कोर्दुला कुजूर:

संथाल हूल, केवल अंग्रेज़ी हुकूमत, उनके शोषण, ज़ुल्म और उनकी नीतियों के खिलाफ नहीं था। इस हूल की जड़ में स्थानीय महाजनों द्वारा किये जाने वाले शोषण तथा उनका पक्ष लेने वाले पुलिस प्रशासन के विरोध में भी था। ब्याज का धंधा करने वाले महाजनों व पुलिस की सांठ-गांठ थी। महाजन को संथाल 25 प्रतिशत सूद देने पर सहमत थे, पर महाजनों का शोषण तब ऐसा था कि वे पाँच सौ प्रतिशत तक सूद वसूला करते थे। ऐसे में संथालों को अपनी ज़मीन से लेकर सब कुछ से हाथ धो देना पड़ता था।

अनेकों आवेदनों के बाद भी जब कोई कार्यवाही नहीं हुई तो इस ज़ुल्म से उबरने के लिए संथालों को अपने आंदोलन को आक्रामकता के साथ लड़ना पड़ा। अंग्रेज़ों के पास बंदूकें थीं और संथालों के पास तीर-धनुष व तलवार। अधिकतर तो निहत्थे ही थे, पर उनकी आक्रामकता ऐसी थी कि पूरा बंगाल उस वक्त थर्रा गया था।

हालांकि 29-30 जून 1855 से एक पखवाड़ा पहले 13 जून 1855 को ही संथाल आदिवासियों ने इस शोषण-अत्याचार के खिलाफ कोलकाता कूच करने की योजना बनायी थी। तब आंदोलन की रूपरेखा बिल्कुल शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात पहुँचाने की ही थी। वे केवल इतना ही चाहते थे कि वे अंग्रेज़ अधिकारियों से अपनी बात कह सकें। अधिकारियों को महाजनों और पुलिस के अत्याचार व सांठगांठ के बारे में बता सकें लेकिन इसके बाद की घटनाएं और परिस्थितियां ऐसी बनी कि उन्हें और आक्रामक व उग्र तेवर अपनाने पड़े।

दरअसल इस बीच शनिवार 7 जुलाई 1855 का दिन आया, जब सिदो और कान्हू अपने समर्थकों के साथ थे और महेश दारोगा, क्यूक्यूटी, उनपर दमनात्मक कार्रवाई के मकसद से पहुंचा था। इसके बाद जो कुछ हुआ, उस वाक्य ने हूल का स्वरूप ही बदल दिया। संथाल हूल के दौरान, पकड़ में आने के बाद, 20 दिसंबर 1855 को कान्हू मुर्मू ने कोर्ट में जो अपना बयान दिया था, उसमें उसने कहा था कि जब हम लोग संथाल आदिवासियों को अपने ऊपर हो रहे शोषण-अत्याचार के खिलाफ एकजुट करने का प्रयास कर रहे थे, तब महाजनों ने दारोगा को सौ रुपये दिए, ताकि वह हम दो भाइयों (सिदो मुर्मू और कान्हू मुर्मू) को गिरफ्तार कर ले जाएं और जेल की सलाखों के पीछे भेज दे। लेकिन दारोगा ऐसा नहीं कर पाया। उस वक्त के तत्कालीन असिस्टेंट स्पेशल कमिश्नर एश्ले इडेन के समक्ष दिये गये बयान में कान्हू मुर्मू ने खुलासा किया था कि हम लोग जब एक सभा कर रहे थे, तब दारोगा ने अपने आदमी को भेजा और वहां मौजूद लोगों की गिनती कर आने को कहा। उसने हमारे एकत्रित होने की वजह जानने का प्रयास किया। इस पर हमने जवाब दिया था कि हम लोग अपने ठाकुर (देवता) के कहने पर एकत्रित हुए हैं। इसलिए वह हस्तक्षेप न करे।

