सलोमी एक्का:

झारखंड में महिलाएँ अपनी समाज व्यवस्था में आज भी दोयम दर्जे के नागरिक के रूप में जी रही हैं। चाहे वो आदिवासी महिला हो या फिर गैर-आदिवासी, उन्हें अपने हक व अधिकार के लिए कठिन चुनौतीपूर्ण लड़ाई लड़नी पड़ती है। स्वास्थ्य, जीवन के हर पहलू पर प्रभाव डालता है, किसी भी महिला को दैनिक कार्य करने के लिए बीमारियों की रोकथाम तथा सुरक्षित स्वस्थ्य प्रसव के लिए अच्छे भोजन की आवश्यकता है। लेकिन आज भी महिलाएँ पहले घर के पुरुषों को खाना खिलाती हैं, घर में पूजा-पाठ करने के बाद फिर वो खाना खाती हैं। जो खाना बचता है उसी में संतोष कर लेती हैं। झारखंड में कम आयु में विवाह का होना भी वर्तमान समाज में एक बड़ी चुनौती है। लड़कियों का विवाह अल्प आयु में ही कर दिया जाता है। कम आयु में विवाह होने के कारण लड़कियों का शरीर इस योग्य भी नहीं होता कि वह ठीक से प्रजनन कार्यों में भागीदारी कर सके। परिणाम स्वरुप उनमें अनेक तरह की शारीरिक एवं मानसिक रोग उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर प्रभाव पड़ता है।

यदि झारखंड में महिलाओं की आजीविका को देखें तो जल, जंगल और ज़मीन, झारखंडी महिलाओं के लिए आजीविका के मुख्य स्रोत हैं। महिलाएँ प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा और बचाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती आई हैं। ग्रामीण महिलाओं के लिए ज़मीन एवं प्राकृतिक संसाधन, संपत्ति ही नहीं बल्कि जीविका का साधन भी हैं। जंगलों से औषधि के रूप में ज़रुरी जड़ी-बूटियाँ, फल-फूल तरह-तरह के साग (हरी भाजी) मिलते हैं, जो महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं। घोंघी, केकड़ा और मछलियां नदी-तलाब, खेतों से गायब हो रहे हैं। छोटी-छोटी मछलियाँ, बुदनू मछली खाने से कैल्शियम मिलता है, ये मछली कभी खेतों में आसानी से मिल जाती थी। घोंघी, केंकड़ा खाने से आँखों की रोशनी के लिए लाभदायक परिणाम मिलते हैं। अब खेत नहीं रहने के कारण, सब ख़त्म हो गये हैं। खेतों के खत्म होने का एक बड़ा कारण ये है कि अब खेतों में बड़े-बडे बहुमंजिला मकानों का निर्माण हो रहा है, कारखाना खोला जा रहा है।

अपने ही खेत में महिलाएं मज़दूर के रूप में काम करने को विवश हो रही हैं। कृषि उपज के लगातार घटने एवं जंगलों के कटने का प्रभाव महिलाओं के स्वास्थ्य पर तेज़ी से पड़ रहा है। आज महिलाएँ कई तरह की बीमारियों की शिकार हो रही हैं, जैसे कि एनीमिया, पेट में पानी भर जाना (लीवर का खराब होना)। झारखंड में महुआ अत्यधिक मात्रा में उपलब्ध होता है, जिसका प्रयोग हमारे पुरखे दवा के रूप में करते थे। बारिशों के मौसम में ठंड से बचने के लिए महुआ और ईमली बीज का लेटो बनाकर खाते थे, जिससे शरीर गर्म होता था। परन्तु वर्तमान समय में महुआ को लोग केवल शराब के रूप में इस्तेमाल करने लगे हैं और वो भी खाली पेट! इसके कारण लीवर खराब होने की बीमारियाँ तेज़ी से गाँव में भी बढ़ रही हैं। इस तरह से हमारे पारंपरिक भोजन का गलत इस्तेमाल करना भी महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है।

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  • रांची झारखंड से आने वाली सलोमी, केंद्रीय जन संघर्ष समिति के साथ मिलकर स्थानीय आदिवासी मुद्दों पर काम कर रही हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं।

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