सुधीर कटियार:

संगठन का काम करने के लिए खेमराज ने अपनी ज़िंदगी में बहुत से अड्डे जमाये। खेमराज खुद, उसके साथ में दुनिया बदलने का सपना आँखों में संजोये एक-दो मध्यमवर्ग के युवा, और स्थानीय साथी। अड्डे की जगह चुनने के लिए खेमराज का अपना नज़रिया था, जगह सुन्दर होनी चाहिए। जंगल नाला पास में हो तो बेहतर। सगवाड़िया की में खुला मैदान था और फिर आधे किलोमीटर बाद एक लम्बी पहाड़ी। हवा बहती रहती थी। पहाड़ी के नीचे एक खाल (बरसाती नाला) थी, मैंने तैरना इसी खाल में सीखा।

सगवाड़िया, निम्बाहेड़ा से आठ किलोमीटर दूर है। खेमराज का घर निम्बाहेड़ा में ही था जहाँ उसका बचपन बीता। उसका पैतृक गाँव बाड़ी भी पास में ही था। खेमराज झाबुआ का काम छोड़ने के बाद कुछ समय प्रयास संस्था देवगढ़ में रहा। अब नया काम जमाने का विचार था। लक्ष्य था दस किलोमीटर दूर बिनोता खोडिब मल्ला की पत्थर खदानों के मजदूरों को संगठित करना। ऐसा अनुमान था कि इन खदानों में आस-पास के गाँव के लगभग पाँच हज़ार मजदूर काम करते थे। ज़्यादातर मजदूर पेशगी लेकर काम पर लगते थे। बिना पेशगी उतारे, दूसरी जगह काम नहीं कर सकते थे। दूसरी जगह काम पर लगने के लिए नए सेठ से पुराने सेठ को पेशगी का पैसा चुकवाना पड़ता था। अगर एक दिन भी मजदूर काम पर नहीं जाता तो सेठ उस दिन का मुनाफा पेशगी में जोड़ देता।

जिस गाँव में अपना बेस स्थापित करना हो, वहां कैसे कैसे घुसा जाए? असली मकसद तो घुसते ही समझाना भी मुश्किल। खेमराज ने अपना परिचय डॉक्टर के रूप में दिया, होमियोपैथी के डॉक्टर। गाँव में गोलियाँ बाँटना शुरू किया। खेमराज को गाँव के लोग डॉक्टर साब कह कर ही बुलाते थे, आखिरी तक जब सबको पता पड़ गया था कि डॉक्टर साब किसी और ही बीमारी के डॉक्टर हैं।

सगवाड़िया में खेमराज के साथ मध्यम वर्गीय युवा के रूप में मैं था जो अपने पुराने विकास के काम से ऊब कर अब कुछ संगठन का काम करना चाहता था। साथ में खेमराज ने जाँच परख के बाद गाँव से प्रभु लाल रावत को जोड़ा। प्रभु की उम्र तीस-पैंतीस रही होगी। वो लम्बे समय तक पास के एक बड़े जाट किसान के यहाँ हाली रह चुका था। कुछ समय बाद गाँव के एक युवा शांति लाल को भी साथ में लिया। शांति लाल पास की खदानों में काम करने जाता था। चार साल तक हम लोग इस झोंपड़ी में रहे। बीच में कुछ समय के लिए कोटा से आए रवि भी साथ में रहे।

मकान बनाने का भी खेमराज का अपना एक स्टाइल था। पैसा कम से कम खर्च किया जाए। निम्बाहेड़ा क्षेत्र में पत्थर की बहुतायत है। चिनाई आम तौर पर पतले पत्थर खंडो और गारे से की जाती है। छत के बीच में पड़ने वाले खजूर का तना खेमराज के स्थानीय मित्र देवी लाल ने भेज दिया। सागवान की साकतियाँ सीता माता जंगल से लकड़ी बेचने आये एक आदिवासी परिवार से खरीदी गयी। छत के लिए मोरबी टाइल्स भी ख़रीदे गए। तय हुआ कि खुद श्रमदान से मकान बनायेंगे। मैंने कुछ पत्थर उठा कर दिए। ज्यादा मेहनत प्रभु और शांतिलाल के हिस्से में ही आई। मकान तैयार हो गया। कई माह कच्चे फर्श से ही काम चलाया। फिर पत्थर की फर्शी लगवाई गयी।

