नौशेरवां आदिल:
(अगर गॉड, ईश्वर, अल्लाह है तो कहाँ हैं और कैसा है?)
मैं नही जानता, मैं नहीं मानता क्या धर्म, क्या जात-पात, क्या पंथ।
क्या भगवान, ईश्वर, अल्लाह हैं? अगर हैं तो कहाँ और कैसे हैं? उनका क्या कार्य है और किसके लिए है?
क्या भगवान रहेगा तो इस पूरे विश्व का संचालन सही समय से चलता रहेगा? पता नही! अगर ये शक्तियाँ होंगी तो क्या होगा? आप भी सोचिए।
मैं नहीं मानता भगवान, ईश्वर या अल्लाह को। मैं मानता हूँ कि प्रकृति ही भगवान है जिसके ना रहने से ज़माने का अस्तित्व संभव नहीं और जिसके रहने से किसी बगीचे जैसी पूरी दुनिया लहलहाती और सुख-शांति से रहती हैं। धर्म हमारी इंसानियत है और जाति महिला, पुरुष बस। हमारी पहचान हमारे कार्यों और विचारों से होनी चाहिए, न कि जाति, धर्म, लिंग, भाषा या फिर क्षेत्र से।
जिनके लिए भगवान, ईश्वर या अल्लाह हैं, उनके लिए भी तो भगवान, ईश्वर और अल्लाह ने अपनी किताबों में फरमाया है कि मैं अपनी रक्षा स्वयं कर सकता हूँ और मैं हर जगह और कण-कण में हूँ, तो उसे ना तो कण कण में बसाने की ज़रूरत है और न कोने-कोने में। हमें तो प्रकृति को बचाने की ज़रूरत है, उसे बचाने व कण-कण से लेकर कोने-कोने तक में बसाने की ज़रूरत है। अगर हम प्रकृति को नही बचाएंगे तो शुद्ध ऑक्सीजन कहाँ से ले पाएँगे, फर्नीचर कहाँ से बना पाएँगे, औषधि कहा से पाएँगे और हमारे जीवन का कैसे गुज़ारा होगा?
जल, जंगल ही तो जीवन हैं! कहने वाले ने कहा है कि कहाँ है वह सरकार जो जनता से वादा करती है कि उनको शुद्ध ऑक्सीजन और स्वस्थ जीवन देने का। क्या कर रही हैं वह शुद्ध जीवन और ऑक्सीजन के लिए? अगर कुछ भी नहीं तो क्यूँ नहीं?
जल, जंगल और ज़मीन की रक्षा के लिए जो आवाज़ उठ रही हैं और उनके लिए समाज को जगा रही हैं और समाज को इनके होने और ना होने को तर्क सहित उनका संबंध जीवन के दिनचर्या से जोड़कर समझा रही हैं, उन्हें और मज़बूती से उठाने की ज़रूरत है। लोग अगर जल-जंगल की अहमियत भूल गए तो ये लुटेरी और लालसा में डूबी सरकारें वह सब लुटवा देगी और सब हाथ मलते रह जाएंगे। हमे समय रहते जगना पड़ेगा, और जगाना भी पड़ेगा। अपने इस प्राकृतिक धरोहर को अगर नहीं बचाया तो ज़िंदा भी नही रह सकेंगे और ना ही अगली पीढ़ी को कुछ प्राकृतिक दे सकेंगे।

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