ललित कुमार उप्रेती:
नवंबर में उत्तराखंड के कानिया क्षेत्र और उसके आस पास के ग्रामीण इलाकों में बाघ का आतंक धीरे-धीरे बढ़ने लगा। बाघ गौशाला में जाता और बंधी हुई गायों को अपना निवाला बनाता। पंद्रह दिनों के अंदर उसने सात गायों को एक-एक करके मार दिया। ये गायें अलग-अलग किसानों की थीं। इन घटनाओं के बाद क्षेत्र के ग्रामीणों का आक्रोश बढ़ने लगा। हालांकि गाय को बाघ द्वारा मारे जाने के बाद जिम कॉर्बेट प्रशासन के अधिकारी तुरंत आ तो जाते थे, लेकिन कुछ कार्रवाई नहीं करते। शाम ढलते ही लोग घरों के अंदर छुप जाया करते थे।
आक्रोश धीरे-धीरे बढ़ता रहा और 30 नवंबर 2023 को ग्रामीण इकट्ठा होकर, कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान के प्रशासन के कार्यालय पहुँच गए। यहाँ पर उनकी मुलाकात कॉर्बेट के वार्डन से हुई और उनके माध्यम से एक ज्ञापन दिया गया और कहा गया कि अगर आपके अधिकारियों द्वारा तुरंत बाघ को नहीं पकड़ा गया तो क्षेत्र के अंदर एक बड़े आंदोलन की आहट पैदा हो सकती है। कॉर्बेट प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई करके दो बाघों को पकड़ लिया। एक मादा माँ और एक साल का उसका बच्चा।
लेकिन इसके बाद भी बाघों का आतंक समाप्त नहीं हुआ।
रामनगर का पश्चिमी क्षेत्र, कॉर्बेट और पश्चिमी तराई, वन क्षेत्र से घिरे हुए हैं। यह क्षेत्र बाघों के लिए सुरक्षित माना जाता है। यहाँ पर बाघों की संख्या अत्यधिक बढ़ चुकी है। कॉर्बेट का क्षेत्रफल 1288 वर्ग किलोमीटर के लगभग है। इस क्षेत्र में लगभग 260 बाघ हैं। एक बाघ को रहने के लिए करीब 20 वर्ग किलोमीटर की आवश्यकता होती है और इस हिसाब से मानें तो यहाँ पर 65 बाघ होने चाहियें। बाघों की अत्यधिक संख्या और उनका आपसी संघर्ष, कमज़ोर बाघ को जंगल से बाहर खदेड़ देता है, जो गाँव की आबादी की तरफ़ आता है। सबसे आसान शिकार उसका पालतू पशु और मानव होते हैं। सीसीटीवी कैमरे से पता चला है कि इन गाँवों के अंदर एक-दो बाघ और कई तेंदुए रात में घूमते हुए नजर आते हैं।
इसी बीच में हाथी डंगर क्षेत्र में एक बाघ ने एक 26 वर्ष की औरत, पूजा देवी को अपना निवाला बना लिया, जो अपने एक साल के बच्चे के साथ में घास काटने गयी थी। इस घटना के एक हफ़्ते के भीतर ही पटरानी इलाके की अनीता देवी को बाघ द्वारा अपना निवाला बना लिया गया। अनीता के चार बच्चे हैं। अनीता केवल 31 वर्ष की थी। इन सभी घटनाओं से ग्रामीणों के अंदर आक्रोश बढ़ता रहा। प्रशासन द्वारा कोई कार्यवाही ना करने के चलते, सामूहिक तौर पर एक बड़े आंदोलन की ज़रूरत पैदा हुई।