गाँव का चयन भी बहुत सोच समझ कर किया गया था। सगवाड़िया रावतो का गाँव था। रावत आदिवासी मीणा हैं जो रावत राजपूत लिखने लगे थे। उस इलाके में रावत जाति बड़ी संख्या में थी। ज़्यादातर छोटे किसान थे और आस-पास मज़दूरी भी करते थे। खेमराज का कहना था कि रावत लड़ाकू जाति हैं, यहाँ सुरक्षा रहेगी। शुरुआत के दिनों में ही पास के सांपलिया गाँव में लस्सी राम से अच्छा संपर्क स्थापित हो गया। लस्सी राम, प्रभु का दोस्त था। उसका एक लड़ाकू ग्रुप था। प्रभु और लस्सी राम ने पास के सोलाद्पुरा गाँव के एक बंजारे की, जो ब्याज का धंधा करता था, बहुत पिटाई की थी। ये किस्सा इलाके में मशहूर था। फिर जेल भी गए। लस्सी राम की टीम बड़ी मीटिंग में साथ में रहती थी।

पहले साल दूकान कम चली। मज़दूर ज़्यादा आते नहीं थे। बारिश के दिनों में हम खाल में चले जाते और देर तक नहाते रहते। गाँव के पास खाल में एक पुराना मिटटी का बाँध था जहाँ पानी इकठा हो जाता। फिर कई बार आस-पास के खेतों में शहद के छत्ते तोड़ने निकल जाते। मैंने इस तरह के छोटे छत्ते पहली बार देखे, जो झाड़ियों में लगे होते। छत्तों तो ढूंढ निकालना और फिर केवल एक बीडी की मदद से मधुमक्खियों को उड़ा कर शहद निकाल लेना, मेरे लिए किसी अजूबे से कम नहीं था।

गाँव वालों से, मज़दूरों से बात करने में खेमराज को महारथ हासिल थी। गाँव से कोई न कोई ऑफिस में आकर बैठा ही रहता था।

मैं चार साल सगवाड़िया रहा। खेतिहर खान मजदूर संगठन के नाम से ट्रेड यूनियन का पंजीयन किया। खदान मज़दूरों के संगठन में ज़्यादा सफलता न मिलने के बाद हमने ज़मीन का काम शुरू कर दिया। हमारा काम चल निकला। इलाके में दलित आदिवासी किसानो की बहुत सी ज़मीन दूसरी जातियों के कब्जे में थी। खेतिहर खान मजदूर संगठन ने ये केस हाथ में लेने शुरू किये। एक समय ऐसा आया कि सुबह से ही लोग ऑफिस आकर बैठ जाते थे। दिन भर भीड़ लगी रहती थी। जिले की पाँच तहसीलों में काम फ़ैल गया। संगठन की एक आवाज पर पाँच सौ लोग इकट्ठे हो जाते।

बाद में खेमराज के साथ राजनैतिक लाइन को लेकर मतभेद हो गए। मैंने सगवाडिया छोड़ दिया। कुछ समय बाद प्रभु और शान्ति लाल के भी खेमराज के साथ झगड़े शुरू हो गए। खेमराज को भी बोरिया बिस्तर बांधना पड़ा। एक नए अड्डे की तलाश शुरू हो गयी।

कहते हैं भारत गाँव का देश है। हमारे शहर भी हमारे गाँव के प्रतिबिम्ब हैं। सगवाड़िया में बिताए चार सालों ने मेरी सामाजिक राजनैतिक समझ बनाने में सबसे अहम भूमिका निभाई। ये खेमराज के साथ की वजह से ही संभव हुआ।


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  • सुधीर कटियार एक सामाजिक एक्टिविस्ट हैं। वे वर्तमान में सेंटर फॉर लेबर रिसर्च एंड एक्शन नामक संस्था के साथ काम करते हैं। यह संस्था असंगठित प्रवासी मज़दूरों को संगठित करने के लिए शोध, डॉक्यूमेंटेशन, प्रशिक्षण का काम करती है। खेमराज, प्रभु लाल, सुधीर, और शांतिलाल ने 1990 से 1994 के बीच निम्बाहेडा के पास सगवाड़िया गाँव में रहते हुए खेतिहर खान मज़दूर संगठन के माध्यम से दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग के मज़दूरों और किसानों को संगठित कर उनके अधिकारों के लिए काम किया।

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