दो दिन के बाद दारोगा, महाजन के साथ उसी मैदान में आया और उसने आरोप लगाया कि हम लोग डकैती की योजना बना रहे है। कान्हू ने उनसे कहा कि यह झूठ है। इस पर महाजन ने कहा कि ज़रूरत हुई तो वह हमें सलाखों के पीछे भेजने के लिए, हजार रुपए भी खर्च करने को तैयार है। कान्हू मुर्मू ने अपने बयान में आगे कहा था कि महाजन ने मेरे भाई सिदो को बांधने की कोशिश की। इसी बीच मैंने अपनी तलवार निकाल ली और उसे बंधन से मुक्त कराने के लिए महाजन केनाराम भगत का सिर धड़ से अलग कर दिया। वहीं सिदो ने दारोगा महेश लाल दत्त को मार डाला, जबकि उनकी सेना ने पांच अन्य को मौत के घाट उतार दिया।

इसके बाद हूल-हूल के नारे से पूरा क्षेत्र गूंज उठा। हम दोनों भाई (सिदो- कान्हू) भी गरज उठे – “अब दारोगा नहीं है, महाजन भी नहीं है. सरकार भी नहीं होगी, हाकिम भी नहीं होगा, अब हमारा राज होगा……….”

इस घटना के बाद, 16 जुलाई 1855 को पीरपैंती-पियालपुर में आंदोलनकारियों ने सार्जेंट मेजर सहित 25 अन्य को भी अपने तीर से निशाना बनाया था। इसके बाद तो जब ब्रितानी हुकूमत ने इन्हें घेरने की कोशिश की, तो ये सेनानी राम मांझी, शाम, फुटुन आदि को साथ लेकर वीरभूम की ओर छह अगस्त 1855 को लगभग 3000 विद्रोहियों के साथ कूच कर गये। उसी वर्ष हज़ारों संथाल विद्रोहियों ने जामताड़ा के पूरब से अंग्रेज़ों के छक्के छुड़ाने के लिए अपनी स्थिति को मज़बूत बनाने की कोशिश की।

वीरभूम पर हमला करने के पूर्व 12 सितंबर 1855 को रक्साडंगाल से विद्रोहियों ने देवघर से चले एक डाक हरकारे के हाथ तीन पत्ते वाली साल की डाली देकर संदेश भेजा कि वे तीन दिन में उन तक पहुंच रहे हैं। सामना करने को तैयार रहें । इन तीन पत्तों वाली साल की टहनी का एक-एक पत्ता विद्रोहियों के आगमन के पूर्व एक-एक दिन का प्रतीक था। छह महीने के भीतर ही संथाल हूल का यह विद्रोह भयानक रूप धारण कर पूरा संथाल परगना, हजारीबाग, बंगाल के धुलियान, मुर्शिदाबाद व बांकड़ा और बिहार के भागलपुर तक फैल गया।

21 सितंबर 1855 तक वीरभूम से दक्षिण-पश्चिम जीटी रोड पर स्थित गोबिंदपुर तालडांगा और दक्षिण पूर्व में सैथिया से पश्चिम और गंगा घाटी वाले इलाके में राजमहल व भागलपुर जिले के पूर्वोत्तर और दक्षिणेत्तर इलाके तक विद्रोही गतिविधियां काफ़ी तेज़ हो गई।अब ऐसी स्थिति आने लगी थी कि आंदोलन कर रहे लोगों को हुकूमत ने जेल के अंदर डालना शुरू कर दिया। जेलों में पहले से ही भीड़भाड़ थी। हूल पर लिखी गयी अपनी पुस्तक में पीटर स्टैनली लिखते हैं कि 1855 के अक्टूबर के अंत तक सिउडी जेल, जिसकी क्षमता 375 कैदियों को रखने की थी, वहां 446 लोग रखे गये थे, जिनमें ज्यादातर संथाल ही थे। भागलपुर जेल में,जो 200 कैदियों के लिए बनायी गयी थी, अकेले 717 संथालों को रखा गया था। यहां लगभग 500 को तो असमर्थता की स्थिति में छोड़ना पड़ा। कई जगह तो इस बात का भी ज़िक्र है कि भागलपुर जेल में ही 87 कैदियों की हिरासत में मौत हो गयी थी। हूल के दौरान भीड़ बढ़ने से पहले ही लेफ्टिनेंट गवर्नर ने स्वीकार कर लिया था कि जेलें “अत्यधिक अस्वास्थ्यकर” थीं। इसके बावजूद विद्रोहियों का आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा था।