9 दिसंबर को ग्रामीणों द्वारा संयुक्त संघर्ष समिति के आह्वान पर ढेला झिरना ज़ोन बंद कर दिया गया। और ग्रामीणों ने कॉर्बेट प्रशासन को चेतावनी दी कि अगर बाघ को तुरंत नहीं पकड़ा गया तो इससे भी बड़ा धरना प्रदर्शन किया जाएगा और ढेला झिरना जोन दोबारा बंद कर दिया जाएगा। लेकिन कॉर्बेट प्रशासन के कानों में जूं तक ना रेंगी। इसका परिणाम यह हुआ कि मालधन के दो जवानों को बाघ द्वारा घायल कर दिया गया और वह बाल-बाल बच गए। इससे पहले अंकित नाम के एक लड़के को यह बाघ घायल कर चुका था जो रामनगर से मालधन अपने घर जा रहा था और आधे घंटे तक वह बाघ से संघर्ष करता रहा, लड़ता रहा। उसके पिताजी उसे घायल अवस्था में रामनगर ले गए। लेकिन रामनगर अस्पताल वालों ने उसे ऋषिकेश एम्स के लिए रेफर कर दिया। एम्स अस्पताल पहुँचने पर वहाँ उसे बैड देने से इनकार कर दिया और बोले हमारे पास बैड उपलब्ध नहीं है।

अगले दिन अंकित के पिताजी अंकित को काशीपुर लेकर गए और पूरे दिन प्राइवेट अस्पतालों के चक्कर काटते रहे। कहीं भी अंकित का उपचार नहीं हुआ। इसके बाद वो अंकित को लेकर गुड़गांव के एक प्राइवेट अस्पताल चले गए जहाँ उसे भर्ती किया गया। डॉक्टर ने अंकित के पिताजी से कहा यह तो बहादुर बच्चा है। इसने शेर से आधे घंटे तक लड़ा। ऐसा तो पहले राजा महाराजा किया करते थे। हम इसका इलाज करेंगे। लेकिन इसके इलाज में 20 से 25 लाख रुपए का खर्चा आएगा। अंकित के पिताजी, सूरज, एक छोटे किसान हैं। बेचारे सोचते रहे कि मैं इतना पैसा कहाँ से लाऊंगा। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और उन्होंने कहा कि आप मेरे बेटे का इलाज करो, मैं आपके लिए पैसे की व्यवस्था करता हूँ। उन्होंने अपनी ज़मीन गिरवी रख दी। अभी नई-नई शादी हुई, अपनी बेटी के जेवर गिरवी रखकर, ब्याज पर कई लोगों से पैसा उठा लिया।
इसी सिलसिले में संयुक्त संघर्ष समिति के द्वारा अंकित के घर पर बैठक बुलाई गई। बैठक के बाद समिति के द्वारा लोगों से आह्वान किया कि अंकित जैसे बहादुर बच्चों के जीवन को बचाने के लिए समाज को आगे आना चाहिए। संघर्ष समिति ने सोशल मीडिया के माध्यम से और न्यूज़ पेपरों के माध्यम से अंकित जैसे बहादुर बच्चे को बचाने का आह्वान किया। साथ ही कॉर्बेट कार्यालय पर जाकर प्रशासन के सामने इस मुद्दे को लेकर धरना दिया और अंकित के लिए उचित मुआवज़े की मांग रखी। लेकिन प्रशासन ने सिर्फ ₹50,000 देकर अपना पल्ला झाड़ दिया।

14 दिसंबर को झिरना जोन को बंद कर, स्थानीय लोगों ने धरना दिया। इसकी खबर ज्ञात होने के बाद कॉर्बेट के डिप्टी डायरेक्टर, वार्डन और रेंजर सहित पुलिस के आला अधिकारी पहुँच गए। उन्होंने ग्रामीणों को बहुत समझाने की कोशिश की। लेकिन ग्रामीणों ने प्रशासन के आगे मांग रखी की बाघ को तुरंत पकड़ा जाए। डायरेक्टर ने कहा कि हमने उस बाघ को ट्रेंकुलाइज करने के आदेश दे दिए हैं। और हमने उस बाघ को चिन्हित भी कर लिया है। हम दो दिन के अंदर उस बाघ को पकड़ लगें। इसके बाद ग्रामीणों ने 4:00 बजे धरने को खत्म कर दिया। साथ ही इस बात की चेतावनी दी कि अगर आपने बाघ को 20 तारीख तक नहीं पकड़ा तो हम 21 तारीख को कॉर्बेट कार्यालय पर धरना देंगे। लेकिन 20 तारिक तक बाघ नहीं पकड़ा गया, क्योंकि कॉर्बेट प्रशासन बाघ को पकड़ना ही नहीं चाहता था।

