सिम्मी:

फैजाबाद शहर के बीच में एक आलीशान मकबरा हैं, यह अपने आप में बहुत ही खूबसूरत इमारत है और इसे लोग बहू बेगम का मकबरा कहते हैं। मकबरे के चारों ओर की बसावट चीख-चीख कर यह बताती है कि वहाँ पूरी तरह से मकबरे में काम करने वाले और वहाँ की ज़रूरतों का खयाल रखने वाले लोग ही रहते थे। स्थानीय लोगों का मानना हैं की मकबरे का परिसर लगभग 400 बीघे का है, इसके बीच में मकबरा है जो चारों तरफ से पेड़-पौधों, खेत-खलियान और तरह-तरह के फलदार और छायादार पेड़ पौधों से घिरा हुआ है। मकबरा गेट से बाहर आप निकलेंगे तो देखेंगे कि कई छोटे-छोटे क्वार्टर हैं। इन्हें देखकर समझ आता है कि मकबरे की देख-रेख करने वाले लोग इनमें रहा करते रहे होंगे। बेगम के साथ ही वह सब इसमें रहते थे। 

मकबरे के ऊपर एक मोर लगा हुआ है। मेरी दादी बताती है कि जब भी हवा का रुख बदलता है तो वह अपने आप हवा का रुख बताता है। मेरे मोहल्ले के बच्चे जब पतंग उड़ाने के लिए हवा का रुख जानना चाहते थे तो मकबरे के मोर की पूँछ देखकर हवा का रुख पता कर लिया करते थे और आज भी हम लोग उसे देखकर पता कर लेते हैं। मकबरे की चारों तरफ की बसावट की बात करें तो हर जाति-धर्म के लोग इसके चारों ओर बसे हुए हैं। मकबरे के बाएं तरफ मिट्टी के बर्तन बनाने वाली बहुत सारे कुम्हार हैं। पहले जमाने में लोग मिट्टी के बर्तन का ही प्रयोग किया करते थे। पानी रखने से लेकर खाना खाने तक, उन्हें ही लोग शुद्ध मानते थे। धीरे-धीरे लोग तांबा-पीतल की तरफ बढ़े। मकबरे के सामने बहुत सारी खटीक बिरादरी के लोग बसे हैं जो सब्जी बेचते हैं और सब्जी उगाने वाले मौर्य जाति के लोग भी यहाँ मिल जायेंगे। मेरे मोहल्ले का नाम भी मुरावन टोला हैं। मकबरे के सामने मुसलमान माली रहते हैं, कहते हैं कि पीढ़ी दर पीढ़ी उनके यहाँ यही काम होता आया है। उनके दादा, परदादा नवाब के समय से फूल माली का काम करते आए हैं। उन्हीं के बगल में दर्जी और मोची भी हैं जो जूता बनाने का काम और कपड़ा सिलने का काम भी करते थे। कुछ परिवार मनिहार है जो चूड़ी पहनाने का काम करते हैं। 

जिनका भी परिवार मकबरे के पास बसा हुआ है, वह सब पीढ़ी दर पीढ़ी से यही काम करते आ रहे हैं। मेरी दादी बताती थी कि मकबरे के आस-पास रहने वाले लोग मकबरे के अंदर काम करते थे और जो इसके आस-पास आज जो भी लोग हैं वह उन्हीं के खानदान के लोग हैं। मकबरे के आबाद होने के साथ यह जगह आबाद हुई थी। जिस तरह की बसावट आप मकबरे के आस-पास देखेंगे, पूरे फैजाबाद में नहीं दिखेगी। 

बहुत सारे लोग बेगम साहिबा के बारे में बहुत से कहानियाँ बताते हैं। ऐसी ही एक कहानी है कि एक बार बेगम साहिबा को इमली खाने का मन हुआ लेकिन फैजाबाद में उन्हें कहीं भी इमली नहीं मिली। जब यह बात नवाब को पता चली तो उन्हें लगा कि हमारी बेगम को जब इमली नहीं मिली, तो आम औरतों को इमली मिलना तो असंभव ही होगा। ऐसे में उन्होंने फरमान सुनाया कि फैजाबाद में जहाँ भी खाली जगह दिखे वहाँ इमली का पेड़ लगा दिया जाए। फिर उनके एक मुलाजिम ने बेगम साहिबा को कहा कि इमली का पेड़ साल में बहुत सारे फल देता है, इतनी सारी इमली तो आप अकेले नहीं खा पाएँगी। इसके जवाब में बेगम साहिबा ने कहा कि हम नहीं खा पाएंगे पर फैजाबाद में रहने वाले लोग जब भी इमली खाएंगे तो हमें याद करेंगे। 

मकबरा गेट से सामने से जो रास्ता निकालकर जी आई सी होते हुए सहदतगंज तक जाता था, उस रास्ते पर दाएँ से बाएँ तक हर जगह इमली के पेड़ लगा दिये गए। इसके बाद से उस रास्ते का नाम ही इमली कतार हो गया था। वहाँ पर हर तरह का इमली का पेड़ था जिस पर तरह-तरह की इमली मिल जाती थी। आज भी फैजाबाद के कोने-कोने में इमली के पेड़ आपको देखने को मिलेंगे, और कहीं पर इतने इमली के पेड़ नहीं मिलेंगे। हम जब भी स्कूल जाते थे तो लाल इमली और चौड़ी वाली लाल इमली, इमली कतार से उठाकर खाते थे। जब फ़ैज़ाबाद शहर का पहला ओवरब्रिज जी आई सी रेलवे लाइन पर बना तो इमली कतार के सारे पेड़ काट दिए गए। मुझे बहुत दु:ख हुआ था। अभी एक-दो पेड़ बचे हुए हैं जो आज भी फल देते हैं। मकबरे में चारों तरफ दिवारी है, यहाँ के अमरूद बहुत मीठे होते हैं। पूरी बगिया अमरुद की है, जब हम लोग छोटे थे तो वहां से अमरूद और बेर तोड़कर लेकर आते थे।

मेरे मोहल्ले में एक दादी रहती है, वह अपनी बात जब भी शुरू करती हैं तो कहती हैं कि आज़ादी के आस-पास जब वह बचपन में फैजाबाद आई थी तो मकबरा चमकता हुआ दिखता था। मकबरा आज भी बरसात के बाद चमकता है, यह मकबरा नवाब सुजाऊदौला ने अपनी बेगम के लिए बनवाया था।  

आज मकबरे के चारों तरफ बसे लोग बदलती दुनिया में, बदलते काम के तौर तरीके में खुद को बहुत फिट नहीं कर पाए हैं। माली, मोची, कुम्हार, दर्ज़ी, आदि का बहुत मेहनत के बाद भी सहज जीवन का सपना साकार नहीं हो पा रहा है। व्यवस्था के बदलने से बसाहट नहीं बदलती है और यहाँ के लोगों के आपसी रिश्ते भी बहुत मज़बूत हैं, क्योंकि यहाँ मिक्स बसाहट है। हर कोई एक दूसरे के साथ खड़ा होता है। एक दूसरे के दुख-मुसीबत में साथ देता है। यहाँ से हम अवध की साझी विरासत और साझी सांस्कृतिक की थोड़ी झलक को देख सकते हैं।

Author

  • सिम्मी, फैज़ाबाद उत्तर प्रदेश से हैं। वह अवध पीपुल्स फोरम के साथ जुड़कर युवाओं के साथ उनके हक़-अधिकारों, आकांक्षाओ, महिलाओं के सवाल, शिक्षा, स्वास्थ्य, और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर काम करती हैं।

    View all posts

Leave a Reply

Designed with WordPress

Discover more from युवानिया ~ YUVANIYA

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading