राजकुमार सिन्हा:  

नई सरकार और संसद के गठन की आपाधापी में राजधानी दिल्ली समेत देश के अनके इलाके अपने जल संकट और उबलती गर्मी की ओर अपेक्षित ध्यान नहीं खींच पाए। दिनों-दिन गहराते ये संकट क्या केवल राजनीतिक खींचतान की वजह से ही हैं? या फिर इसके ऐसे कारण भी हैं जिन्हें हल करने के लिए हमारे राजनीतिक नेतृत्व को समझदारी से ठोस कदम उठाने पडेंगे? प्रस्तुत है, इसकी पड़ताल करता राजकुमार सिन्हा का यह लेख। – संपादक

भारत का साल 2024 पिछले 15 वर्षों में सबसे तीव्र और सबसे अधिक गर्मी वाले दिनों का वर्ष बन गया है। मौसम विभाग के अनुसार उत्तर प्रदेश, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली, उत्तराखंड, हिमाचल, मध्यप्रदेश, झारखंड और बिहार में अधिकांश स्थानों पर अधिकतम तापमान सामान्य से 5.1 डिग्री सेल्सियस अधिक था। आधिकारिक आंकड़ों के हिसाब से 25000 से अधिक हीट स्ट्रोक की घटनाएँ और करीब 60 लोगों की मौतें हुई हैं। इन आंकड़ों में मतदान के दौरान भीषण गर्मी से होने वाली चुनाव कर्मियों की मौतें शामिल नहीं हैं। आंकड़ों के अनुसार केवल अंतिम चरण के मतदान में 33 चुनाव कर्मियों की मौतें हुई थी। ये आधिकारिक आंकड़े हैं, असली संख्या इससे कई गुना अधिक हो सकती है।

‘लेसेंट प्लेनेटरी हेल्थ’ की स्टडी के अनुसार वर्ष 2000 से 2019 के बीच दक्षिण एशिया में हर साल गर्मी से एक लाख दस हजार से अधिक मौतें हुई हैं। वैज्ञानिक गर्मी के प्रभाव को तापमान और नमी के हिसाब से देखते हैं। तेज गर्मी और हवा में नमी की मात्रा बढ़ जाए तो यह इंसान के लिए मारक हो जाता है। पिछले 100 सालों में भारत में धरती का तापमान लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। यहाँ गर्मी के कारण 2030 तक श्रमिकों के काम के घंटे कम होने से ‘सकल घरेलू उत्पाद’ (जीडीपी) को 2.5 – 4.5 प्रतिशत तक नुकसान का खतरा रहेगा। यह 12 लाख करोड़ रुपए से 20 लाख करोड़ रुपए के बीच हो सकता है। 

भारत ही नहीं, पूरी दुनिया को बढ़ते तापमान ने झकझोर दिया है। पिछले वर्षों में दुनिया के कई देशों में रेकार्ड- ब्रेकिंग तापमान दर्ज किए गए हैं। जैसे – जुलाई 2022 में इंग्लैंड में पहली बार तापमान 40 डिग्री पार कर गया तो चीन के उत्तर- पश्चिम के एक छोटे शहर में पिछले साल 52 डिग्री तापमान दर्ज किया गया था। यह चीन में अब तक का सबसे अधिक दर्ज तापमान है। 2021 में इटली के सिसली में 48.8 डिग्री तापमान था जो यूरोप में अब तक का सबसे अधिक तापमान था। इस साल हज के दौरान कम-से-कम 645 हज यात्रियों की मौत हीटवेव से हो चुकी है जिसमें 68 भारतीय हैं। ‘सउदी अरब राष्ट्रीय मौसम विज्ञान’ के अनुसार 17 जून 2024 को मक्का की ‘ग्रैंड मस्जिद’ में तापमान 51.8 डिग्री तक पहुँच गया था।

दूसरी ओर नई स्टडी में खुलासा हुआ है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक महासागर में 2030 तक ग्रीष्मकालीन समुद्री बर्फ पूरी तरह गायब हो सकती है, यानि अगले सात साल में गर्मियों में इस महासागर में बर्फ नजर नहीं आएगा। आर्कटिक बर्फ पृथ्वी की इम्युनिटी है, ये नहीं रही तो ग्लोबल ईको सिस्टम बिगड़ेगा। ग्लोबल वार्मिंग से हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की रफ़्तार 15 प्रतिशत तक बढ़ रही है जिससे बर्फीली झीलों पर खतरा बढ़ रहा है। बढ़ती गर्मी के कारण झीलें साल-दर-साल पिघल रही हैं।

कश्मीर, लद्दाख़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश की 28043 ग्लेशियर झीलों में से 188 झीलें कभी भी तबाही का बड़ा कारण बन सकती हैं। इससे लगभग तीन करोड़ की आबादी पर बड़ा संकट मंडरा रहा है। 2023 में सिक्किम में लहोनक ग्लेशियर झील फटने से 180 लोगों की मौत और लगभग 5000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। 2021 में उतराखंड नीति-घाटी की बड़ी ग्लेशियर झील फटने से 205 लोगों की मौत और लगभग 1500 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। 

‘क्लाइमेट ट्रेंडस’ की प्रबंध निदेशिका आरती खोसला के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान से सूखे की स्थिति पैदा होगी जिससे मीठे पानी के महत्वपूर्ण स्रोत प्रभावित होंगे। इसी वर्ष के अधिकारिक आंकड़ों के अनुसार देश के 150 मुख्य जलाशयों की मानीटरिंग में पता चला है कि इनमें 39.765 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) पानी बचा है जो कुल भंडारण क्षमता का सिर्फ 22 प्रतिशत है।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में लोग भीषण गर्मी के बीच पानी की गंभीर कमी का सामना कर रहे हैं। टैंकरों से पानी भरने के लिए लम्बी कतारें देखी गई हैं। देश के 6,533 ब्लॉकों में से 27 प्रतिशत में भूगर्भ जल काफी नीचे, खतरनाक स्थिति तक पहुँच गया है। इसमें से 11 प्रतिशत डार्क जोन की श्रेणी में हैं। देश में भूगर्भ जल की सबसे खराब हालत राजस्थान में है। यहां 203 डार्क जोन हैं। 

2048 तक दुनिया के औसत तापमान में 4 डिग्री बढ़ोतरी होने का अनुमान है। गर्मी बढ़ने से उर्जा की मांग ब बढ़ेगी, जिससे वायु प्रदूषण फैलेगा। इससे दुनिया में 70 लाख मौतें हो सकती हैं। गर्मी के कारण कृषि पैदावार में गिरावट आने से भुखमरी बढ़ेगी, अकाल जैसे हालात हो सकते हैं। विश्वबैंक के अनुसार सिर्फ ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ही 2030 तक दुनियाभर में अतिरिक्त 13 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे पहुँच सकते हैं।

यूएन’ की ‘वर्ल्ड माइग्रेशन रिपोर्ट 2024’ में दावा किया गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण 2050 तक 21 करोड़ से ज्यादा लोग विस्थापित होने के लिए मजबूर होंगे। ऐसे कई अनुमान हैं, जो अर्थव्यवस्था पर बढ़ते तापमान के नकारात्मक असर को लेकर चेतावनियाँ जारी कर रहे हैं। भारत के लिए हालात इसलिए और गंभीर हैं, क्योंकि हमारे यहां 47 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वाले दिनों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। बीते 12 साल में ऐसे तापमान वाले राज्यों में राजस्थान (145 दिन), आंध्रप्रदेश (111), ओडिशा (108), हरियाणा (101), झारखंड (99) और मध्यप्रदेश (78 दिनों) हैं। 

ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण बहुत ज्यादा गर्मी, अत्यधिक ठंड, बेकाबू बारिश जैसे प्रत्यक्ष प्रभाव शामिल हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के लिए दक्षिण- पश्चिम मानसून बहुत महत्वपूर्ण है। भारत की वार्षिक वर्षा का 75 प्रतिशत हिस्सा इसी से मिलता है। ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण इसमें अनिश्चितता बढ़ी है। इससे कृषि उत्पादन पर गहरा असर होने वाला है। 

एक शोध के अनुसार 2023 में दुनियाभर में कार्बन डाइ-ऑक्साइड का उत्सर्जन 40 बिलियन टन से ज्यादा रहा है, जिसमें जीवाश्म ईंधन से लगभग 37 बिलियन टन उत्सर्जन शामिल है। ‘नेशनल ओशिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन, अमेरिका’ के अनुसार औद्योगिक क्रांति के पहले मानव सभ्यता के लगभग  6,000 वर्षों तक कार्बन डाइ-ऑक्साइड का स्तर लगातार 280 ‘पार्ट पर मिलियन’ (पीपीएम) के आसपास था। तब से मनुष्यों ने 1.5 ट्रिलियन टन कार्बन डाइ-ऑक्साइड प्रदूषण उत्पन्न किया है, जिसका अधिकांश भाग हजारों वर्षों तक वातावरण को गर्म करता रहेगा।

‘पेरिस जलवायु समझौता’ अंतर्राष्ट्रीय संधि है, जिसे 2015 में अपनाया गया था। इसमें वैश्विक तापमान 2 डिग्री सेल्सियस नीचे करने और 1.5 डिग्री तक वृद्धि रोकने के प्रयासों को आगे बढाया गया है। समझौते में कहा गया है कि विकसित देश अपने मौजूदा दायित्व को जारी रखने में ‘शमन और अनुकूलन’ (मिटिगेशन एंड एडोप्टेशन) दोनों के सबंध में विकासशील देशों को वित्तीय सहायता प्रदान करेंगे। देशों ने 2030 तक अपना लगभग 40 प्रतिशत बिजली उत्पादन जीवाश्म ईंधन के बजाय नवीकरणीय उर्जा स्रोतों से प्राप्त करने पर सहमति जतायी है जिससे कार्बन उत्सर्जन कम किया जा सके, परन्तु इसमें आशाजनक प्रगति होती दिखाई नहीं दे रही है।                                         

सवाल उठता है कि हवा, पानी, मिट्टी की कीमत पर विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अर्थव्यवस्था को बढ़ाना आधुनिकता है या मूर्खता? ‘आईआईटी, बाम्बे’ के प्रोफेसर चेतन सिंह सोलंकी कहते हैं कि पेड़ लगाना यकीनन बहुत ज़रूरी है और हम सभी को नियमित रूप से पेड़ लगाना भी चाहिए, परन्तु ज़्यादा समझदारी का दृष्टिकोण यह है कि संसाधनों की खपत पर लगाम और कार्बन उत्सर्जन में कटौती की प्राथमिकता को अमल में लाया जाए। 

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