अरबिंद भगत:

भारत एक बहुसांस्कृतिक राष्ट्र है, यहाँ विभिन्न प्रकार की संस्कृतियाँ सदियों से विभिन्न देशों-दिशाओं से आकर इसका हिस्सा बनती रही। इन सभी संस्कृतियों की भारतीय सभ्यता के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसी व्यापक समाज का अभिन्न अंग है यहाँ के आदिवासी समुदाय- जिन्हें कई विचारकों ने भारत के शुरुवाती समुदाय माना है। भारत का आदिवासी समाज जो शेष समाज से अपनी विशिष्ट प्रथा, परम्परा संस्कृति और जीवन दर्शन के कारण अलग जाना जाता है, तभी तो 1871 में अंग्रेजों द्वारा की गई औपनिवेशिक भारत की पहली जनगणना में इनकी विशिष्ट पहचान को परम्परागत धार्मिक पहचानो (हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई) से अलग स्वीकार किया और कालांतर में इनके लिए व्यापक भारतीय समुदाय से अलग शासन व्यवस्था की व्यवस्था का भी निर्माण किया गया। मिसाल के तौर पर झारखण्ड में छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी एक्ट 1908) और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (एसपीटी एक्ट1949) को देखा जा सकता है। साथ ही अंग्रेजों ने इनकी सामाजिक व्यवस्था के संचालन के लिए औपनिवेशिक राज्य के कानूनों के बजाय इनके पारम्परिक समुदायिक कानूनों को मान्यता प्रदान की। स्वतंत्र भारत में भी भारतीय शासन व्यवस्था ने न सिर्फ इन व्यवस्थाओं को जीवित रखा बल्कि संविधान में इन्हें 5वीं और 6वीं अनुसूची के अन्तर्गत संवैधानिक मान्यता भी प्रदान की। पारंपरिक तौर पर मानवशास्त्रियों, और समाजशास्त्रियों ने आदिवासी समाज को समानता आधारित समाज के रूप में स्वीकार किया है, जहाँ लैंगिक विभाजन शेष समाज की तुलना में नगण्य है। परंतु आधुनिकता और अन्य समाज के साथ संक्रमण का असर आदिवासी समाज पर भी पड़ रहा है, जिस कारण अब यहाँ भी सामाजिक बुराइयों की समस्याओं का उभार दिख रहा है।

बदलाव प्रकृति का आवश्यक गुण है, और विभिन्न कारणों जैसे आधुनिकीकरण, नगरीकरण, बाहरी समाज का हस्तक्षेप, अपनी मूल भूमि से विस्थापन, प्रवासन, आंतरिक उपनिवेशीकरण, धर्मांतरण, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक शोषण के कारण भी आदिवासी समाज में बदलाव आया है। इन बदलावों ने वर्तमान में ऐसे प्रश्नों को जन्म दिया है, जिसने उनकी मौलिक संरचनाओं को गहरे तौर पर प्रभावित किया है। आदिवासी समाज में वर्तमान में उभरा ‘स्त्रियों का पैतृक संपत्ति पर अधिकार’ ऐसा ही एक प्रश्न है। पिछले कई वर्षों में बहुतेरे ऐसे केस आये हैं, जब कई आदिवासी स्त्रियों ने संपत्ति पर अधिकार के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इस पर भारत भर के विभिन्न उच्च न्यायालयों के फैसलों और माननीय सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश ने, जिसमें यह कहा गया कि – अब समय आ गया है कि आदिवासी समाजों में भी महिला समानता स्थापित की जाए और सरकार को इस आशय से पैतृक संपत्ति संबंधी अधिकार कानून में संशोधन किया जाय, इस हेतु आदिवासियों में हिन्दू उत्तरधिकार अधिनियम को विस्तारित की जाए। इससे आदिवासी समुदाय में महिला समानता और उत्तराधिकार की बहस केंद्र में आ गई है। कई महिला संगठन, वर्षों से सरकार पर इस पर कार्य करने हेतु दवाब डाल रही हैं।

आदिवासी समाज में भूमि और उत्तराधिकार का नियमन:

