कांता भील, उम्र 17 वर्ष, कक्षा 10
कांता पहली से पाँचवीं कक्षा तक आधारशिला स्कूल, भदेसर में पढ़ी। अभी वहीं रहकर ओपन स्कूल से दसवीं की तैयारी कर रही है। साथ में सिलाई भी सीख रही है, कांता बहुत ही मेहनती लड़की है।
मैं मेरी ही कहानी लिख रही हूँ। मेरी कहानी ऐसी है कि मैं इन कठिनाइयों से बहुत मुश्किल से निकली हूँ। मेरा बाल विवाह कम से कम दस वर्ष पहले हो चुका था, तब मैं बहुत छोटी थी। तब मेरे परिवार वाले भी पढ़ाई के बारे में इतना कुछ नहीं जातने थे। मेरे पापा नशा बहुत करते थे। मम्मी मज़दूरी करके हमारा घर चलाती थी। पापा जो मज़़दूरी करते थे, उनकी आधी मज़दूरी के पैसे शराब में पूरे हो जाते थे। जो मेरी मम्मी पैसे कमाती थी वो आधे घर खर्च में निकल जाते और आधे, मम्मी बिमार ज़्यादा रहती है तो उसकी बीमारी में खर्च हो जाते थे। ऐसी बीमारी की हालत में मेरी मम्मी ने सोचा कि अगर वो इन बिमारियों से कहीं मर गई तो उनकी चारो बेटियों और एक बेटे का क्या होगा? इसी कारण मेरे मम्मी-पापा ने हम चारों बहनों की एक साथ शादी करवा दी। जब मेरी मम्मी बीमार रहती तो मेरी सबसे बड़ी दीदी पर सारा काम का बोझ आ जाता था। घर से लेकर खेती और मज़दूरी तक का काम आ जाता था। जिसके कारण मेरी बड़ी दीदी केवल तीसरी कक्षा तक ही पढ़ पाई और उसके बाद तो वो ससुराल में रहने लगी।
जब इस शिविर से खेमराज जी ‘बासा’ हमारे गाँव में आये तो उन्होंने हमारे घरों में घूम कर हमारे घर की स्थिती देखी। हमें उन्होंने कहा कि मेरे साथ पढ़ने चलोगी, तो हमने हाँ कर दी। फिर उनके साथ चली आई। इस शिविर, स्कूल – आधारशिला – में आने के बाद हमें पढ़ाई की वैल्यू कितनी है उसके बारे में पता चला। मेरे मम्मी-पापा को भी पता चला कि पढ़ाई की कितनी वैल्यू है। मेरे मम्मी-पापा ने फिर मेरी दूसरी बहन, सुशीला दीदी को पढ़ाना चाहा लेकिन मेरे घर के हालात को देख कर के मेरी दीदी ने भी पढ़ाई छोड़ दी और वो उसके ससुराल में रहने लग गई।
ससुराल में रहने के बाद उसको लगा कि मैं ससुराल में रहकर भी अच्छी ज़िन्दगी नहीं गुज़ार सकती तो उसने फिर से पढ़ाई करने के लिए बोला लेकिन उसकी सास और उसके पति के मना कर देने से वह नहीं पढ़ी और मेरे भाई को पढ़ाया। लेकिन मेरे भाई ने भी घर की गरीबी को देखकर पढ़ाई छोड़ दी। वो चाहता था कि मेरे मम्मी-पापा पर ज़्यादा खर्चा न बढ़े, इस कारण उसने भी पढ़ाई छोड़ दी और घर से बाहर चला गया। बाहर रहकर उसने अपनी शादी के पैसे कमाये। जो पैसे कमाये थे, उन्ही से शादी करी।
अब तो मेरे पापा बहुत कमज़ोर हो गए थे जिसके कारण वह काम नहीं कर पाते थे। हमारे पास बस दो बकरियाँ हैं उनको चरा कर लाते हैं। मेरी मम्मी भी कमज़ोर हो गई लेकिन वह मज़दूरी कर के हमारा घर चलाती है। बीमारी की हालत में भी रोज़ पूरा दिन काम करती हैं। शाम को वह बीमार रहती है तो भी मेरी मम्मी दवाइयाँ लेकर सुबह काम करने निकल जाती है क्योंकि अगर वह काम नहीं करेगी तो हमारे घर वाले भूखे ही रह जायेंगे।
मेरे दादा जी और मेरे मम्मी-पापा के बीच झगड़ा होने के कारण मेरी मम्मी ने ज़मीन में फ़सल बोना छोड़ दिया। दूसरों को खेत दे दिया तो अब उनका हिस्सा देने के बाद आधी फ़सल वो घर लाती है और आधी फ़सल मालिक को दे देती है। साथ में मज़दूरी करके घर का खर्च चलाती है।
मेरी शादी होने के करण मैं भी एक बार भटक गई थी। मैं सोचती थी कि मेरी मम्मी अब इतना सारा खर्चा कैसे चलायेगी और इतने पैसे कहाँ से लायेगी कि मेरी पढ़ाई पूरी करवा सके। आठवीं कक्षा के बाद मुझे ऐसा लग गया था कि अब मैं पढ़ाई पूरी नहीं कर सकती लेकिन मुझे पलका दीदी और सुमन माई ने समझाया कि पढ़ाई करना कितना ज़रूरी है। पढ़ करके अपने मम्मी-पापा का कर्जा चुका सकती हूँ। फिर यह सोचकर कि मैं पढ़ाई करके अपने मम्मी-पापा का कर्ज़ा चुका सकती हूँ, फिर से मैंने पढ़ाई करने का तय किया। अब तो मैं पूरी पढ़ाई कर के ही रहूंगी। तब तक पढूंगी जब तक मेरी नौकरी नहीं लग जाए। मैंने मेरी मम्मी को बोला है कि तेरे तीन बेटी-बेटे नहीं पढ़े लेकिन मैं और मेरी बहन, हम दोनों पढ़कर के आपका नाम रोशन करके ही रहेंगे। मेरी मम्मी-पापा को लगता था कि मेरे बड़े भाई-बहन नहीं पढ़ पाये तो हम भी नहीं पढ़ पायेंगे। हमने उनको भरोसा दिलाया कि हम ज़रूर पढ़ेंगे।
गरीब की लड़की, काम में अटकी
विष्णु भील, उम्र 13 वर्ष, कक्षा 7
मेरे घर के पास एक लड़की रहती है। वो पढ़ने नहीं जाती। क्यों नहीं जाती?
वो अपने माता-पिता के पास नहीं रहती। बल्कि वो अपने दादा-दादी के पास रहती है। दादा-दादी अकेले हैं इसलिये वो उनके साथ रहती है। वो बहुत काम करती है। वो पढ़ती नहीं है, घर का काम करती है। वो रोटी सब्ज़ी बनाती है। उसके दादा उसको अच्छा रखते हैं। दादी, दादा और लड़की रोज़ काम करने जाते हैं। वो गरीब हैं। उनके पास पाँच बकरियाँ हैं और एक गाय है। उसका एक भाई भी है पर वह उसके मम्मी-पापा के पास रहता है। उनका एक खेत है। वो लड़की रोज़़ खेत पर जाती है और उनके खेत पर जो साग सबजियों के पौधे लगा रखे हैं उनको वो रोज़ पानी देती है। रोज़ तोड़ कर लाती है। उसके दादा बाज़ार में जाकर सबज़ियाँ बेचते हैं और पैसे लाते हैं जिनसे उनका गुज़ारा चल जाता है। उस लड़की का नाम सीमा है और दादा का नाम घीसा है और दादी का नाम ऐजी बाई है।

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