सुनिल चौहान:

सदियों से अत्यचारित हुई जो,
आज जन्मी हैं वही नन्ही परी।

लड़के की चाह ने ठुकराया इसे,
माँ हर पल सुरक्षा ढाल बनी।

माँ के आँचल में पली – बड़ी,
पिता के आँगन का मान बनी।

उड़ाने को नई आजादी मिली,
सिर उठाकर चलना सिखाया।

धीरे – धीरे समय गुजरत गया,
एक वक्त शादी करने की उम्र हुई।

माँ – बाप की एक ही ख्वाहिश,
ता – उम्र सुखी रहे हमारी लाड़ो।

इसी दौरान लाड़ो को,
सोशल मीडिया वाला ईश्क़ हुआ।

उस अज़नबी लड़के के साथ,
एक दिन भागकर शादी कर ली।

न स्वभाव देखा, न मान देखा,
ना माँ – बाप का अभिमान देखा।

दो दिन के अज़नबी के लिए,
अब, माँ – बाप के लिखाफ़ हुई।

लाचार हो गई माँ की ममता,
दफ़न हो गया पिता का सम्मान।

Author

  • सुनिल चौहान मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले में रहते हैं, वह एक समाजशास्त्र के विद्यार्थी हैं। उनको युवाओं के विषय पर लिखना पसंद है।

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