कोर्दुला कुजूर:
भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ की 80 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। हम यह भी कह सकते हैं कि कृषि, हमारे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और उस रीढ़ की मुख्य ताकत है, देश की आधी आबादी यानि कि महिलाएँ। अन्य उत्पादन कार्यों की तरह खेती भी “श्रम” के बिना संभव नहीं। खेती कार्य में लगनेवाली श्रम शक्ति में प्रमुख श्रम शक्ति महिलाओं की ही है। भारत में आर्थिक रूप से सक्रिय महिलाओं में 84 फीसदी महिलाएं खेती से जुड़ी हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 6 करोड़ से अधिक महिलाएँ खेती के कार्य से जुड़ी हुई हैं। कृषि से जुड़े सहयोगी कार्य जैसे बागवानी, पशुपालन, मुर्गी पालन, मछली पालन जैसे व्यवसाय में भी लाखों महिलाएं जुड़ी हैं। खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार भारतीय कृषि में महिलाओं का योगदान 32 प्रतिशत है। 48 प्रतिशत महिलाएं कृषि संबंधी रोज़गार में शामिल हैं, जबकि 7.5 करोड़ महिलाएं दूध उत्पादन और पशुधन प्रबंधन में उल्लेखनीय भूमिका निभा रही हैं।
आमतौर पर भारत में एक पुरुष एक वर्ष में लगभग 1800 घंटे खेती करता है तो महिलाएं 3300 घंटे खेत में बिताती हैं। खेती के कार्य में महिलाओं की भूमिका संपूर्णता में रहती है। पारंपरिक तौर पर रोपाई, निंदाई, फसल कटाई, ओसाइ, भंडारण एवं खाद देने जैसे कृषि कार्य को महिलाएं ही करती हैं। इसके अतिरिक्त बीजों की देखभाल, जानवरों की देखभाल तथा सिंचाई जैसे अन्य कार्य भी महिलाओं के जिम्मे ही आता है। अर्थात् कहा जा सकता है कि कृषि उत्पादन प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका प्रत्येक हिस्से में है। इतिहास हमें बताता है कि प्राचीनकाल में मातृसत्तात्मक समाज था और वर्तमान की तरह महिला ही कृषि कार्य करती थी। इसमें कोई शक नहीं कि स्थायी तौर पर नदियों के किनारे बसकर खेती से अन्न उपजाने की पहल महिलाओं ने ही की थी।
दुःख की बात तो ये है कि एक महिला जिसकी कृषि कार्य में पुरुषों से कहीं अधिक सहभागिता होती है उसे कृषक के रुप में पहचान देना तो दूर की बात उसके अस्तित्व को ही नकार दिया जाता है। उनके योगदान को नकारने की प्रवृत्ति परिवार, समाज, सरकार और योजना निर्माता सभी में विद्यमान है। महिला न सिर्फ कृषि कार्य करती है बल्कि घर की अधिकांश जिम्मेदारियां, जैसे- खाना बनाना, बच्चे एवं बुजुर्गों की देखभाल, परिवार के लिए ईंधन एवं पानी की व्यवस्था, मवेशियों को चारा-पानी देना इत्यादि सभी कार्य उनके जिम्मे है, बावजूद इसके, आज तक उनके श्रम का मूल्यांकन महिला दृष्टि से नहीं किया गया। अमूमन किसान की तस्वीर सामने आते ही धोती, गंजी पहने और कंधे पर हल, कुदाल लिये एक पुरुष आँखों के सामने नज़र आता है।
महिलाओं को किसान न मानना, भारतीय समाज में पितृसत्ता का होना भी एक वजह हो सकता है। इतिहास हमें बताता है कि ब्रिटिश साम्राज्य ने भी पितृसत्ता को बढ़ावा देने का काम किया है। 1793 ई. में जब ज़मीन की स्थायी बंदोबस्ती हुई, तब पुरुषों के नाम से ही पट्टा बना और मालगुजारी की रसीद भी पुरुषों के नाम से ही काटे गये। परिणामतः ज़मीन और खेती किसानी पुरुषों के प्रतीक बन गई। पितृसत्ता की मानसिकता और कानून की व्यवस्था ने महिलाओं को खेती-किसानी सहित सभी तरह की मालिकाना हक से बेदखल कर दिया।
संविधान में बराबरी का दर्जा दिए जाने के बावजूद हमारी सरकारों ने भी महिलाओं को किसान का दर्जा देने के संबंध में कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
उत्पादन और निर्माण तथा विकास का कोई भी कार्य जैसे निर्णय,और नियंत्रण तथा खेती का कार्य, जैसे- फसल बोने का निर्णय, आमदनी और खर्च पर नियंत्रण, फसल बिक्री पर नियंत्रण, साधन-संसाधन पर स्वामित्व के मामले में भी महिलाओं के अधिकार को दरकिनार कर दिया गया। आज की तारीख में, खेती के मामले में महिलाएं मात्र मेहनतकश मज़दूर ही बनकर रह गई, मालिक नहीं। इन सारी चीज़ों को देखने से हमारे मन में कई सवाल उठते हैं कि क्या महिलाओं को किसान का दर्जा हासिल हो पायेगा? महिलाओं को किसान का पहचान दिलाने के लिए सरकारी स्तर पर कोई ठोस पहल हो पायेगी? महिला किसानों के नाम पर क्रेडिट कार्ड मुहैया कराये जायेंगे? सरकार एवं प्रशासन द्वारा आयोजित की जाने वाली कृषि प्रशिक्षण कार्यशालाओं में महिला किसानों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की जायेगी? तकनीक, मशीनों का विकास, कार्यक्रम एवं योजनाओं को महिला नज़रिये से विकसित किया जायेगा?
