चंचल:
हमारे संविधान में समता का अधिकार एक महत्वपूर्ण मूल्य है। हम भारत के लोगों को इस मूल्य को मजबूत बनाने और क्रियांवित करने के लिए प्रयास करना चाहिए। इसमें हमारी बराबर की भूमिका होनी चाहिए। समता के इस विषय को ध्यान में रखते हुए पब्लिक ट्रांसपोर्ट से यात्रा के दौरान जो मैं देख-समझ रही हूँ, इस उम्मीद के साथ साझा कर रही हूँ कि हर लड़की के लिए सीखने, समझने, पढ़ने-लिखने और काम करने के लिए सुलभ और सहज अवसर बने।
पब्लिक ट्रांसपोर्ट में महिलाओं को यात्रा करने के दौरान बहुत समस्या का सामना करना पड़ता है। मैं ग्रामीण क्षेत्र की रहने वाली हूँ और मुझे अपनी पढ़ाई और कार्य स्थल पर जाने के लिए शहरी क्षेत्र में आना पड़ता है, जिसके लिए मैं पब्लिक ट्रांसपोर्ट का सहारा लेती हूँ। पब्लिक ट्रांसपोर्ट में यात्रा करते समय मुझे बहुत समस्या का सामना करना पड़ता है। जैसे ऑटो में तीन लोग की जगह में चार लोगों को बैठा दिया जाता है। जिस ऑटो में लड़की बैठी रहती है, ज़्यादातर लड़के और अधेड़ उम्र के मर्द भी उसी में बैठना पसंद करते हैं और मोबाइल और पर्स निकालने के बहाने अपना हाथ-पैर, इधर-उधर छूने की कोशिश करते हैं। इसको किसी भी यात्रा करने के दौरान खुली आँखो और स्वस्थ्य दिमाग से देखा समझ जा सकता है। ऑटो वाले कभी भी कहीं भी ऑटो रोक देते हैं, जिससे उतरने-चढ़ने वालों के साथ-साथ सड़क पर अन्य गाडियाँ भी लड़ते-भिड़ते, बचते-बचते अपनी यात्रा करते हैं। मैंने अक्सर देखा हैं कि सड़क पर कहीं भी गाड़ी खड़ी कर दी जाती है, जिससे दुर्घटना होने के आसार बढ़ जाते हैं। इन दुर्घटनाओं से बच निकलकर काम करने और पढ़ने आने वाली लड़कियों के सामने आज़ादी के साथ बाहर निकलने में कई चुनौतियाँ आती हैं।
गाड़ियों में अक्सर बेहूदा गाने बजा देते हैं। ज़्यादातर गाड़ी चालक गुटखा, पान-मसाला आदि खाकर गाड़ी चलाते हैं। साथ ही कुछ पुरूष यात्री भी गुटखा खाकर ऑटो में बैठ जाते हैं और जब बोलते हैं तो गुटखे की छींटे ऊपर आ कर पड़ते हैं। यही नहीं कभी-कभी तो उनके बैठने का तरीका सही नहीं होता है। उनका हाथ पैर इधर-उधर जाता रहता है, जिससे यात्रा करने में कभी कभी डर भी लगता है। एक बार की बात है, मैं इंटर्नशिप कर रही थी और उस दिन मुझे घर जाने में काफी देर हो गई थी। मुझे ऑटो नहीं मिल रहा था। मैं बहुत डर गई लेकिन मुझे एक ऑटो मिला और मैं घर के लिए निकली। उस ऑटो में मैं ही अकेली लड़की थी, जिससे मुझे थोड़ा और डर लग रहा था। उस ऑटो में बैठा एक पुरुष बार-बार आगे-पीछे हो रहा था। जिससे हमको बहुत अजीब लग रहा था। कुछ देर ऐसे ही चलता रहा, फिर मैंने उसको टोक दिया कि आप ठीक से बैठिए। मेरे टोकने के बाद वह व्यक्ति थोड़ी देर के लिए सही से बैठ गया, लेकिन उसके बाद उसने फिर वही हरकत करना शुरू कर दिया। उसके बाद मैंने ड्राइवर से उसकी हरकत के बारे में बताया। जिसके बाद ड्राइवर ने उस आदमी को ऑटो से उतार दिया। उस समय हमको बहुत सुकून महसूस हुआ।
अभी कुछ समय पहले हमारे अयोध्या में AC बस चलना शुरू हुआ था, जब राम मंदिर का उद्घाटन था। तब कुछ दिनों तक हमें यात्रा करने में अच्छा लगा क्योंकि उसमें बैठने की अच्छी व्यवस्था थी, लेकिन कुछ दिनों बाद फिर वह बस भी बंद हो गयी। अब हमे फिर इन्हीं समस्याओं का सामना करना पड़ता हैं। समय पर ऑटो न मिलना, जिससे ऑफिस हो या घर समय से न पहुंच पाना ये मेरे लिए बहुत ही बड़ी समस्या है।
मैं यह सोचती हूँ जब इतना पढ़ने-लिखने और जागरूक होने के बाद मैं इन समस्याओं का सामना कर रही हूँ तो अन्य महिलाओं और लड़कियों को भी इन्हीं समस्याओं से जूझना पड़ता होगा। इसलिए हमको किसी से शिकायत की बजाए अपने लिए सहज यात्रा एवं अन्य अवसरों को पाने के लिए खुद कोशिश करना चाहिए। अपने घरों में अपने भाई, पिता और अन्य लड़कों के साथ पब्लिक स्पेस में रहने के तौर-तरीकों पर संवाद करने की ज़रूरत है। उनको बताना होगा कि हम किस तरह की समस्याओं का सामना करते हैं। हमको अपने समाज को बनाने और संवारने की ज़िम्मेदारी खुद लेनी चाहिए। यहीं भारतीय नागरिक का कर्तव्य है।
फीचर्ड फोटो आभार : india.com

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