नौशेरवां आदिल:

पता नहीं चल रहा हमे कि कौन क्या है! इंसान के साथ हो रहे अत्याचार के खिलाफ, ऊँच-नीच के खिलाफ, बढ़ते असंतोष के माहौल के खिलाफ, धार्मिक और संप्रदाइक हिंसा के खिलाफ, जातीय हिंसा के खिलाफ, सामाजिक हिंसा के खिलाफ, पारिवारिक हिंसा के खिलाफ, महिला हिंसा के खिलाफ, क्षेत्रीय हिंसा के खिलाफ, अशिक्षा के खिलाफ, गरीबी के खिलाफ, अंधविश्वास के खिलाफ, देश के ध्वज के अपमान के खिलाफ, भाषा के भेद भाव के खिलाफ, दहेज के खिलाफ, बहु-बेटी के हत्या के खिलाफ, निरंकुश शासन के खिलाफ, अपने हवस के खिलाफ, अपनी सोच के खिलाफ, बलात्कार और बलात्कारी के खिलाफ, भावनाओं से खिलवाड़ करने वाले के खिलाफ, फासीवाद के खिलाफ… कब अपनी आवाज़ बुलंद करेंगे?

इंसानियत के लिए हम कब जागेंगे!!! कब जागेंगे मणिपुर, फिलिस्तीन के मासूमों के लिए? कब जागेंगे महिलाओं की आज़ादी और बराबरी और सुरक्षा के लिए? कब जागेंगे हम उन सब इंसान विरोधी नियमों के खिलाफ?

कब हम अपना परिचय इंसान के रूप में देंगे? अगर हममें इंसानियत ज़िन्दा है, तो हमें जागना पड़ेगा हर उस चीज़ के खिलाफ, जो इंसान के खिलाफ हो। हमे जागना पड़ेगा बराबरी और समानता के लिए।

दोस्तों हम में से ही कोई नेता है, कोई मंत्री है, कोई अपनी पार्टी का नेतृत्व करता है, कोई समाज का नेतृत्व करता है तो कोई पंचायत का। फिर भी हमारे समाज के, राज्य के और देश के यह हालत क्यूँ हैं। हमें समझने की ज़रूरत है, ना कि किसी से झगड़ने की और ना ही किसी को भला-बुरा कहने की। कहने की बात तो बस इतनी है कि जो गलत है, उसे गलत कहो और उसका विरोध करो। उसे समझने और समझाने की कोशिश करो और खुद भी समझो।

हर साल आता और जाता है। हर दिन, महीना, सप्ताह आता और जाता है। लेकिन कोई चीज अगर नहीं आती और जाती तो वह है हम और हमारा दिमाग, हमारी इंसानियत, हमारी सोच। कब बदलेंगे हम अपनी सोच को? समय रहते हमें अपनी दिनचर्या को सुधारने की जरूरत है।

जो समय के साथ बदला है, वही जीना सीखा है। जो नहीं बदला, उसका अस्तित्व मिट गया है। फिर भी हम असंवेदनशीलता के साथ जीवन गुज़ार रहे हैं। ऐसा लगता है कि जीवन और समाज, देश-दुनिया में कुछ नहीं हो रहा है और न ही कोई, किसी पर कुछ कर रहा है। सब खुशहाल हैं, ऐसा लग रहा है। हालाँकि ये सच नहीं है। होने को तो बहुत कुछ हो रहा है लेकिन किसी के कानों में जूँ तक नही रेंग रही। इस देश, दुनिया, समाज में, ना तो कोई संगठित तरीके से इसके खिलाफ लिख रहा है, ना कोई बोल रहा है।

और जो बोल रहा है, उसका कोई साथ देने वाला नहीं है। हम उसका साथ देते हैं, तो ये सरकारें हमें आतंकवादी, नक्सली और देशद्रोही जैसे नामों से संबोधित करती है। हम में से कोई लिख रहा है या संघर्ष के साथियों का साथ दे रहा है, तो उसे दबाया, डराया, धमकाया जा रहा है। निडर बने रहने वालों को साजिशन पेचीदा तरीकों से उलझाया जा रहा है। जो हमारे साथ लफ़्ज़ों से खेलते हैं, हमारी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते हैं और चुनाव में हमसे वोट लेते हैं, झूठा आश्वासन देते हैं; वह लोग जीतने के बाद हमारे लिए क्या करते हैं? हमे सोचने की ज़रूरत है कि यह राजनीति हमको कहाँ ले जा रही है और हमारे लिए राजनेता क्या कर रहे हैं!!!

इस समय खुद के अस्तित्व को बचाया जाए कि समाज और इंसानियत के लिए खड़ा रहा जाए और सही गलत को समझा जाए और लफ़्ज़ों की राजनीति पर विचार-विमर्श करने और अपनी समझ को डेवलप करने की और अपने समाज के लोगो को जगाने की जरूरत है, इसी पर विचार विमर्श करने की ज़रूरत है।

समझ में नही आ रहा हैं कि क्या किया जाये और कैसे?

उथल-पुथल से भरी इस दुनिया में नेचर ही है जिससे हम फल-फूल सकते हैं, आगे जीवित रह सकते हैं और उसकी बदौलत हम अपना फ्यूचर बना सकते हैं। पर अफसोस कि इस इंसान नाम की यह प्रजाति, फ्यूचर बनाने के चक्कर में नेचर को ही नष्ट कर रही है, आगे चल के फ्यूचर को छोड़कर सब नेचर के पीछे आयेंगे पर अफसोस कि तब जब नेचर अपना अस्तित्व भूल रहा होगा।

Author

  • नौशेरवा आदिल अररिया बिहार से हैं और जन जागरण शक्ति मंच संगठन के साथ युवाओं के मुद्दों पर काम कर रहे हैं। आदिल सामाजिक परिवर्तन शाला से भी जुड़े हैं।

    View all posts

Leave a Reply

Designed with WordPress

Discover more from युवानिया ~ YUVANIYA

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading