संजीव कुमार:

यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति के जीवन संघर्ष से संबंधित है जिसने जीवन में बहुत कुछ सीखा – लड़ना सीखा, अपनी बात को रखना और बहुत कुछ कहना सीखा। आओ शुरू करें –

यह कहानी है स्वर्गीय मनीराम सिंह जी की जिनका जन्म बिलाव, भिंड (मध्य प्रदेश) के एक गरीब परिवार में हुआ। उनके जन्म के कुछ समय बाद उनकी माँ का देहांत हो गया। तब मनीराम कुछ एक साल से भी कम उम्र के थे। मनीराम के पिता ने उनकी माँ के देहांत के उपरान्त दूसरी शादी कर ली।

कुछ समय तक तो सब ठीक ही चला। फिर उनकी दूसरी माँ उन्हें (मनीराम जी को) परेशान करने लगी। उनको मारती-पीटती और कभी-कभी उन्हें खाना तक नहीं देती थी। उनकी नई माँ उनको पसंद ही नहीं करती थी, इसके चलते उनके पिता और उनकी माता के बीच झगड़ा होता रहता था। वह अपने पति से कहती थी कि या तो मनीराम घर पर रहेगा या तो मैं…!! मनीराम के पिता बहुत दुविधा में थे। वो अपने बेटे मनीराम को छोड़ना नहीं चाहते थे, पर मनीराम जी की दूसरी माँ पेट से थी, वो भी माँ बनने वाली थी। इसलिए मनीराम जी के पिता ने अपने बेटे को घर से निकाल दिया और गाँव में ही उनके परिवार की एक दादी के घर भेज दिया।

वो दादी भी अकेली ही रहती थी। उन्होंने मनीराम जी का पालन-पोषण किया, लेकिन कुछ समय के बाद परिस्थितियाँ और गंभीर होती गईं। दादी की भी उम्र हो गयी थी। अब वो कमाने के लिए नहीं जा पाती थी और उसी समय के आस-पास उनकी तबियत भी ख़राब हो गयी।

फिर मजबूरी के चलते मनीराम जी ने आठ साल की उम्र में ही कमाना शुरू कर दिया। वो लोगों के घर काम करते या तो किसी के खेत में काम करते। उन्होंने सूप बनाना भी शुरू किया। फिर कुछ समय बाद जब वो बड़े हुए तो उनकी दोस्ती बिलाव गाँव के एक मशहूर डाकू (बागी) मलखान डाकू से हुई। मनीराम जी मलखान के साथ कुछ समय तक बागी भी रहे, लेकिन फिर उन्हें समझ आ गया कि यह काम सही नहीं है। उन्होंने यह काम बंद कर दिया और अपनी सजा भी काटी।
जेल में उनका व्यवहार बहुत अच्छा था जिसकी वजह से उनको सजा में कुछ माफ़ी भी मिल गयी। वो सजा काटने के बाद घर आये। उनकी दादी ने मनीराम जी की शादी कंठश्री जी से करा दी, जिनका स्वभाव बहुत ही मीठा और पारिवारिक था।
उन्होंने धीरे-धीरे मेहनत-मज़दूरी करके गाँव में ज़मीन ली और अपनी पत्नी कंठश्री के साथ खेती करके अपना जीवन-यापन करना शुरू कर दिया। दम्पत्ति की एक बेटी और दो बेटे हुए। उन्होंने बच्चों को अच्छी शिक्षा दी और बच्ची की शादी भी एक अच्छे संपन्न घर में की। मनीराम जी के बच्चों के पास 60 बीघा ज़मीन है गाँव में और उनका सबसे बड़ा बेटा आज सी.आर.पी.फ़. में टी1 (3 स्टार) की पोस्ट पर है और दूसरा बेटा मैकेनिक है। उनकी खुद की ऑटोपार्ट की शॉप है। आज परिवार अपना जीवन कुशल-मंगल तरीके से व्यतीत कर रहा है।
आज भले ही मनीराम जी हमारे साथ नहीं है, पर उनके जीवन से बहुत कुछ सीखने को मिला है, ख़ासकर जीवन से लड़ने की कला….

इस कहानी का सिर्फ और सिर्फ एक ही मकसद है –
आजकल की नई पीढ़ी, अपनी छोटी-छोटी परेशानियों से घबराकर ज़िंदगी की लड़ाई से हार मान लेती है, खुद को कमज़ोर और असहाय समझ लेती है। एक पेपर में फ़ेल होने पर खुद को असफ़ल समझ के आत्महत्या को ही एक मात्र रास्ता समझ लेते हैं। उन सभी युवक-युवतियों को मनीराम जी जैसे व्यक्तियों से समझना चाहिए कि जीवन में आई हुई कठनाई और बुरा वक़्त, जीवन की एक कड़ी है और इससे लड़ना ही जीवन है…..

जीवन के लिए कुछ 4 लाइन:-
रह जाते हैं सपने जीवन में, कुछ बाधाओं से डरकर,
आगे बढ़ने के लिए – कुछ नया करने के लिए,
करो संघर्ष फिर जीवन से लड़कर,
एक न एक दिन चूमेगी कदम, कामयाबी,
कहेगी फिर आये मुसाफिर अनेक,
पर राह में खड़े रहे तुम ही डटकर, तुम ही डटकर….

Author

  • संजीव कुमार मध्य प्रदेश के भिंड जिले के मालनपुर के निवासी हैं। वह वर्तमान में बीएससी तृतीय वर्ष के छात्र हैं और जेनिथ सोसाइटी संस्था में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं, जहां वह सहारिया आदिवासी और मजदूर वर्ग के अधिकारों के लिए काम करते हैं। उन्हें पढ़ना और लिखना बहुत पसंद है।

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