आदिवासी समाज, भारत की सामाजिक व्यवस्था में अपनी विशिष्टता के कारण एक विशिष्ट स्थान रखता है। आदिवासी समाज, शेष भारत के विपरीत ‘भूमि’ के लिए न सिर्फ आर्थिक बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। ‘भूमि’ यहाँ व्यक्तिगत सम्पति के बजाय सामुदायिक सम्पति मानी जाती है जो समुदाय का आधार है। आदिवासी समुदाय अपनी भूमि का नियमन अपनी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था से करता रहा है। यहाँ उत्तराधिकार संबंधी नियम भी भारतीय शासन व्यवस्था से अलग हैं। इस समुदाय के लिए भूमि की महत्ता इससे भी समझी जा सकती है कि ऐतिहासिक तौर पर जब भी इनके जल-जंगल-जमीन पर बाहरी अतिक्रमण का प्रयास हुआ है तब-तब उन्हें व्यापक प्रतिरोध का सामना किया है। झारखण्ड में बिरसा मुंडा का आंदोलन (1899-1900), संथाल आंदोलन (1855), कोल विद्रोह (1831-32), चेरो विद्रोह, (1795-1800) तथा अन्य कई आंदोलन इसके उदाहरण हैं।

 आदिवासी समाज के नियमों के अनुसार उत्तराधिकार को लेकर निम्नलिखित नियम हैं-

  1. सम्पति (चल-अचल) वंश (clain) से किसी भी स्थिति में बाहर नहीं जा सकती।
  2. महिला संपत्ति की उत्तराधिकारी नहीं हो सकती।
  3. अविवाहित बेटी या बहन तब तक उत्तराधिकारी होती है जब तक वह अविवाहित है, तब तक वह सारे अधिकारों का उपभोग कर सकती है। उसे उत्तरधिकार में संपत्ति तब प्राप्त हो सकती है जब मृत्यु शैय्या पर पड़े उसके पिता ने इस आशय से इच्छा जाहिर की हो।
  4. विधवा महिला अपने पति की मृत्यु  के पश्चात आजीवन अपनी संपत्ति का उपभोग करती है, पर उसे बेच नहीं सकती।

इस प्रकार हम देखते हैं कि सम्पत्ति पर सामुदायिक अधिकार के तहत आदिवासी जमीन अपने वंश से बाहर नहीं जा सकती और चूंकि महिला शादी के बाद दूसरे वंश में जाती है इसलिए उसके संपत्ति संबंधी अधिकार को तुलनात्मक तौर पर सीमित रखा गया है।

संपत्ति उत्तराधिकार संबंधी वाद -विवाद:

यद्यपि सदियों से आदिवासी समाज अपने पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के अनुसार जीवन का नियमन करते आ रहे हैं, परंतु जैसा विदित है विभिन्न कारणों से इनकी पारम्परिक स्वशासन व्यवस्था में विचलन आया है, जिस कारण सामाजिक व्यवस्था के संचालन में समस्या आ रही है। आधुनिकीकरण, विस्थापन, धर्मांतरण, अंतरधार्मिक विवाह, गैरजातीय विवाह ऐसे कुछ प्रमुख कारण हैं। चूंकि आदिवासी संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, इसलिए नित नई समस्याएं पैदा हो रही हैं, इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है संपत्ति पर उत्तराधिकार का प्रश्न। आज पूरे भारत में आदिवासी महिलाओं के उत्तराधिकार के अधिकार का प्रश्न ज्वलंत है। हालांकि ये प्रश्न नए नहीं हैं, सन 1986 में जुलियाना लकड़ा( मधु किश्वर और अन्य बनाम बिहार राज्य और अन्य 17 अप्रैल 1997) ने रिट पिटिशन दायर किया था, जिसमें सीएनटी एक्ट (1908) के प्रावधानो को इस आधार चुनौती दी कि ये प्रावधान आदिवासी महिलाओं को पैतृक संपत्ति के अधिकार से वंचित करता है। हालांकि तब कोर्ट ने मूलाधिकार अधिनियम 14, 15, 21 के प्रावधानो के अन्तर्गत रखते हुए इन प्रावधानो को रद्द करने से मना कर दिया। परंतु प्रभा मिंज बनाम बनाम मार्था एक्का, (22 अप्रैल 2022) के मामले में झारखंड हाई कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि आदिवासी महिला को उत्तराधिकार में पैतृक संपत्ति का अधिकार है। हालांकि कोर्ट में यह फैसला देते हुए कस्टमरी लॉ के यूनिफॉर्मटी के अभाव को दूर करने की बात कही। 

