अर्चना पाठक: 

सुन्दरता के प्रति मनुष्य की रुचि प्राचीन काल से ही रही है। मनुष्य बहुत तरीकों के अलंकार के माध्यम से खुद को सुन्दर दिखाने के लिये कोशिश करते आ रहा है। हल्दी और अन्य उबटन, लेपन के माध्यम से स्त्री खुद को सुन्दरता के करीब देखना चाहती है। आदिवासी, इस धरती का प्रथम निवासी माना जाता है। उन्होंने अपने परंपरा और रीति-नीति के सहारे सुन्दरता और अलंकरण को अपनाया। तत्कालीन समय में संसाधनों के पहुँच से दूर होने के कारण या फिर प्रकृति के नज़दीकी संपर्क होने के कारण, वह अलंकरण को एक अलग रूप में लेकर आये। आदिवासियों में ‘गोदना’ एक ऐसी ही परंपरा है जो हज़ारों सालों से वर्तमान समय तक देखने को मिलती है। 

भूमि अलंकरण: 

झारखण्ड राज्य के रातु प्रखंड के बाजपुर गाँव में जब हम पहुँचे तो भूमि अलंकरण की परंपरा को लेकर अद्भुत जानकारी प्राप्त हुई। ग्राम-वासियों का मानना है कि यह एक पुरानी रिवाज है जो प्राचीन काल से भूमि और देह को सजाने के लिये आदिवासी समाज में प्रचलित है। उनके घर में प्रवेश करते ही प्रकृति से किस तरह आदिवासी समाज जुड़ा है, देखने को मिला। घर का आंगन बिल्कुल साफ और पास में ही बहुत सारे पेड़-पौधे। पेड़-पौधों में चिड़ियों का बसेरा मानो आदिवासी समाज उन्हें अपने परिवार का सदस्य मानकर रहने की इजाज़त दे दिया हो। मिट्टी और गोबर की भीनी-भीनी खुशबू मन को शांति और सुकून देती हुई प्रतीत हुई। घर में प्रवेश करते ही गोबर द्वारा लिपी दीवारें देख मन प्रसन्न हो गया, इसमें एक अलग ही आकर्षण था। मिट्टी और गोबर को मिलाकर उंगलियों की मदद से सुंदर-सुंदर आड़ी तिरछी लकीरें खींची थी जो पहाड़नुमा लग रही थी या फिर समंदर की लहरों की तरह। सिर्फ दीवारों पर ही नहीं बल्कि नीचे की ज़मीन पर भी वैसे ही कलाकृति की हुई थी। खपरैल के घर के अंदर मोटे-मोटे लकड़ी के पाट लगे हुए थे जिनके सहारे मोटी-मोटी दीवारें खड़ी थे जो केवल और केवल मिट्टी-पत्थर की बनी हुई थी। साथ ही बांस की एक-एक लकड़ी को चटाई की तरह बुनकर ऊपर से खपरैल बिछा कर घर की छत तैयार की गई थी। इस खपरैल के छत वाले मिट्टी के घर में शायद ही किसी पंखे की आवश्यकता होगी। खपरैल की छत के बीच से ठंडी-ठंडी हवा का आना और मिट्टी के दीवार में ठंडक की अनुभूति शीत-ताप नियंत्रित कमरे की एहसास दिला रही थी।(1)

देह में अलंकरण : 

देह अलंकरण का अद्भुत नज़ारा ग्रामीण परिवेश में देखने को मिला जब उस घर की औरतों से मिली, सभी के माथे पर गहरे हरे रंग का टीका था। जो ज़्यादा बुज़ुर्ग थे उनके माथे में तो था ही, साथ ही हाथों की दोनों कलाई में, दोनों पैरों में और गले में हारनुमा गोदना हरे रंग की स्याही से बना हुआ था। वहाँ मौजूद श्रीमती गंगी उरांव जी से मिलकर मैंने इस बारे में कुछ जानकारी लेना चाही। जब हमने उनके देह पर हुई कलाकृति के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया, “यह ‘गोदना’ है और यह आदिवासी परंपरा की पहचान है। ‘गोदना’ केवल आदिवासियों में ही देखने को मिलेंगे। इससे हमारे आदिवासी संस्कृति  की पहचान होती है।” उन्होंने इससे संबंधित एक रोचक कहानी भी बताई जो कुछ इस तरह है- बहुत साल पहले एक बार कुछ स्त्रियाँ नदी में नहाने गई, तभी अचानक जल स्तर बढ़ने लगा और सभी औरतें डूबने लगीं। उनमें से कुछ औरतें आदिवासी समुदाय से थीं, उनमें से जिन्होंने ‘गोदना’ किया  हुआ था, वे डूबने से बच गई और बाकी सभी पानी में डूब गए।(2)