21 तारीख को कॉर्बेट कार्यालय पर सभी ग्रामीण पहुँचे और सभी ग्रामीणों ने 31 तारीख को कॉर्बेट के ढेला झिरना जोन को बंद करने की घोषणा कर दी। क्योंकि नए साल के मौके पर कॉर्बेट में बहुत सारे बाहर के पर्यटक घूमने आते हैं, बड़े-बड़े VIP भी नए साल पर इस क्षेत्र में घूमने आते हैं। इस विषय को लेकर संयुक्त संघर्ष समिति गाँव-गाँव जाकर 31 तारीख की तैयारी करने लगी। जिसकी खबर मिलते ही कॉर्बेट प्रशासन के हाथ-पांव फूलने लगे और 29 तारीख को कॉर्बेट के डायरेक्टर ने एक वार्ता के लिए संयुक्त संघर्ष समिति को लिखित में संदेश भेजा। समिति के सदस्य जब 29 तारीख को कॉर्बेट के कार्यालय पर गए तो कॉर्बेट के डायरेक्टर वहाँ से गायब हो चुके थे। अब कॉर्बेट प्रशासन का नकाब उतर चुका था कि वह गाँव वालों से किसी तरह से वार्ता नहीं करना चाहते। समिति के सदस्यों के अंदर अत्यंत हताशा पैदा हुई। उन्होंने वहाँ नारे लगाए और 31 की तैयारी में जुट गए।
30 दिसंबर को एसडीएम का फ़ोन संयुक्त संघर्ष समिति के पास आया। बार-बार फ़ोन कर कहते हैं की हम आपके साथ वार्ता करना चाहते हैं। संयुक्त संघर्ष समिति ने कहा कि हम डायरेक्टर से कल वार्ता के लिए गए पर उन्होंने हमसे वार्ता करना उचित समझा ही नहीं। लेकिन एस.डी.एम (SDM) का बार-बार फ़ोन आता रहा और समिति के लोगों से कहा की आप एक बार आकार मिल लीजिये। फिर भी हम पांच-सात लोग, जो गाड़ी से प्रचार करने के लिए ढेला गाँव चले गए। कुछ देर बाद ही डायरेक्टर, डिप्टी डायरेक्टर, वार्डन, रेंजर, एसडीम, तहसीलदार, पुलिस प्रशासन, सभी ढेला गाँव पहुँच गये। उन्होंने संघर्ष समिति के उपर दबाव बनाने की कोशिश करी कि आप 31 तारीख का प्रोग्राम कैंसिल कर दीजिए। हमने कहा कि आपने बाघ को पकड़ने के लिए क्या करा? आपने हमें अपने कार्यालय बुलाया और आप वहाँ से नदारत हो गए! वो भी उस समय, जब उन्होंने ही खुद हम से बात करने के लिए, हमको बुलाया था। हम भी नहीं चाहते कि कॉर्बेट के दरवाज़ों को बंद किया जाए। लेकिन आप कोई भी वार्ता हमसे चाहते ही नहीं थे। आपने कहा था कि हम 2 दिन के अंदर बाघ पकड़ लेंगे, लेकिन आपने कोई भी काम ऐसा नहीं करा जो आपने कहा। हम तो भय में जी रहे हैं और गेटों को तो हमने मजबूरी के कारण बंद करने का आह्वान किया। उसके बाद हम लोग उस बैठक से उठकर चले आये।

