प्रथ्वीराज सिंह:
” कुछ पल भले ही
मृत्यु के हों
होते हैं उत्सव जैसे
जैसे रात सोये
खाने के बाद और
सुबह की चाय के साथ
आया कोई झकझोरा
तो पता चला कि
हम रहे ही नहीं
जब मौसम सुहाना था
नहीं थी उसमें
कोई विरानी
बादलों की पतली रेखाएँ
और खूब खुश-खुश सा
नुमायदार था आसमान
एक क्षितिज के दोनों छोर तक
अपने अगास में
ऐसे ही भरपूर मुस्कुराती थी
आमा भी
ऐसे ही एक दिन
ऐसी ही एक सुबह
ऐसे ही मर गई थी
आमा
उसके पास था अपना
एक बड़ा सा ट्रंक
ट्रंक में थी
छोटी-छोटी पोटलियां
जिनमें से निकलती थी
ज़्यादातर
चीनी, चाय-पत्ती, नमकीन
जो बचा लेती थी
अक्सर
भागदौड़ और
कभी-कभी
शर्मिन्दगी भी
पोटलियाँ और भी थी
और बन्द थे उनमें-
अवसरों के गीत
मौसमों के बीज
प्यारी झिड़की- मीठी गाली
थोड़ी कहानी थोड़ी पुरानी
मेरे नये दोस्तों के नाम
जो बैठते हैं सटीक
उन पर आज भी
शायद बन्द था
समय भी
उसी ट्रंक की
किसी पोटली में
हमेशा की तरह
रात में कभी
खाने के बाद
खोला होगा दादी ने ट्रंक
बनाई होंगी कुछ तो
खोली भी होंगी
कुछ पोटलियाँ
उन्हीं किसी में
निकली होगी
देखी होगी दादी ने
एकबारगी
एक बेहतरीन मृत्यु भी
माँ के पास भी है
ऐसा ही एक
उसका अपना ट्रंक
उसमें रखी पोटलियाँ
भी हैं माँ की अपनी
कुछ कागज़ की
पन्नी की, कुछ
और कपड़े की भी
(धना देवी (लेखक की दादी) के लिए 8 नवंबर 2004 को उसके मरने के बाद)

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