तरुण जोशी:
भारत को युवाओं का देश कहा जाता है। पूरी दुनिया के मुकाबले में हिंदुस्तान में युवाओं की संख्या सबसे अधिक है। भारत में 50% से अधिक जनसंख्या 25 वर्ष से कम उम्र के लोगों की है और 65% से अधिक जनसंख्या 35 वर्ष से कम उम्र की है। यूएनडीपी के आंकड़ों के अनुसार दुनिया में 121 करोड़ युवा है, जिनमें सबसे ज़्यादा 21% भारतीय हैं। युवाओं की यह संख्या देश में एक बड़ी उम्मीदों को जगाती है। पर वास्तव में क्या हम इस युवा शक्ति का बेहतर इस्तेमाल कर पा रहे हैं।
वर्तमान चुनाव के संदर्भ में यह देखना दिलचस्प होगा कि इनमें युवाओं की भूमिका और भागीदारी किस तरह की है। लोकतंत्र में चुनाव एक बहुत बड़ा पर्व है, जिसके माध्यम से सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित की जाती है। चुने गए सदस्य ही देश के लिए नीतियों का निर्माण करते हैं जिसके माध्यम से देश का विकास संभव हो पता है।
युवाओं के नजरिए से देखें तो युवाओं की भागीदारी संसद के चुनाव में बहुत ही सीमित है। वर्ष 2014 में 9500 और 2019 में 10000 उम्मीदवारों ने लोकसभा का चुनाव लड़ा, इनमें से महज 5% ही 25 से 30 आयु वर्ग के थे। दोनों ही चुनाव में क्रमशः 26 और 32 उम्मीदवार ही 5% से अधिक मत प्राप्त कर पाए। यदि जीत की बात करें तो 2014 में 16 और 2019 में 8 उम्मीदवार युवा वर्ग से जीतकर आए, पर ज़्यादातर यह राजनीतिक परिवारों से ही जुड़े हुए थे।
संसदीय चुनाव लड़ने के लिए आयु सीमा घटाने हेतु एक संसदीय समिति का गठन सुशील कुमार मोदी के नेतृत्व में किया गया था। जिसने चुनाव लड़ने के लिए आयु सीमा घटकर 18 वर्ष किये जाने की वकालत की है, फिलहाल चुनाव आयोग ने इसे स्वीकृति नहीं दी है। जबकि दुनिया के कई लोकतांत्रिक देश कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रेलिया आदि में 18 वर्ष पूरे होते ही चुनाव लड़ा जा सकता है। वहीं भारत में न्यूनतम आयु सीमा 25 वर्ष है, इसे घटाकर राजनीति में युवाओं की भागीदारी बढ़ाई जा सकती है।
जहाँ तक मतदान का प्रश्न है, यह देखा गया है कि युवाओं में वयस्कों के मुकाबले मतदान को लेकर कम रुचि है। यही कारण रहा कि वर्ष 2024 के चुनाव में निर्वाचन आयोग ने टर्निंग 18 अभियान आरंभ किया, जिसमें युवाओं को भाने वाले सोशल मीडिया का भी इस्तेमाल किया गया परंतु अभी तक दो चरणों में हुए चुनाव में हो रहे मतदान के प्रतिशत बतला रहे हैं कि यह मुहिम कुछ खास रंग नहीं ला पाई। यहाँ पर यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि राजनीतिक दलों पर कुछ खास आयु वर्ग और परिवारों के लोगों का कब्जा रहा है। इसे संसद की औसत आयु से भी समझा जा सकता है। पिछले कई चुनावों से संसद की औसत आयु 55 वर्ष के आसपास रही है, जिससे पता चलता है कि राजनीतिक दल युवाओं का प्रयोग चुनाव प्रचार में तो कर रहे हैं, परंतु उनके लिए सत्ता में भागीदारी में अवसर नहीं बना रहे हैं। यह भी देखा जा रहा है कि चुनाव के माध्यम से युवाओं को कोई प्रेरणा मिल सके ऐसा कोई अवसर मौजूद नहीं है, इसके विपरीत चुनाव में बढ़ते हुए धन, बल और शराब के प्रचलन ने युवाओं को भ्रष्ट बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का कार्य किया है। यदि युवा समय रहते अपनी ताकत को पहचान और राजनीतिक दलों का मोहरा बनने के बजाय अपने मुद्दों, विशेषकर रोज़गार को आधार बनाकर राजनीति में भागीदारी करें तो यह न सिर्फ उनकी ज़िंदगी में बल्कि देश की अर्थव्यवस्था में भी बड़े बदलाव ला सकता है।
फीचर्ड फोटो आभार : Mint

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