यशवर्धन सिंह और सुनील कुमार:
“जल ही जीवन है”, हम सभी बचपन से सुनते आ रहे हैं। जहाँ पानी होता है वहाँ जीवन होता है। यह इमारतें, कारखाने, उद्योग, सड़क, रोटी, कपड़ा, मकान आदि, जल से ही संभव हैं। यह भी कहा जा सकता है कि जल के बिना विकास असंभव है।
भारत में आज भी ऐसे लोग हैं, जिनके पास ना नल है, ना हैंडपंप, ना पानी की टंकी या पानी का और कोई साधन। तमाम सरकारी योजनाओं के बावजूद आज भी लोग पानी से वंचित हैं। और यह लोग दूर-दराज़ किसी कोने में नहीं, हमारे बीच ही हैं। ऐसे ही लाखों लोग रोज़ पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं और लाखों कारणों की वजह से उनके पास आज तक पानी नहीं पहुँचा है। ऐसी ही कहानी है मध्य प्रदेश के ग्वालियर में स्थित मोहनपुर पहाड़िया नामक एक बस्ती की, जहाँ आदिवासी समाज के लोग निवास करते हैं।

आज से 15–20 साल पहले, मोहनपुर के आदिवासी रोटी, कपड़ा और मकान की तलाश में पलायन कर ग्वालियर आये थे और फिर वहीं निवास करने लगे। ग्वालियर में इस समुदाय की मुख्य आजीविका कबाड़ा बीनना है। वे रोज़मर्रा की ज़रूरतों और मूल सुविधाओं के लिये संघर्ष कर रहे हैं। इन ज़रूरतों में से एक महत्त्वपूर्ण समस्या पानी की है। बस्ती की एक बुज़ुर्ग महिला बताती हैं –
“पिछले 15 – 20 सालों से हमारी बस्ती में पानी की कोई व्यवस्था नहीं है। आस-पास की बस्तियों में हैंडपंप तो है, पर आदिवासी समाज के लोगों को वहाँ से पानी लेने की इजाज़त नहीं है। पानी लेने जाने पर हमारे बर्तन फेंक दिए जाते हैं। इस मजबूरी के कारण हमें बस्ती से 2 किलोमीटर दूर हाईवे पर बने ढाबे पर पानी भरने जाना पड़ता है। ज़्यादातर यह काम घर की महिलाएं और बच्चे करते हैं।”
ज़ेनिथ संस्था के कार्यकर्ताओं ने जब इस समस्या को समझा तो लगा कि समाधान की राह सरल है। प्रशासन को पत्र के माध्यम से अवगत करवा कर वहाँ पानी का कोई ना कोई इंतजाम हो ही जायेगा। आखिर पानी तो लोगों का मौलिक अधिकार है। यह अधिकार तो संवैधानिक है।

