ईशान और राहुल:
तीन हिंदी भाषी राज्यों, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव परिणाम आ चुके हैं, तो विधान सभा क्षेत्र दर विधान सभा क्षेत्र मतों का विश्लेषण करना उपयोगी होगा, यह समझने के लिए कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (इंका) इन सभी राज्यों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से क्यों हार गई। ईशान खपेर्डे और मैंने मिलकर चुनाव आयोग की वेबसाइट https://results.eci.gov.in/AcResultGenDecNew2023/index.htm पर उपलब्ध इन राज्यों के मतदान के आंकड़ों का विश्लेषण किया है। विश्लेषण से पता चलता है कि मध्य प्रदेश में कुल 163 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा ने जीत हासिल की और 66 पर कांग्रेस ने। 53 विधान सभा क्षेत्रों में कांग्रेस और अन्य दलों और कांग्रेस के बागी निर्दलीय उम्मीदवारों का संयुक्त वोट, जीतने वाले भाजपा उम्मीदवार से अधिक था। विवरण निम्नानुसार है –
कांग्रेस के साथ-साथ अकेले बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को मिले वोटों से इन पार्टियों के गठबंधन की 24 सीटों पर जीत सुनिश्चित हो जाती, जो ज़्यादातर उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे उत्तरी क्षेत्र में हैं।
बसपा, समाजवादी पार्टी (एसपी), गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (जीजीपी) और अन्य के साथ कांग्रेस के गठबंधन होती तो 13 विधान सभा क्षेत्रों पर गठबंधन की जीत सुनिश्चित होती।
अकेले जीजीपी और कांग्रेस के गठबंधन होती तो 4 सीटों पर जीत सुनिश्चित होती और एसपी व कांग्रेस के गठबंधन का 1 सीट पर जीत सुनिश्चित होती।
कांग्रेस के विद्रोही नेता, जिन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े और पर्याप्त संख्या में वोट हासिल किए, 11 सीटों पर कांग्रेस को हरवा दिए।
इस प्रकार, यदि India गठबंधन की भावना के अनुरूप कांग्रेस ने चुनाव पूर्व गठबंधन किया होता, खासकर बसपा, सपा और जीजीपी के साथ और उन सीटों पर उम्मीदवारों को अधिक विवेकपूर्ण ढंग से चुना होता, जहाँ विद्रोही ने कबाब में हड्डी साबित हुए, तब भी मौजूदा वोटिंग के हिसाब से इस गठबंधन को 119 सीटें मिलती और भाजपा 110 सीटों पर सिमट जाती। इस तथ्य के बावजूद कि 2023 में बसपा, सपा और जीजीपी का संयुक्त वोट 2018 के पिछले चुनावों से 4.5% कम हो गया है, जो इस बार भाजपा को मिला है।
नई भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी), जो भील आदिवासियों के अधिकारों के लिए खड़ी है और उनके लिए चार राज्यों राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के भील आदिवासी क्षेत्रों को मिलाकर एक अलग राज्य बनाने का प्रस्ताव करती है, ने इन चुनावों में अपनी शुरुआत की। उसने जिन दो सीटों पर चुनाव लड़ा उनमें से एक सीट जीत ली।
महत्वपूर्ण बात यह है कि एक विश्वसनीय चुनाव-पूर्व गठबंधन का मतदाताओं की मानसिकता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता और इसलिए यह संभव है कि India गठबंधन के तहत इस तरह के सभी गैर भाजपा दलों की चुनाव-पूर्व समझौते के परिणामस्वरूप, भाजपा का वोट कम होता और गठबंधन को और भी अधिक विधान सभा क्षेत्रों में जीत हासिल होती।
2018 के पिछले विधानसभा चुनावों में भी बसपा, सपा और जीजीपी के साथ गठबंधन नहीं करना, कांग्रेस को महंगा पड़ा था, क्योंकि वह प्रदेश के उत्तरी जिलों में भारी हार के कारण मामूली बहुमत हासिल करने में कामयाब रही थी। यदि 2018 में गैर भाजपा दलों से चुनाव पूर्व समझौता हो गया होता तो गठबंधन को बड़ी संख्या में सीटें मिलतीं और कांग्रेस उस परिस्थिति में नहीं होती जिसके कारण केवल पंद्रह महीने के बाद कांग्रेस सरकार का पतन हुआ।
दरअसल, मध्य प्रदेश में कांग्रेस अपने नेताओं के अहंकार और उनके बीच की लड़ाई दोनों से त्रस्त है, जिसकी वजह से पार्टी को अंदर से एकजुट होकर काम करने और बीएसपी, एसपी और जीजीपी जैसी अन्य पार्टियों के साथ गठबंधन करने में अड़चन आई। राज्य सभा चुनाव के समय दिग्विजय सिंह ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए अपनी राज्यसभा सीट छोड़ने से इनकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप बाद में सिंधिया अपने गुट के विधायकों के साथ भाजपा में चले गए और कांग्रेस सरकार गिर गई।
