मीना:
दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था भारत में हैं। भारत में अभी विभिन्न चरणों में लोकसभा चुनाव चल रहे हैं यानि चुनाव का मौसम चल रहा है। सभी राजनीतिक दल चुनाव के मैदान में अभी एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं। वादे किए जा रहे हैं कि चुनाव जीतने के बाद हम सबसे अच्छे कार्य करेंगे, देश और गरीबों की ज़िंदगी में बहार लायेंगे। ये तो एक बात हुई पर मेरा मानना है कि हमारे देश में पिछले कुछ चुनाव मूल मुद्दों से हटके जाति, धर्म, मंदिर-मस्जिद, कश्मीर, ट्रिपल तलाक जैसे कुछ मुद्दों पर ही लड़े गए हैं। लेकिन इस बार बेरोज़गारी, महंगाई, और गरीबी के मुद्दों को चुनावों में ज़ोर-शोर से उठाया जा रहा है।
हमारे देश की ज़्यादातर पार्टियाँ चुनावों में उम्मीदवार को टिकट, उसके सेवा भाव या काम की गुणवत्ता के आधार पर नहीं बल्कि पैसे, जाति और मसल पावर देख के देती हैं। बहुत कम उम्मीदवारों को उनके काम के अनुभव, उनकी नियत और लोकतंत्र को सुचारू रूप से चलाने की समझ के आधार पर टिकट दिये जाते हैं। हमारे संविधान में ही दलित और आदिवासी समुदाय के लोगों के लिए लोक सभा में सीटें आरक्षित की गई हैं, वरना उन लोगों को कोई पूछता भी नहीं। आरक्षण की वजह से ही आज दलित और आदिवासी समुदाय अपने लोगों का, लोकसभा और लोकतन्त्र के अन्य मंचों पर प्रतिनिधित्व कर पाते हैं।
हमारे देश में दलित-आदिवासी समुदाय, जनसंख्या का 30% हैं और इन्हीं समुदायों से सबसे ज़्यादा मज़दूर आते हैं जो रोज़गार हेतु परिवार के साथ या अकेले पलायन करते हैं। मुझे समाज के अमीर और मध्यम वर्ग से पूछना है कि चुनाव की इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में ये मज़दूर कहाँ हैं? जाति और धर्म में बंटे मज़दूरों के मुद्दे, चुनाव में दबे से रह जाते हैं। अपनी समस्याओं में उलझे हुए मज़दूर कभी लोकतंत्र या वोट का मूल्य समझा ही नहीं, या कहें कि उसे समझने ही नहीं दिया गया। राजनीति में अलग-अलग दल मज़दूरों को हमेशा एक ‘साधन’ के रूप में इस्तेमाल करते हैं। उनमें भी असंगठित क्षेत्र के प्रवासी मज़दूर अपनी समस्याएँ कभी ठीक तरीके से रख भी नहीं पाते हैं।
वो भूल जाते हैं खुद की आपबीती, कोरोना काल की परेशानियाँ, और आए दिन होते मज़दूरों के एक्सीडेंट, मज़दूर की ज़िंदगी की कोई कीमत ही नहीं रही है। मज़दूरों के सवास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के लिए मौजूद ईएसआई और पीएफ जैसी योजनाएँ असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए नहीं है। चुनाव में इस तरह का मुद्दा क्या कोई उठाता है? साथियों, हम सबको पता है कि कोरोना काल के दौरान देश की सरकार से सुप्रीम कोर्ट ने जब मज़दूरों की सही जानकारी मांगी तो वह उसके पास नहीं थी। मज़दूरों के लिए संवेदनशीलता का इस अभाव में आज भी कोई बदलाव नहीं दिखता है। चुनाव प्रचार के लिए और वोटिंग की जागरूकता फैलाने के लिए सरकार और देश की अफसरशाही (bureaucracy) कैसे-कैसे माध्यम अपनाती हैं, लेकिन चुनाव के इस दौर में कई मज़दूर जब अपने घर-परिवार से दूर हैं, तो इन्हें वोटिंग हेतु घर भेजने या इनके मतदान को तय करने के लिए सरकारें कुछ क्यूँ नहीं करती? 13 मई के गुजराती अखबार दिव्य भास्कर में तस्वीर के साथ मज़दूर की स्थिति फोटो के साथ छपी है कि मध्य प्रदेश में लोकसभा चुनाव हेतु मज़दूरों को घर जाना था पर ट्रेन में जगह नहीं थी। ऐसे में ये मज़दूर लाचार हालत में या तो लटक-लटक कर गए होंगे या लोकशाही के महापर्व से वंचित रह गए होंगे। देशभर में ऐसी असंख्य घटनाएँ होती हैं। आज के दौर में मज़दूर लोकशाही का महत्व या अपने वोट की ताकत ही नहीं समझ पाया हैं, और इस स्थिति को बनाए रखने में सरकारों का खासा योगदान रहा है।
अपनी सरकार, यदि कोई कुदरती या मानव सृजित दुर्घटना विदेश में होती है तो अपने लोगों के लिए विमान भेजती है और उनके लिए अच्छी व्यवस्था करती है। वो करना भी चाहिए पर चुनाव में मज़दूरों के लिए ट्रेन या बस की कोई व्यवस्था नहीं है, उन्हें तो उल्टा ज्यादा पैसा देना पड़ता है। एक ओर ‘इकोनामिक ग्रोथ’ होती है और दूसरी ओर मज़दूर कभी बोलता ही नहीं। जब मज़दूर ना बोलता है ना राजनीति करता है तो ऐसे में वह जाति और धर्म जैसे मुद्दों पर ही वोट करता है। मज़दूर जिस दिन वर्ग भेद के महत्व को समझेगा उस दिन चुनाव का चित्र अलग होगा। मुठ्ठीभर उद्योगपतियों के दम पर आज पार्टियाँ चुनाव लड़ती हैं, जब उनकी जगह लाखों मज़दूर मैदान में आएंगे तो वर्ग विहीन समाज की रचना का नया दौर भी साथ लायेंगे। उसी उम्मीद के साथ नई शुरुआत की सोच रखती हूँ, यह बात अलग है कि अपने देश में जाती व्यवस्था इतनी मज़बूत है कि लोकतंत्र में वर्ग भी कोई मायने नहीं रखता है। चुनाव में भी वर्ग की जगह जाती ही देखी जाती है। फिर भी नई सुबह कभी तो आयेगी, जब मज़दूर के हाथ में सत्ता की बागडोर होगी और सबको बराबरी का हक मिलेगा, काम का सही दाम मिलेगा।

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