मीना जादव :

‘मज़दूर’ शब्द सुनते ही हमारे दिमाग में अक्सर एक पुरुष मज़दूर की छवि उभरकर आती है, जबकि एक मज़दूर के रूप में स्त्री-पुरुष समान रूप कार्य करते हैं। आज हमारे समाज में जब बराबरी की बातें हो रही है वहाँ महिला मज़दूर आज भी कई गुना पीछे चल रही है। मज़दूरों के साथ एक दशक से कार्य करते हुए बहुत सारी घटनाएँ समझ पाई हूँ। उनमें भी महिला मज़दूरों के सवालों को, उनकी ‘पहचान’ और उनकी समस्याओं को काफी नज़दीक से सिर्फ देखा नहीं है, उनसे रूबरू भी हुई हूँ। ऐसा लगता है कि उनमें ही कहीं मैं भी हूँ। महिला मज़दूर, ना सिर्फ पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाते हुए काम करती है, साथ ही बच्चों को संभालना, खाना पकाना, कपड़े धोना, पानी लाना, अक्सर पुरुष से पहले उठना, यह सब महिला मज़दूर के लिए सामान्य बातें हैं। हमारी यूनियन ‘मज़दूर अधिकार मंच’, निर्माण कार्य, ईंट भट्टा, गन्ना कटाई, और खेत मज़दूर के रूप में काम करने वाले मज़दूरों के साथ काम करती है। हमारे यूनियन से जुड़ी मज़दूर महिलाएँ अपने परिवार के साथ रोज़ी-रोटी कमाने गुजरात की पूर्वीय पट्टी, गुजरात के दाहोद, राजस्थान के डूंगरपुर, बांसवाड़ा, और मध्य प्रदेश के झाबुआ ज़िले से पलायन करके आती हैं।

अक्सर महिला मजदूरों के यौन शोषण के लगातार बने रहने वाले खतरे के साथ-साथ काम की जगह पर मूलभूत सुविधाओं के अभाव की वजह से बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वो शहर में आते हैं कमाने हेतु पर यहाँ वो अपना सब कुछ खो देते हैं। अपनी अस्मिताएँ, गौरव और संस्कृति वो मुख्य धारा के लोगों के प्रभाव में आकार गँवा देते हैं। शहरों की खोखली प्रणाली और रिवाज़ो के नाम पर वो बर्बाद हो जाते हैं, और यह सबसे ज़्यादा महिला मजदूरों को ही सहना पड़ता है। 

असंगठित क्षेत्र में कार्यरत आदिवासी-दलित महिला मजदूरों को अपनी दोहरी पहचान के लिए लड़ना पड़ता है, जिसकी वजह से समाज और काम की जगह पर उन्हें दोहरे शोषण का भोग भी बनना पड़ता है। आदिवासी या दलित पहचान के कारण और एक महिला होने के कारण काम की जगह पर अक्सर उन पर यौन शोषण का खतरा हर समय बना रहता है। कहीं भी उस महिला की मर्जी नहीं पूछी जाती है। खेत मज़दूरी या भाग खेती (भाग खेती एक छल है) करने के लिए जब कोई महिला परिवार सहित पलायन करती है, तब कई बार उसे पुरुष से अलग कार्य करना पड़ता है। उसकी वजह से खेत मालिक या आस पास में काम करने वालों के लिए वो सहज प्राप्त बन जाती है, ऐसे में यौन हिंसा के का मामले सामने आते हैं। 

वो चाहे 13 या 14 साल की किशोरी हो या वासस्क महिला हो, हमारे सामने खेत मज़दूरी करने वाली कई महिलाओं के यौन शोषण की घटनाएं सामने आई हैं। इस तरह की बहुत सारी घटनाएँ होती हैं लेकिन बहुत कम ही बाहर आ पाती हैं, वह भी बहुत कठिनाई के बाद। जितनी भी इस तरह की घटनाएँ सामने आती हैं, वह  किसी हिमशिला की नोक के बराबर ही होती हैं। इस तरह की यौन हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं के परिवार और समाज के पुरुष भी कई दफे पीड़ित महिला को ही गलत ठहरा के उसको वहीं छोड़ आते हैं या उस पर चुप रहने का दबाव बनाते हैं। 

महिला मजदूरों के यौन शोषण की ऐसी घटनाओं के बाद उन मजदूरों के ठेकेदार भी सबसे पहले समझौता करने हेतु ही दबाव बनाते हैं और वह महिला उनके लिए बस पैसे कमाने का एक साधन बन जाती है। कई मामलों में तो पीड़ित महिला मजदूर को पता भी नहीं चलता और उसके पति या पिता पैसे लेकर अपराधी के साथ समझौता कर लेते हैं। शासन-प्रशासन से भी उन्हें कोई खास सहयोग नहीं मिलता, उन्हें शिकायत दर्ज कराने में ही बहुत कठिनाई झेलनी पड़ती हैं और कोर्ट में केस लड़ने के लिए संसाधनों का अभाव तो होता ही है। इसलिए भी बिचौलिये ऐसे आदिवासी-दलित मज़दूर परिवारों और महिलाओं का फायदा उठाते हैं। मुख्य धारा के समाज में इनके प्रति सम्मान की कमी और महिलाओं को कमतर देखे जाने का रवैया भी महिला मजदूरों के यौन हिंसा और शोषण को बढ़ावा देने वाला एक प्रमुख कारक होता है। ऐसी जगहों पर आकर ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ जैसा सरकारी सूत्र बहुत ही कमज़ोर साबित होता है। सरकारें और राजनीतिक दल चुनाव में वैसे ही मज़दूरों के मुद्दों को नहीं उठाते, ऐसे में वह महिला मज़दूरों के मुद्दे कैसे और क्यूँ ही उठाएंगे? 

ज्यादातर सभ्रांत वर्ग और खुद को प्रगतिशील कहने वाले राज्यों में आज भी महिलाएँ अदृश्य है। आदिवासी समाज में बेटियों को जन्म लेने की आज़ादी है वो एक ख़ुशी की बात है, पर समाज में महिलाओं का मान आगे बढ़े इसे लेकर कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। मैं सरकार से ज़्यादा उम्मीद नहीं रखती हूँ पर समाज और महिलाएँ खुद भी अगर यत्न करेंगी तो भविष्य का चित्र बदलेगा। समाज में दहेज़ लेने का भी रिवाज है, नाच-गाना के लिए डीजे प्रथा है, सोना-चांदी जो लिया जाता है, उसमें कटौती करनी होगी। महिलाओं को आगे बढ़ने का और पढ़ने का मौका देना होगा। शासन-प्रशासन भी सक्रिय रूप से कुछ करेगा और महिलाओं को सच्चे अर्थ में अधिकार देगा तो महिला मज़दूर की स्थिति में परिवर्तन आ सकता है। पलायन रोकने हेतु सरकार मनरेगा योजना का अमलीकरण सही ढंग से करे और रोजगार दर बढाए। सबको समान हक़ मिलना चाहिए।

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  • मीना जादव अहमदाबाद, गुजरात में रहती है और पिछले 11 साल से वह मज़दूर अधिकार मंच, गुजरात के साथ मिलकर काम कर रही है । उन्हें सामाजिक विकास के लिए काम करना पसंद है और वह 19 साल की उम्र से विकास के क्षेत्र में कार्य कर रही है ।

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