सुनील कुमार:

यह कहानी ग्राम लालोरा, ज़िला झाँसी (उत्तर प्रदेश) के रहने वाले विजय श्रीवास जी की है। विजय शादी से पहले अपने गाँव में रहकर ही मज़दूरी किया करते थे। वर्ष 2008 में उनकी शादी हुई, शादी के बाद भी वह अपने गाँव में ही मज़दूरी करते रहे, फिर 1 साल बाद उनकी बेटी का जन्म हुआ। बेटी के जन्म के बाद विजय जी के लिए अपने परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल होता गया। वह प्रति दिन मज़दूरी करके 200 रुपए कमाते थे और यह निश्चित भी नहीं था की उन्हें रोज़ मज़दूरी मिले, कभी-कभी उन्हें खाली हाथ भी लौटना पड़ता था। विजय को उनके एक पड़ोसी ने मालनपुर, ज़िला भिंड (मध्य प्रेदश) में जाकर मज़दूरी करने की सलाह दी और बताया कि मालनपुर एक औद्योगिक क्षेत्र है एवं वहाँ सैकड़ों की संख्या में कम्पनियाँ/कारखाने है एवं वहाँ  रोज़गार के बहुत अवसर है। वर्ष 2017 में विजय मालनपुर आकर बस गए और यहाँ पर उन्होंने अलग-अलग ठेकेदारों के साथ मिलकर काम किया।

विजय इस उम्मीद के साथ घर छोड़कर निकले थे कि घर से दूर जाकर वह अच्छा पैसा कमा लेंगे और अपने परिवार के साथ सुखी जीवन जीयेंगे, लेकिन यह उनके लिए केवल एक सपना बनकर ही रह गया। आज की तारीख में अभी उनकी चार बेटियाँ हैं। परिवार बड़ा होने के साथ-साथ उनका भरण-पोषण, बच्चों की पढाई-लिखाई का खर्चा उठाना उनके लिए बहुत मुश्किल होता जा रहा है। विजय ने एक-एक पैसा जोड़कर एक पुरानी मोटर साइकल खरीदी थी लेकिन वह भी चोरी हो गई, जिसकी रिपोर्ट उसने थाने में लिखवाई लेकिन आज तक भी उनकी मोटर साइकल का कुछ पता नहीं चल पाया है। विजय को पेंशन फण्ड (पी.एफ.) की सुविधा नहीं मिल रही है। अगर उन्हें पी.एफ. की सुविधा मिलती तो वह अपने भविष्य के लिए बचत कर सकते थे।

विजय की मज़दूरी की दिनचर्या का संघर्ष – सुबह 5 बजे से विजय के दिन की शुरुआत होती है। मालनपुर में पानी की बहुत समस्या है, और घर से दूर लगे सरकारी हैंडपंप से ही पानी भरना पड़ता है। फिर बच्चों को सुबह स्कूल तक पहुँचाना जिसके बाद घर से 5 किलोमीटर दूर अपने कार्य स्थल पर वह जाते हैं और सुबह 9 बजे से काम की शुरुआत होती है।  विजय दिनभर धूप में खड़े होकर मज़दूरी का काम करते हैं और शाम को 6 बजे काम से वापस लौटते हैं। किसी दिन काम ज़्यादा होने पर उनको ओवर टाइम करना पड़ता है तो घर वापिस आते-आते रात के 12 भी बज जाते हैं। काम ख़तम होने के बाद, देर रात में विजय थके-हारे अपने घर पहुँचते हैं। घर की ज़रुरतों का सामान लेने भी विजय ही बाज़ार जाते हैं। रात को मालनपुर में ज्यादातर बिजली की कटौती होती है जिस कारण नींद पूरी ना हो पाना एक समस्या बनी रहती है। विजय सम्पूर्ण महीने मेहनत करके 15 हज़ार रुपए तक कमा पाते हैं और यह पैसे भी उन्हें कभी-कभी 1 महीने बाद मिलते हैं। ऐसी परिस्थति में जीवन जीना बहुत मुश्किल हो जाता है। आज के ज़माने में इतनी मेहनत करने के बाद भी विजय एक संघर्षपूर्ण जीवन जी रहे हैं, जिसमें कई प्रकार की समस्याओं के लिए उनके पास पर्याप्त साधन नहीं हैं।

Author

  • सुनील कुमार, मध्य प्रदेश के ग्वालियर ज़िले में रहते हैं | उन्होंने ग्वालियर में जीवाजी विश्व विद्यालय से एम.एम (अर्थशास्त्र) और एल.एल.बी की शिक्षा प्राप्त की है | वह वर्ष – 2013 से समाज सेवा के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। वर्ष 2021 से सुनील, जेनिथ संस्था, ग्वालियर के साथ जुड़कर ग्वालियर मैं कार्य कर रहे हैं। वर्तमान में, वह ग्वालियर में सहरिया समुदाय (आदिवासी) को न्याय तक पहुँचाने की लड़ाई में उनके साथ ज़मीनी स्तर पर कार्य कर रहे हैं।

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