शैलेश:
हम अक्सर बातों-बातों में अपने विचारों को सभी के समक्ष रख देते हैं और हमारी भाषा हमारे व्यवहार को दर्शाती है। समाज में स्त्री और पुरुष के गुण और स्वभाव पहले से ही अपने अनुसार तय कर दिए गए थे और भाषा में भी इसकी छवि दिखाई देती हैl आइए जानते हैं कि किस तरह से भाषा, पितृसत्ता को बढ़ावा देती है।
समाज के अनुसार एक अच्छी औरत के गुण: जननी, पतिव्रता, सुग्रहणी; अगर महिला इन सारे बिंदुओं पर निपुण है तो वह समाज की नजर में एक गुणी महिला है। इनमें से अगर एक भी बिंदु में महिला का कमतर है तो समाज में उसे बेहया, कुल्टा और ऐसे अनेक नाम दे दिए जाते हैं। वह महिला चाहे जितना भी पढ़ी-लिखी हो, अपने जीवन में चाहे जितना आगे बढ़ चुकी हो, पर समाज के खींची हुई रेखा के मुताबिक अगर वह नहीं है तो उसे अनेक भद्दे नाम दे दिए जाते हैं।
समाज में कई जगहें ऐसी हैं, जहाँ महिलाओं के लिए भाषा मौन कर दी गई है – जैसे मुनि, किसान, वकील, दरोगा, मिस्त्री इत्यादि कुछ शब्द तो ऐसे हैं जिनके स्त्री वाचक शब्द हैं ही नहीं। उनके आगे महिला लगाकर काम चलाया जाता है, जैसे- ‘महिला पत्रकार’। कुछ ऐसे शब्द भी हैं, जिनके स्त्री वाचक शब्द बाद में बनाए गए हैं, जैसे नाई से नवनी, मेहतर से मेहतरानी, शिक्षक से शिक्षिका इत्यादि। महिलाओं को कई उपाधि तो पत्नी होने के रिश्ते से मिलती है जैसे- सेठ की पत्नी सेठानी, पंडित की पत्नी पंडिताइन, बनिया की पत्नी बनियाइन आदि। कई बार इस बात का सहारा लिया जाता है कि जिस समय यह शब्द बने, उस समय महिलाएँ इन भूमिकाओं में थी ही नहीं, मगर आज बहुत सी महिलाएं इन क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, फिर भी स्त्रीवाचक शब्दों का ना होना तो भाषा की जड़ता ही है, पूर्वाग्रह है।
अब जानते है भाषा की दोहरी नज़र
महिलाओं को परिवार की इज्जत का प्रतीक माना जाता है, यदि किसी आदमी को नीचा दिखाना हो या अपमानित करना हो तो उसकी औरत की बेज्जती करना उसके लिए अपमान माना जाता है। भाषा में इसके लिए मुहावरे हैं जैसे बेटी का बाप, बेटी वाली आदि, पुरुष को अपनी माँ-बहन-बेटी का रिश्ता तो आदर का लगता है पर दूसरों की माँ-बहन-बेटी का रिश्ता गाली बन जाता है। यहाँ पर भाषा की दोहरी नजर दिखाई पड़ती है। जिनकी तथाकथित इज्जत को बचाने का प्रयास किया जाता है वह भी महिलाएँ ही हैं और जिनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है और जिनके लिए अपशब्दों का प्रयोग होता है वह भी महिलाएँ ही हैं।
यहाँ पर दोनों तरफ से पितृसत्ता ही हावी हो रही है, एक सत्ता यह दिखाती है कि महिलाओं को अपशब्द कहने पर महिला खुद कुछ नहीं कर सकती, उसके लिए पुरुष हैं जो आगे आकर बोलते हैं। दूसरी तरफ महिलाओं की इज्जत सिर्फ पुरुष ही बचा सकते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि समाज में औरत की स्थिति और उसकी छवि को और भी ठोस रूप प्रदान करने में भाषा का विशेष हाथ है। यही वह हथियार है जो समाज के पूर्वाग्रहों को शब्द प्रदान करके उन्हें और पुख्ता करता जा रहा है।
फीचर्ड फोटो आभार: अलामी

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