जब हम इन सबके उत्तर ढूंढने का प्रयास करते हैं तो हमें तीन कारण दिखते हैं:-
१. चेतना का अभाव
२. परम्परा और सामाजिक नियमों के बंधन
३. अधूरे, अस्पष्ट और जटिल नियमों का होना।
पर इन कारणों का बहाना बनाकर हम हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकते हैं। इसके लिए हमें संगठित होना होगा, संगठित संघर्ष के लिए सामूहिक नेतृत्व का रूप गढ़ना होगा, ताकि किसी भी तरह के सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक जन संघर्ष चाहे वह क्षेत्रीय हो या राष्ट्रीय, हम महिलाएँ भी बराबर की भूमिका निभा सकें। राज सत्ता से होने वाले संवाद, नीति निर्माताओं तक अपनी बात पहुँचाने में हम महिलाएं सामूहिक नेतृत्व की भूमिका में रहे। जिसका संघर्ष उसी का नेतृत्व, वाली रणनीति बने, तो परिवर्तन अवश्य आयेगा। महिलाओं के संघर्षों का ही परिणाम है कि 12वीं पंचवर्षीय योजना में महिलाओं को किसान का दर्जा दिया गया एवं हर वर्ष 15 अक्टूबर को महिला किसान दिवस के रुप में मनाया जाने लगा। पर इसे हम मुट्ठी भर सफलता मात्र ही मानते हैं। हमारी लड़ाई तो आगे भी जारी रहेगी, जब तक न्याय और समता पर आधारित समाज की स्थापना नहीं हो जाती है।
यदि हम देखेंगे तो 2011 की जनगणना के अनुसार खेतिहर महिला मजदूरों की संख्या इस प्रकार है:-
| उम्र | संख्या (लाख में) |
| 05-09 वर्ष | 01.20 |
| 10-14 वर्ष | 4.55 |
| 15-19 वर्ष | 20.31 |
| 20-24 वर्ष | 34.62 |
| 25-29 वर्ष | 39.54 |
| 30-34 वर्ष | 38.67 |
| 35-39 वर्ष | 40.89 |
| 40-49 वर्ष | 62.64 |
| 50-59 वर्ष | 37.18 |
| 60-69 वर्ष | 22.31 |
| 70-79 वर्ष | 04.95 |
| 80 – आगे | 01.21 |
महिलाओं द्वारा किये जाने वाले कृषि संबंधी कार्य प्रतिशत में:-
| महिलाओं द्वारा किये जाने वाले कृषि संबंधी कार्य | प्रतिशत में |
| बीज की तैयारी | 83.9 |
| बुआई | 72.6 |
| सिंचाई | 64.2 |
| निकाई | 69.7 |
| उड़ाई | 58.6 |
| कटाई | 62.7 |
| मड़ाई | 54.8 |
| अन्न भंडारण | 86.7 |
| ढुलाई | 54.9 |
| रोपाई | 68.9 |
| कीटनाशक का छिड़काव | 42.4 |
| खाद का छिड़काव | 52.2 |
नोट:- यह लेख झारखंड महिला किसान संगठन द्वारा आयोजित कार्यक्रम पर रखे गए विचारों के आधार पर है और यह डाटा संवाद की ओर से जारी है।

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