आदिवासी समुदाय का यह विश्वास है कि अगर गोदना नहीं करवाया तो आप सच्चे आदिवासी नहीं हो। उन्होंने यह भी बताया कि हम इस संसार में बिना कपड़ों के आते हैं और मरने के बाद भी बिना कुछ लिए जाते हैं। इसलिए वो यह गोदना गुदवाते हैं और यह सुन्दर उपहार लेकर भगवान के पास जाते हैं। उनका कहना था कि आभूषण तो मरने बाद यहीं रह जायेंगे, बस कुछ साथ जायेगा तो वह यह गोदना ही है। एक और औरत ने यह कहा कि पहले के जमाने में आभूषण नहीं थे, अगर थे भी तो वह खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए आदिवासी अपने शरीर में गोदना गुदवाते थे।

मैंने वहाँ खड़ी और दो महिलाओं श्रीमती बोदका उरांव और श्रीमती सारो उरांव से भी इसके बारे में पूछा। मैंने पूछा, “क्या यह केवल आदिवासी समाज के लोग ही बनाते हैं?” उनका कहना था, “यह (गोदना) आदिवासियों की पहचान है, इसे देखकर ही पता चल जाता है कि ये इंसान आदिवासी है।” उन्होंने माथे में जहाँ बिंदी लगाई जाती है वहाँ गुदवाने की परंपरा से मुझे परिचित कराते हुए बताया कि यह उनकी बिंदी है जिसे वे आजीवन अपने माथे का श्रृंगार बना कर रखती हैं। दोनों आंखों के किनारे छोटे-छोटे बिंदी या फूल जैसा गोदना भी मैंने देखा। साथ ही होंठ के नीचे भी एक छोटी बिंदी की तरह बना हुआ भी मैंने देखा। कलाई में चूड़ी की तरह किसी के हाथ में सुंदर फूल थे तो एक महिला ने छोटे-छोटे गोल-गोल बूंदें पूरी कलाई में चूड़ी की तरह बनवाया था। एक महिला ने तो अपने पाँव में पायल की तरह सुंदर कलाकारी वाले ‘गोदना’ गुदवाए थे। यह आदिवासी समाज की औरतों की सुंदरता है, उनके इस श्रृंगार को देखकर मेरा मन कायल हो गया।

इसके बाद मैंने उनसे पूछा, “ये गोदना गोदने के लिए कौन आते हैं? और गोदना गोदने का यह समान किन चीजों से बनता है?” उन्होने बताया, “गोदना गोदने के लिए मल्हार लोग आते हैं जो आदिवासी समुदाय से ही होते हैं। मल्हार लोग सच्चे दिल के होते हैं और खुशी मन से आशीर्वाद के साथ आते हैं। वे सभी महिलाओं, छोटी बच्चियों का गोदना गोदते हैं और बदले में उन्हें जो भी मिल जाए चाहे वह चावल हो, कपड़े हो या पैसा, कुछ भी दे देने से वे खुशी-खुशी स्वीकार कर लेते हैं।” आदिवासियों का मानना है कि मल्हार लोग जिस मन से आते हैं, उनकी जैसी प्रतिक्रिया होती है उसका प्रभाव भी गोदना पे पड़ता है। अगर उनका मन सही नहीं तो गोदना गोदते समय दर्द होता है और अगर वे खुशी मन से गोदते हैं तो दर्द का आभास तक नहीं होता।

‘गोदन’ कला के उपकरण: यह एक अद्भुत कला है और उसमें व्यावह्रुत (प्रयोग की जाने वाली) सामग्री काफी महत्वपूर्ण है। जब हमने गोदना गोदने के लिए किस चीज का इस्तेमाल होता है यह जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि माँ अपने बच्चों को जो दूध पिलाती है उसी दूध में काजल मिलाकर एक प्रकार की मेहंदी बनाई जाती है और चार-पाँच सूई की सहायता से हाथों में, छाती में, पांव में, तथा चेहरे के विभिन्न भागों जैसे माथे के बीच (जहाँ बिंदी होती है), आंखें के किनारे, और होंठों के नीचे सुंदर-सुंदर अलंकरण की जाती है। 

गोदना के बारे में जानकारी देते समय समुदाय की महिलाओं का इस बात पर ज़्यादा जोर था कि गोदना आदिवासी समुदाय की एक पहचान है और यह उनकी एक संपत्ति है और शरीर की सजावट का आधार है। घर की सबसे बुजुर्ग महिला गंगी उरांव ने यह भी बताया कि देह में किये जाने वाले इस अलंकरण के पीछे एक और वजह है। अगर कभी हम बचपन में किसी कारण से अपने घर-परिवार से बिछड़ गए तो इस अलंकरण द्वारा ही हमारी पहचान होती है। 

मैं अपनी एक मित्र निशा से मिलने उनके घर गई, निशा का घर रातु मंडल के ‘तारूप’ गाँव में है। गोदना के बारे में उन्होंने कहा कि देह पर इस तरह का अलंकरण बनवाने वाले केवल आदिवासी समाज के ही लोग होते हैं पर इस गोदना को गोदने वाले किसी दूसरी जाति के होते हैं। उनका कहना है कि मल्हार जाति के लोग यह गोदना गोदने का कार्य करते हैं जो बड़े सच्चे दिल के लोग होते हैं। इनको आप अपने काम के बाद जो भी दोगे ये स्वीकार कर लेते हैं।(3)

मेरी एक और मित्र हीरामणि दीदी जो रातु प्रमंडल के एक गाँव आमटन में रहती हैं, उनसे मुलाकात कर मैं पूछी कि दीदी मुझे इस सुंदर अलंकरण के बारे में कुछ बताएं, तो उन्होंने कुछ अलग ही बात सामने रखी, जिसे सुनकर मैं भी सोच में पड़ गई। उन्होंने बताया कि ‘गोदना’ को आदिवासी भाषा में ‘खोदा’ भी कहा जाता है। उन्होंने बताया कि यह ‘खोदा’ आदिवासी महिलाएँ खुद को बदसूरत दिखाने के लिए खोदवाती थी। जब भारत पर मुगलों का शासन था और मुगल राजा किसी सुन्दर नारी के पसंद आ जाने पर उसका अपहरण कर लिया करते थे, इसी डर से सभी आदिवासी महिलाएं खुद को बदसूरत बनाने के लिए अपने चेहरे पर और पूरे बदन में खोदा खोदवातीं थीं। उन्होंने यह भी कहा कि ये गोदना गोदने के लिए किसी दूसरे आदिवासी जाति के लोग भी आते थे, उनमें ‘गोंड’ जाति के लोग भी इस कला से प्रवीण माने जाते थे। इस दौरान मैंने गोदना के बारे में जितनी भी महिलाओं व पुरुषों से सवाल किए, सभी के जवाबों से हीरामणि दीदी के जवाब, बिलकुल हट कर थे जो शायद मुगलकालीन शासन व्यवस्था में नारी की स्थिति को दर्शाते हैं।(4)

होचर पतराटोली गाँव जो रांची से करीब 26 किलोमीटर दूर है, वहाँ मेरी मुलाक़ात अंजना दीदी से हुई। उन्होंने गोदना के बारे में इतने सुंदर तरीके से बताया कि मुझे सुनकर बहुत ही अच्छा लगा। उन्होने कहा “सभी इंसानों को इस धरती में भगवान भेजे हैं और मरने के समय हम कुछ लेकर तो जायेंगे नहीं और जब भगवान ने हमें भेजा है तो कुछ उपहार हमें भी भगवान के लिए लेकर जाना है। यह ‘गोदना’ ही हमारे साथ भगवान पास जायेगा। यही उपहार के रूप में भगवान को हम समर्पित करेंगे। गोदना गोदने वाले एक कलाकार होते हैं, जिन्हें यह कला भगवान की तरफ से वरदान में मिला होता है।” उन्होंने यह भी कहा कि मेरी दादी और माँ के सारे बदन में यह गोदन अलंकरण तो था ही इसके अलावा मेरे दादा जी और पिताजी के माथे पर भी यह खोदा किया हुआ था। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सास के शरीर में भी गोदना जो बड़ा ही आकर्षक था।(5)

अंजना जी ने कहा कि गोदना गोदने के बाद गुदवाने वाले पर हल्दी का लेप लगाते हैं जिससे जख्म न हो। जो गोदना गोदने आते हैं उनका आशीर्वाद भी रहता है, उनकी दुआ से जल्दी जख्म ठीक हो जाता है। जिस प्रकार किन्नर समुदाय के लोग किसी के घर संतान पैदा होने पर आशीर्वाद देने आते हैं, ठीक उसी प्रकार ये खोदा करने वाले भी खोदा करने के बाद जख्म जल्दी ठीक होने का आशीर्वाद दे कर जाते हैं। उन्होंने कहा कि यह खोदा का कार्य कोई अपने परिवार या अपने जनजाति के नहीं करते बल्कि यह खोदा करने वाले का अपना एक अलग वंश होता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलता जाता है। वे लोग मल्हार जाति के होते हैं जो टोकरी बनाने का काम भी करते हैं। मल्हार जाति के लोग बड़े प्यार से बुलाते और बोलते हैं कि मुझे पैसा नहीं चाहिए मुझे चावल भी दे देंगे तो भी चलेगा। मल्हार लोग बड़े ही संतोषी होते हैं, जो मिले उसमें खुश।

फिर मेरी बात रांची जिले के नजदीक ओरमांझी प्रखंड के राजन उरांव से हुई। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान यह है कि महिलाएं अपने माथे के बीच में एवं माथे के दाहिने और बाएं दोनों ओर गोदना गुदवाते हैं। यह उरांव लोगों की विशेष पहचान है। उन्होंने यह भी कहा कि आज-कल के ज़माने में टैटू बनाने का चलन है, चाहे किसी भी जाति धर्म के लोग हों वे अपना शौक  पूरा करने के लिए शरीर के विभिन्न हिस्सों में गोदना गुदवाते हैं। गोदना कला ही वर्तमान की आधुनिक समय की ‘टैटू’ कला है। आदिवासी जनजातियों का गोदना गुदवाना एक अलग महत्व रखता है, उसी से उनकी पहचान होती है। उरांव के अलावा मुंडा लोग भी गोदना गुदवाते हैं।(6)

मैंने राजन भईया से मुलाकात कर यह जानने की कोशिश की कि इसका अर्थ क्या है, तो उन्होंने कहा कि अलग पहचान से यह तात्पर्य है कि सभी उरांव महिलाएं अपने चेहरे में एक जैसा गोदना गुदवाती हैं। परन्तु शरीर के अन्य हिस्सों में इसलिए गोदना गुदवातीं हैं ताकि कभी कहीं बिछड़ जाएं और फिर कई वर्षों के बाद दोबारा जब मुलाकात हो तो उसी गोदना से उनकी असली पहचान हो सके।

निष्कर्ष : क्षेत्र परिभ्रमण के दौरान देह अलंकरण और भूमि अलंकरण  के बारे में जो जानकारी प्राप्त हुई उससे यह निष्कर्ष साफ झलकता है कि यह अलंकरण आदिवासी समाज की अपनी पहचान है। यह उनकी संस्कृति, कला, परंपरा से मूल रूप से जुडी हुई है। ‘गोदना’ गुदवाना, उरांव जनजाति में एक परब से कम नहीं होता यह उरांव होने की एक पहचान है। अपनी पारंपरिक संस्कृति को इस आदिवासी समुदाय ने अलंकरण के माध्यम से सुरक्षित करके रखा हुआ है।      

सन्दर्भ सूची :

  1. सितम्बर 12, 2022 को बाजपुर निवासी श्रीमती गांगी उरांव से साक्षात्कार के दौरान प्राप्त जानकारी।
  2. सितम्बर 10, 2022 को बाजपुर निवासी श्रीमती गांगी उरांव, सारो उरांव और बोदका उरांव से साक्षात्कार के दौरान प्राप्त जानकारी।
  3. सितंबर 12, 2022 को तारुप निवासी श्रीमती निशा मुंडा से साक्षात्कार के दौरान प्राप्त जानकारी।
  4. सितंबर 13, 2022ई.को आमटांट   की निवासी श्रीमती हीरामणि जी से साक्षात्कार के दौरान प्राप्त जानकारी।
  5. सितंबर 15, 2022ई.को गोचर पतराटोली की निवासी श्रीमती अंजना कुजूर से साक्षात्कार के दौरान प्राप्त जानकारी।
  6. सितंबर 20, 2022ई.को ओरमांझी के निवासी श्री राजन उरांव से साक्षात्कार के दौरान प्राप्त जानकारी।

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