संगठन ने विरोध किया तो लाठी, रॉड के साथ बन्द कराने आये संगठनों ने यहाँ वँहा दौड़ा-दौड़ा कर स्टूडेंट्स पर हमले किये । स्क्रीन, प्रोजेक्टर सब तोड़ डाला।।

नितिन : अजीब हाल है देश का, समाज का, यूनिवर्सिटीज का !
सच को सम्मान देने वाले जाने गम कहाँ गुम हो गए हैं ! हर रोज कंही न कंही  शारीरिक हिंसा से लेकर मानसिक हिंसा तक का सफर हमारी सभ्यता को घुन की तरह निगले जा रहा।
जाने कहाँ जाकर हम सब रुकेंगे !

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  • नीतिशा खलखो / Neetisha Khalkho

    नीतिशा, झारखंड की रहने वाली हैं। वह वर्तमान में झारखंड के धनबाद ज़िले में स्थित बी.एस.के. कॉलेज, मैथन में विभागाध्यक्ष हैं। नीतिशा कई आदिवासी आंदोलनों, विशेषकर साहित्यिक आंदोलनों से जुड़ी हैं।

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