जून 2023 से पानी के साधन के लिए लोगों का संघर्ष शुरू हुआ। सबसे पहले उन्होंने समाधान के लिए अपने पार्षद के पास जाना उचित समझा। उम्मीद के साथ वे पार्षद से मिले और उन्हे अपनी यह समस्या बताई। पार्षद जी ने आश्वासन दिया की वे बगल वाली बस्ती के लोगों से बात कर इस समुदाय को पानी भरने की इजाज़त दिलवाएंगे। अगले दिन जब बस्ती के लोग पानी भरने पास की बस्ती गए तब वहाँ के लोगों ने उन्हें पानी भरने से मना कर दिया और झगड़ा करने लगे। जब यह बात पार्षद तक पहुँची तो पार्षद ने सिर्फ दूसरी बस्ती वालों का साथ दिया न की आदिवासी समाज का। इससे यह साफ़ हो गया की पार्षद जी उनकी समस्या का समाधान नहीं कर सकते।
इस लड़ाई को आगे बढ़ाते हुए 1 अगस्त को बस्ती से लगभग 40 लोग ग्वालियर कलेक्टर कार्यालय और नगर निगम पहुँचे व आवेदन दिया। नगर निगम उपायुक्त द्वारा आश्वासन दिया गया की 3 दिन के अन्दर बस्ती में हैण्डपंप लगवा दिया जायेगा और अगर नहीं लगा तो वह स्वयं इस कार्य को करवायेंगे।
अगले ही दिन बस्ती में कुछ सरकारी लोग सर्वे करने आये और सर्वे कर रिपोर्ट बनाकर ले गए। रिपोर्ट के बारे में लोगो को कोई जानकारी नहीं दी गयी।
6 दिन बीत जाने के बाद सर्वे पर आये अधिकारी को संपर्क कर हैण्डपंप नहीं लगने का कारण जानने की कोशिश की। अधिकारियों के अनुसार वह ज़मीन वन विभाग के अंतर्गत आती है और नगर निगम वहाँ हैण्डपंप नहीं लगा सकता। बस्ती के लोगों का अधिकारीयों से एक ही सवाल था:
अगर ज़मीन वन विभाग की है तो पास की बस्ती में हैण्डपंप और बोरिंग कैसे है, और सिर्फ हम को सुविधायें क्यों नहीं दी जा रहीं?
जवाब बस यह था कि प्रशासन भी शासन के नियम में बंधा हुआ है एंव यह काम केवल मंत्री जी के द्वारा करवाया जा सकता है।
इस जवाब के बाद प्रशासन ने भी अपने हाथ खड़े कर लिये।
कुछ समय बाद बस्ती के लोग अपनी समस्या को लेकर मंत्री जी के कार्यालय पहुँचे। मंत्री जी के कार्यालय के कर्मचारियों से बस्ती के लोगों को आश्वासन दिया गया कि दिनांक 11 सितम्बर को बस्ती में हैण्डपंप लग जायेगा। यह सुनकर बस्ती के लोगों ने राहत की सांस ली। 11 तारीक को बस्ती में अलग ही उत्साह था। उन्होंने हैण्डपंप लगवाने का स्थान चुन लिया था और मशीन की पूजा करने का सामान भी मंगवा लिया लेकिन इंतजार करते – करते शाम हो गई और वहाँ पर कोई नहीं आया।

बस्ती के लोग 17 तारीख को फिर मंत्री जी के यहाँ जन सुनवाई में जा पहुँचे, कुछ घंटो इंतज़ार के बाद स्वयं मंत्री जी से मुलाकात हुई। मंत्री जी के अनुसार भी हैण्डपंप ना लगने का कारण ज़मीन का वन विभाग के अंतर्गत आना बताया गया। मंत्री जी ने फिर भी आश्वासन दिया कि अगले 3 दिनों के अंदर पानी की व्यवस्था करवा दी जाएगी और यह पानी की समस्या ख़त्म हो जाएगी।
उस दिन से आज तक शासन या प्रसाशन का कोई भी व्यक्ति बस्ती में नहीं आया और न ही पानी की कुछ और व्यवस्था की कोई खबर आई। फ़ोन पर कई बार मंत्री जी के कार्यालय में संपर्क करने की कोशिश की लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
मौलिक अधिकार की यह लड़ाई केवल ऑफिस-ऑफिस का खेल बन कर रह गयी है। वह शासन जो जन विकास के लिए नदी को रोकने की क्षमता रखता है, वह लोगों की यह समस्या दूर करने में विफल रहा। दैनिक आवश्यकताओं के ऐसे संघर्षों में बस्ती के बच्चे भी शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। आखिर सही कहा जाता है, जल ही जीवन है, मगर जल नहीं, तो कैसा जीवन?

आज भी यह बस्ती इस आस में है कि शासनिक, प्रशासनिक या किसी भी तरीके से, सिर्फ इन लोगों की प्यास बुझ जाए। पहली नज़र में आसान लगने वाली यह छोटी सी समस्या हमारे इतने जूते घिसवाने के बाद भी हाथ न आएगी यह हमने नहीं सोचा था!!
यह लेख ज़ेनिथ की पहल – सेहर ब्लॉग पर प्रकाशित हुआ है। इसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं – https://shorturl.at/fsBO9

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