सिम्मी :
अगर सिनेमा की बात की जाए तो यह सिर्फ मनोरंजन का एक साधन है। जिसको देखने भर से लोगों में खुशी और स्फुर्ति आती है। सभी सिनेमा देखने वाले यह जानते-समझते हैं कि वह जो पर्दे पर देख रहे हैं उसमें कोई हकीकत नहीं है। लेकिन आज हमारा समाज सिर्फ सिनेमा नहीं देख रहा है बल्कि सिनेमा समाज की सोच को प्रभावित करने का सीधा और सशक्त माध्यम के तौर पर उभर कर सामने आ रहा है। यह समाज की सोच और मानसिकता को भी प्रभावित करने का काम कर रहा है। सिनेमा समाज की सोच को अपने चित्रों, कथाओं और कहानियों के माध्यम से गहराई से बदलने की क्षमता रखता है। जो हकीकत नहीं है उसको भी हकीकत की तरह से पेश कर रहा है। इस समय में फिल्मों में सिलसिलेवार आने वाली वीडियो पर बात करने की बहुत ज़रूरत है।
हाल फिलहाल में हमने भैया जी फिल्म देखी, जिसमें मनोज बाजपेई मुख्य किरदार में हैं। फिल्म की स्टोरी काफी अच्छी है। मनोज बाजपेई फिल्म में बड़े भाई का रोल कर रहे हैं। छोटे भाई का मर्डर हो जाता है, फिर पूरी फिल्म में मनोज बाजपेई बदला लेते हुए दिखाई देते हैं। फिल्म में दिखाया गया कि छोटे भाई के मरने के बाद के संस्कार में कौवा को खाना खिलाया जाता है। कौवा खाना नहीं खाता है, और इसे मरने वाले की आत्मा को शांति नहीं मिली से जोड़ा जाता है। मनोज बाजपेई के भाई को जलाकर फिल्म में मारा गया था। मनोज बाजपेई ने विलन को और उसके बेटे को जलाकर मार डाला। फिल्म में विलेन और उसके बेटे के मरने के बाद कौवे ने खाना खा लिया। पूरी फिल्म में मारपीट खून खराबा था।
इधर 20-21 की दशक की कुछ फिल्मों को मैंने ऑब्जर्व किया है कि जब सिनेमा हॉल में फिल्म चलती है और हज़ारों लोगों पर बंदूक चलती है तो पूरा हॉल सिटी और तालिया से गूंज जाता है । खून खराबा देखकर लोग खुश होते हैं। के.जी.एफ., आर.आर.आर., एनिमल इस तरह की फिल्म हैं जो 21 की दशक में आ रही है। जब हॉल में चलती है तो सिर्फ खून-खराबा और कत्लेआम दिखाया जाता है। उससे पूरा सिनेमा हॉल ताली और सिटी से गूंज जाता है। मैं सोचती हूँ कि क्या किसी के मरने पर जो लोगों के अंदर संवेदना हुआ करती थी वह खत्म होती जा रही है? क्या हम इस तरह का बदला लेने वाला समाज चाहते हैं? फिल्में समाज में रहने वाले लोगों के चरित्र और मानसिकता पर गहरा प्रभाव डालती हैं। ज़मीनी स्तर की बहुत सारी सच्चाइयां फिल्मों के माध्यम से समाज को दिखाई जाती हैं।
बचपन में मैंने एक फिल्म देखी थी राजेश खन्ना की जानवर। उस फिल्म में राजेश खन्ना का हाथी मर जाता है और राजेश खन्ना एक गाना गाते हैं नफरत की दुनिया को छोड़कर प्यार की दुनिया में खुश रहना मेरे यार। मेरे साथ जो लोग भी फिल्म देख रहे थे सब लोग रो रहे थे। एक हाथी के मरने पर लोगों में संवेदना थी जबकि वह तो सिर्फ जानवर था पर लोगों में संवेदना ज़िन्दा थी कि आंसू निकल आते थे। अब कैसे हज़ारों लोगों के मरने पर लोग ताली और सीटी बजाते हैं। ज़्यादातर फिल्मों में मैंने देखा है कि वह बहुत सारे अच्छे-अच्छे मैसेज देती है। फिल्म पर कपड़े के पहनावे से लेकर बोली, भाषा यह सारी चीज़ों का फर्क और असर समाज में दिखता है। फिल्मों का और जिस तरह की फिल्में आजकल बन रही है उसका ज़मीन पर गलत असर दिख रहा है।
क्या हम इस तरह का समाज चाहते हैं जहाँ पर कानून न्यायालय को ताख पर रख दिया जाए, ज़मीन पर खुद इंसान हर एक व्यक्ति या व्यक्तियों का गिरोह करेगा?
हमारे परिवार में जब नया बच्चा जन्म लेता है, तो हर एक घर-परिवार अपनी संस्कृति और विश्वास के आधार पर उसका स्वागत करते हैं। इसी तरह से हमारे बीच से जब कोई जाता है, तो उसके जाने का दुःख हम अपने तरह से मनाते हैं। इसका सभी सम्मान करते हैं। इन खुशी और दुःख के भावनाओं के साथ सिनेमा बहुत खेल कर रहा है। इसको फिल्म बनाने और देखने वालों दोनों को समझना होगा। हमारा समाज प्रेम और विश्वास के साथ आगे जा रहा है। मुझे लगता है कि सिनेमा समाज को मज़बूत करने के लिए एक अच्छा माध्यम है और उसी तरफ हमें इसका उपयोग करने की ज़रूरत है।

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