यह सच है कि वर्तमान समय में महिलाओं को बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जैसे विधवा महिला को आजीविका से वंचित करना, किसी महिला जिसकी मात्र बेटियाँ हो उसे जमीन के लिए तरह-तरह से प्रताड़ित करना, तलाकशुदा बहन को आजीविका के निर्वाह से वंचित करना आदि। इन्हीं कारणों से ये मांग आदिवासी समाज में आ रही है और समय रहते इनका निदान आवश्यक है, ताकि व्यापक समाज को विघटन से रोका जा सके।

आदिवासी समाज पर इन फैसलों का प्रभाव: 

यह स्पष्ट है कि कोई भी बदलाव किसी समुदाय को व्यापक रूप से प्रभावित करता है। आदिवासी समाज भी इन बदलावों के प्रभावों से अछूता नहीं है। यदि पैतृक संपत्ति अधिकार संबंधी विवादों की बात करें तो यह निम्नलिखित दूरगामी परिणाम हो सकते हैं: 

  1. आदिवासी समुदाय में भूमि सामुदायिक संपत्ति मानी जाती है, यदि परंपरागत कस्टमरी लॉ के अंतर्गत समस्या का निपटारा नहीं किया गया तो समाज में भूमि के अलगाव की प्रक्रिया तेज़ होगी।
  2. आदिवासी समाज के लिए भूमि उसके जीवन का आधार है, यदि भूमि की संरचना में अनावश्यक बदलाव किया जायेगा तो उसके जीवन पर संकट आएगा।
  3. समाज की बेहतरी के लिए उस समुदाय के प्रत्येक व्यक्ति को हर पहलू- समाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक पर संतुष्ट होना चाहिये। असंतुष्ट व्यक्ति समाज के लिए हानिकारक हो सकता है।
  4. हम एक समुदाय के तौर पर भारत राज्य की व्यवस्था के अंतर्गत रहते हैं, जो व्यक्तिगत हितों को सामाजिक हितों की तुलना वरीयता देता है, इसलिए यह संभव है कि व्यवस्था में यदि व्यक्तिगत हितों का हनन होगा तो वह आपकी व्यवस्था में दखल देगी, जिसका समाज की व्यवस्था पर नकरात्मक प्रभाव पड़ेगा।
  5. यदि बार-बार कोई बाहरी सत्ता आपके समुदाय के समाजिक संरचना पर अतिक्रमण करती है तो समुदाय की एजेंसी कमज़ोर होगी।
  6. समाज के अंदर से आने वाले प्रश्नों को ज़रूर हल किया जाना चाहिए, ताकि वो समाज को कमज़ोर न कर सकें।
  7. एक समाज के तौर यदि आप महिला प्रश्नों को दरकिनार करते हैं तो यह संभव है कि आप एक विभाजित समाज का निर्माण कर रहे हैं।

निष्कर्ष: आदिवासी समाज एक ऐसा समाज है जो विभिन्न मसलों पर व्यापक समाज को नज़ीर पेश करता है कि एक बेहतर समाज की परिकल्पना क्या होती है। परंतु बदलते दौर के साथ हर समाज में संक्रमण की स्थिति होती है, जिससे समाज में उथल-पुथल मचती है और एक सफल समाज वही होता है जो उथल-पुथल के इस दौर में अपने सामाजिक के मूल्यों को विघटित होने से बचा सके। वर्तमान में आदिवासी समाज भी इन्हीं उहा-पोहों से गुज़र रहा है। ऐसे में समाज के साझा क़दम सबके पक्षों के प्रश्नों को साथ लेकर उस ओर कदम बढ़ाना चाहिए जो समग्र समाज को बेहतरी की ओर ले जाए।

फीचर्ड फोटो आभार: टेलीग्राफ इंडिया

Author

  • अरबिंद, झारखण्ड राज्य से हैं। वर्तमान में अरबिंद लखनऊ के बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग से पीएचडी कर रहे हैं।

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