30 तारीख की रात में हम 15-20 लोग सांवलदे इलाके में ही रुक गए। यहाँ हमें पता चला कि रात में ही वहाँ पर धारा 144 लगा दी गई है। समिति के सभी सदस्यों ने बात करी कि क्या किया जाए? सब ने एक मत में कहा कि हम सब एक साथ कल अपनी मांगें रखने और दुःख व्यक्त करने जाएंगे। साथ ही हम गेट भी बंद करेंगे। जब तक हमारी समस्या का समाधान नहीं होता, हम टूरिस्ट गाड़ी को अंदर नहीं जाने देंगे। 31 तारीख की ठीक सुबह 5 बजे हम सभी लोग सड़क पर इकट्ठा हो गए। गाँव से और साथी जन भी निकल कर आने लगे और सड़क पर दरी बिछाकर हम सबने नारेबाजी शुरू कर दी। कुछ देर बाद वहाँ पर टूरिस्ट जिप्सी की लाइन लग गई और कुछ जिप्सियां वापस भी चली गईं। इसके थोड़ी देर बाद, वहाँ पर पुलिस बल भी आ पहुँचा। हम लोग फिर भी नारेबाजी करते रहे। बाघ को तुरंत पकड़ो ,ग्रामीणों को सुरक्षा दो आदि नारे सड़कों पर गूंजते सुनाई दिए। थोड़ी देर बाद पुलिस प्रशासन अपनी हरकत पर आया और उसने एक-एक करके सभी साथियों को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया। पुलिस की इस गिरफ्तारी के बाद विरोध बढ़ने लगा। महिलाओं ने भी नारेबाजी शुरू कर दी। सुबह तकरीबन 7:30 के लगभग हम 12 से 13 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। सभी को तहसील परिसर में लाया गया। हमें ऐसा लग रहा था कि मानो हमारा आंदोलन खत्म हो चुका है, लेकिन जो साथी हमारे बाहर थे उन्होंने उस मोर्चे को संभाल लिया। हम तहसील पर ही धरने पर बैठ गए। वहाँ पर जनगीत गाने लगे।
इसी बीच हमारे अन्य साथियों को पुलिस वालों ने गिरफ्तार करने की कोशिश करी, लेकिन वह बचते रहे क्योंकि 2:00 बजे जब दोबारा जिप्सियां गेट के अंदर जाती हैं फिर दोबारा प्रोटेस्ट करना था। 1:30-2:00 बजे, बहुत सारी महिलाएं घरों से बाहर निकल कर आईं और सड़क जाम कर दी। पुलिस प्रशासन में फिर महिलाओं को रोकने की बहुत कोशिश करी, धक्का-मुक्की हुई। एक-एक साथी को पुलिस वालों ने गिरफ्तार कर लिया और तहसील परिसर ले आये। महिलाओं ने पुलिस वालों के साथ बहुत देर तक संघर्ष किया और अपने साथियों को ना ले जाने के लिए पूरी कोशिश की। उन बहादुर महिला साथियों को सलाम किया और फिर हम सभी साथी तहसील परिसर में शाम 5:30 बजे तक रहे। शाम को सभी को वहाँ पर निजी मुचलके पर छोड़ दिया गया। इस तरह का 31 दिसंबर का हमारा संघर्ष सफल रहा। कोई भी जिप्सी ढेला झरना जोन नहीं गई।
लेकिन हमारी जो लड़ाई थी वो अभी भी जिंदा है हमारी मांगे हैं कि:-
- बाघ द्वारा जो भी व्यक्ति मारा जा रहा है, उसके परिवार वालों को 25 लाख का मुआवजा दिया जाए। घायल को 10 लख रुपए का मुआवजा दिया जाए।
- बाघ द्वारा जिस व्यक्ति को घायल किया जा रहा है, उसका पूरा इलाज सरकार, सरकारी खर्च पर करें और अच्छे से अच्छे अस्पताल में करें। जंगली जानवरों से इंसानों, फसलों व मवेशियों की सुरक्षा की जाए।
- ग्रामीणों के जंगलों पर परंपरागत हक-हकूप को जल्द से जल्द बहाल किए जाए।
- समुचित क्षेत्र में बंदरों का आतंक है, इसका तत्काल रूप से समाधान ढूँढा जाए या इन्हें हटाया जाए।
- समस्त वन ग्रामों का विद्युतीकरण किया जाए व उन्हें राजस्व ग्राम का दर्जा दिया जाए।

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