महिपाल सिंह (मोहन):

पूरण रावल- उन्हें मैं प्यार से ‘पूरण दा’ कहकर संबोधित किया करता था। पूरण दा से मेरी पहली मुलाक़ात काठगोदाम में एक मीटिंग के समय हुई थी, वो मुलाक़ात थी तो बस कुछ मिनटों की ही, लेकिन उनका स्वभाव ऐसा था की उनकी छवि हमेशा के लिए मेरे दिलों दिमाग पर बन चुकी थी। कुछ ही समय बाद हम देहरादून में मिले, लेकिन वो एक नए पूरन दा थे, एक लड़ाकू इंसान जो सभी को साथ लेकर अपने जंगलों को बचाने के लिए हमेशा तैयार रहने वाला था।

कुछ ही समय बाद 9 सितंबर 2021 को भवाली के एक होटल में उनसे फिर मुलाक़ात हुई। इस मुलाक़ात के बाद उनके साथ हमेशा के लिए एक प्यार भरा दोस्ताना रिश्ता बन गया। इस मुलाक़ात में हम जब अपने जीवन की कहानियाँ एक दूसरे के साथ साझा कर रह थे तो पूरण दा की संघर्ष की दास्तान को सुना। इतिहास और भूगोल के ज्ञान का भंडार उनके भीतर मौजूद था। बातों ही बातों में जब नॉर्थईस्ट (उत्तर-पूर्व भारत) की बात छिड़ी तो युवा जीवन के समय इंडियन आर्मी में एक बिजलीकर्मी के रूप में नार्थईस्ट में बिताए दिनों की कहानियों को भी उन्होने सुनाया था।

मार्च 2022 में हम एक साथ नागपुर गए थे, मुझे याद है कि नागपुर की गर्मी में से वह कितने दुखी थे। उन्होने अपना बैग को खोलकर दिखाया था कि उसमें ठंड से बचने के कपड़े भरे थे, जिसे देख वह बार-बार हँसते और अपनी पत्नी को याद करते। वह कहते कि यार पत्नी ने कहा ठंड होगी इसीलिए गर्म बनियान और जैकिट के साथ थर्मल भी दे दिया, अब क्या करूँ इसका। आपका हुड़का और आपकी टोपी सभी को हमेशा याद रहेगी।

सामाजिक परिवर्तन शाला में जुड़ने के बाद हम राजस्थान के झिरी गाँव में गये, उन सात दिनों में वह कई बार गाँव में घूम-घूम वहाँ के लोगों से मिलते और उत्तराखंड के बारे में बताते और उनसे राजस्थान के बारे में जानकारी लेते। मुझे आज भी वो पल याद है जब एक शाम हल्की सी बारिश हो रही थी और हम दोनों गाँव में घूम रहे थे। घूमते-घूमते एक घर के पास रुकर वह घर के लोगों से बात करने लगे, कुछ देर बाद उस परिवार ने हमको अपने घर के आँगन में बैठने को कहा। परिवार आग जलाकर गेहूं की बालियाँ आग में भूनकर एक थाली में जमा कर रहे थे, हम दोनों ने भी उनके साथ वो भुने गेहूं को खाया था। पूरण दा के साथ दिल्ली से झिरी और झिरी से दिल्ली का सफर कभी भूले नहीं भुलाता। वो झिरी गाँव के मंथन स्कूल की रातें, जब आप मैं, विकास, ललित, रमेश, मान सिंह और दामोदर भाई छत में बैठकर कई सारी बातें किया करते, एक दूसरे के व्यक्तिगत जीवन और अपने संघर्षों को साझा करते। आपकी वो सुरीली ‘नियोली’ भुलाए नहीं भूलती है। पहली बार एक साथ नागपुर जाने से जो सफर शुरू हुआ वो महाराष्ट्र के गढ़ चिरोली तक चला और फिर उत्तराखंड के भीमताल में अंतिम बार आपसे मिले।

पूरण दा अभी पिछली 3 मई को तो आपसे मिले थे, वही आपके साथ अंतिम मुलाकात होगी ऐसा कभी ना सोचा था। कितनी सारी बातें की थी हमने, कई सारे काम हम मिलकर करने वाले थे। आपने तो कहा था कि जब तक ये शरीर साथ देगा, आप इस प्रकृति के लिए, इस उत्तराखंड को बचाने के लिए लड़ते रहेंगे। फिर अचानक ही इस काम को अधूरा छोड़कर आप कहाँ चले गए! आपके जैसा लड़ाकू और उतना ही प्यार करने वाला ज़िंदादिल इंसान मिलना बहुत मुश्किल है।  दिल से प्यार करने वाले कोई ऐसा नहीं होगा जो आपकी उस प्यारी सी हँसी को भूल जाये। मुझे आज भी याद है जब हम मेंडालेखा गाँव में घूम रहे थे और बातों ही बातों में आपने कहा था कि हमें भी अपने उत्तराखंड में अपने जंगल को इसी तरह से बचाकर लोगों के हाथो में देना है।

काश प्रकृति की तरह आपने अपनी भी थोड़ी सी भी देखभाल की होती। मैं समझ सकता हूँ कितना मुश्किल है एक बड़ी बीमारी के बाद पहाड़ों में रहने वाले एक व्यक्ति के लिए दिल्ली जैसे भीषण गर्म वाले जगहों पर आकर लंबे समय तक ठहर कर इलाज करवाना। लेकिन फिर भी आपको इस प्रकृति और उत्तराखंड के जंगलों को बचाने के लिए रुकना था। जंगल और प्रकृति बचाने के लिए आप हमेशा ही सभी को साथ लेकर चलते रहे, कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक के सरपंचों को एक साथ लाकर, एक संगठन बनाकर जो एक लड़ाई शुरू हूई थी वो आपके बिना अधूरी है। वन पंचायतों के अधिकारों को लेकर हमेशा आगे आकर खड़े रहने वाले पूरण दा की भरपाई कोई नहीं कर पाएगा।  

फीचर्ड फोटो आभार: महिपाल ‘मोहन’

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  • महीपाल, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

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