इसके बाद विद्रोहियों ने पूरा वीरभूम तहस-नहस कर दिया। नारायणपुर, नलहाटी, रामपुरहाट, सैथिया ही नहीं, वीरभूम ज़िले के मुख्यालय, सिउड़ी और उससे पश्चिम स्थित नागौर व हजारीबाग के नजदीक खड़़डीहा में सियारामपुर तक सारी पुलिस चौकियों और इलाके को नवंबर 1855 के अंत तक लूटकर विद्रोहियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी को मुश्किल में ला दिया। बिहार से बंगाल की ओर जानेवाली मुख्य सड़क पर विद्रोहियों का कब्जा हो गया। डाक हरकारे को रोके जाने और उनकी डाक थैलियां लूट लिये जाने से विद्रोहियों से अग्रेजों की परेशानी बढ़ती गयी।

ऐसे में अंग्रेज़ों की सेना ने भी कहर बरपाया और 15000 के करीब संथाल मारे गये, पर ‘स्वराज-स्वशासन’ के लिए वे लड़ाई लड़ते रहे, पीछे नहीं हटे। ऐसे में अंग्रेज़ी हुकूमत के लिए यही रास्ता बचा कि वे मार्शल लॉ हटायें। सेक्शन 3 रेगुलेशन X 1804 के तहत लगा, 3 जनवरी 1856 को अंततः मार्शल लॉ हटाना पड़ा। इसे 10 नवंबर 1855 को लगाया गया था। इससे पहले संथाल परगना को Acts of XXXVII 1855 (बाद में X of 1857) के तहत अलग ज़िला बनाकर नॉन-रेगुलेशन डिस्ट्रिक्ट का दर्जा देना पड़ा। डिप्टी कमिश्नर के तौर पर तब एश्ले इडेन सीएस विशेष रूप से नियुक्त किये गये। सिविल के साथ क्रिमिनल ज्यूरिस्डिक्शन पावर भी उन्हें दिये गये। चार उप ज़िलों के लिए चार सहायक अधिकारी भी दिये गए। एक अन्य कानून Acts XXXVIII 1855 को दिसंबर में ही लागू किया गया। इसके तहत स्पीडी ट्रायल व सज़ा दिलाने का प्रावधान किया गया था। इसके तहत जनवरी 1856 के पहले सप्ताह तक अधिकतर आरोपियों को गिरफ़्तार कर लिया गया। सिदो मुर्मू ,अगस्त में ही गिरफ्तार किये जा चुके थे और उनको भागलपुर के कोर्ट से सज़ा हो चुकी थी। कान्हू सहित अन्य भी गिरफ्तार कर लिये गये। बरहेट में सिदो को फांसी दे दी गयी।

सिद्ध-कान्हू के आन्दोलन 1855-56 को हम संताप्त विद्रोह या संथाल हुल के नाम से जानते हैं। यह आन्दोलन (विद्रोह) ब्रिटिश शासन (हुकुमत), ज़मींदारी औथ महाजनी प्रथा के खिलाफ था। इस विद्रोह के बाद यहाँ संथाल परगना बना जिसके लिए 5,500 वर्ग, मील का क्षेत्र भागलपूर और वीरभूम ज़िले से लिया गया। यहाँ से महाजनी प्रथा खत्म हुई – औपनिवेश काल का अंत हुआ और इस क्षेत्र के लिए एक विशेष प्रावधान SPT Act बनाया गया। महाजनी और ज़मीन्दारी प्रथा भी समाप्त हो गई। 

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  • कोर्दुला कुजूर आदिवासी एक्टिविस्ट हैं और रांची, झारखंड में रहती हैं। महिलाओं और बच्चों के सवालों पर वह लंबे समय तक काम करते आ रही है और झारखंडी आदिवासी वुमेन्स एसोशियन शुरुआत करने में प्रमुख भूमिका निभाई हैं। साथ ही झारखंडी आदिवासियों के भाषा आंदोलन के सहभागी बनकर कुड़ुख भाषा को बचाए रखने का महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आयी हैं।

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