सुरेश राठौर :

आज के समय में सबसे बड़ा सवाल यह है कि उन्हें नरेगा में लगातार काम क्यों नहीं मिल रहा है ? यदि कभी-कभी काम मिल भी जाता है तो उन्हें उसकी मजदूरी समय पर क्यों नहीं मिल रही है?

मरुई गाँव की परमीला जी का कहना है कि, “मै नरेगा में काम करना चाहती हूँ मगर मुझे काम नहीं मिल रहा है जिससे मुझे अपना जीवन यापन करने में बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है” ।

उर्मिला जी का कहना है, “मुझे नरेगा से काम ही नहीं मिल रहा है जिसके कारण मुझे काम की तलाश में बहुत दूर भी जाना पड़ता है, नरेगा में काम मिल जाता तो पास में ही जाकर काम कर लेते हम लोग”।

काम नहीं मिलने के कारण मजदूरों को अपनी जीविका चलाने में कठिनाई हो रही है। इसलिए वे नरेगा से हटकर अपनी जीविका चलाने के लिए दूसरा काम करने के लिए मजबूर हैं।

जैसे नगीना जी का कहना है कि उन्हें नरेगा में सही से काम नहीं मिल पा रहा है, इसलिए वे अपनी जीविका चलाने के लिए दुऊरी की बुनाई करती हैं। इसी तरह प्रेमा जी भी नरेगा में काम न मिलने के कारण दुऊरी की बुनाई करती हैं और अपनी जीविका चलती हैं। इसी तरह और भी लोग हैं जो तरह तरह के कार्य करके अपनी आजीविका चलाते हैं। 

भवानीपुर की इंदु जी और शीला जी किरियात जाति  हैं और कंपनियों में काम करना चाहती हैं। पुरुषों में जैसे रमाकांत जी, दशरथ जी नरेगा में काम न मिलने के कारण काम करने बाहर चले जा रहे हैं।

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  • सुरेश राठौर बनारस, उत्तर प्रदेश में रहते है और नरेगा के अंतर्गत महिला मज़दूरों के मुद्दों पर काम करते है ।

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