ऐसी ही स्थिति राजस्थान में बनी। कांग्रेस 115 सीटों पर भाजपा से हार गई और इनमें से 56 सीटों पर उसके वोट और अन्य गैर-भाजपा दलों या निर्दलीय उम्मीदवारों के सम्मिलित वोट भाजपा से अधिक है –
1. कांग्रेस के साथ अकेले निर्दलियों ने 18 सीटों पर जीत सुनिश्चित कर दी होती।
2. कांग्रेस के साथ अकेले राष्ट्रीय लोक दल ने 12 सीटों पर जीत सुनिश्चित की होती।
3. कांग्रेस के साथ अकेले भारत आदिवासी पार्टी ने 9 सीटों पर जीत सुनिश्चित की होती।
4. कांग्रेस के साथ बसपा अकेले 5 सीटों पर जीत सुनिश्चित कर सकती थी।
5. आजाद समाज पार्टी अकेले कांग्रेस के साथ मिलकर 5 सीटों पर जीत सुनिश्चित कर लेती।
6. कांग्रेस के साथ अकेले सीपीआईएम ने 3 सीटों पर जीत सुनिश्चित की होती।
7. कांग्रेस के साथ अन्य गैर भाजपा पार्टियों और निर्दलियों का गठबंधन 4 सीटों पर जीत सुनिश्चित करती।
इस प्रकार, भले ही इन सीटों पर कुछ निर्दलीय, जिनमें चुनाव जीतने वाले सभी 8 उम्मीदवार भी है, कांग्रेस के विद्रोही नहीं थे, चुनाव पूर्व सीट बंटवारे के समझौते के परिणामस्वरूप निश्चित रूप से इस गैर-भाजपा गठबंधन की जीत होती। वास्तव में कांग्रेस और आरएलडी के बीच इन चुनावों के लिए एक गठबंधन था, लेकिन अंत में दोनों पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ लड़ीं और परिणामस्वरूप दोनों को हार का सामना करना पड़ा। स्पष्ट रूप से, कांग्रेस को, मध्य प्रदेश की तरह, राजस्थान में भी बड़े पैमाने पर हो रहे इस विद्रोह को रोकने के लिए आंतरिक रूप से अपना खुद का घर को व्यवस्थित करना होगा और यदि वह अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता को बनाए रखना चाहती है तो अन्य दलों के साथ विश्वसनीय गठबंधन भी उसे बनाना होगा।
भारत आदिवासी पार्टी ने तीन सीटें जीतीं और दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी इलाके में 9 अन्य सीटों पर महत्वपूर्ण वोट हासिल किए। उसे मध्य प्रदेश में एक विधान सभा क्षेत्र में जीत मिली जो राजस्थान की सीमा से लगती है। परिणामस्वरूप, निकट भविष्य में इसके पश्चिमी भारतीय क्षेत्र में भील आदिवासी अधिकारों के लिए एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरने की पूरी संभावना है।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को 54 सीटों पर भाजपा से और एक सीट पर जीजीपी से हार का सामना करना पड़ा। इनमें से 16 सीटों पर कांग्रेस और अन्य गैर-भाजपा दलों या निर्दलीय उम्मीदवारों के सम्मिलित वोट भाजपा से अधिक है –
1. जीजीपी, जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसी), बीएसपी, सीपीआई आदि जैसे अन्य दलों के साथ कांग्रेस के गठबंधन ने 10 सीटों पर जीत हासिल की होती।
2. अकेले जीजीपी ने कांग्रेस के साथ मिलकर 4 सीटों पर जीत सुनिश्चित की होती।
3. बसपा अकेले कांग्रेस के साथ मिलकर 2 सीटों पर जीत सुनिश्चित कर लेती।
इस प्रकार, वर्तमान वोटिंग के अनुसार, यदि कांग्रेस का अन्य गैर-भाजपा दलों के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन होता, तो उस गठबंधन को 53 सीटों पर जीत मिलती और भाजपा को केवल 37 सीटें मिलतीं।
यह वही स्थिति है जो पहले मध्य प्रदेश और राजस्थान राज्यों में देखी गई थी।
पिछले साल उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने की जिद के कारण गैर-भाजपा वोटों के बिखराव के फलस्वरूप इसी तरह की हार हुई थी। विश्लेषण से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा ने जो 255 सीटें जीतीं उनमें से 172 सीटों पर, यदि गैर-भाजपा दलों का चुनाव पूर्व गठबंधन होता, तो वह जीत जाता।
इस प्रकार यह इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि हिंदी पट्टी के राज्यों में, कांग्रेस ने अपने दम पर चुनाव जीतने की क्षमता खो दी है और उसे अपनी राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने के लिए चुनाव पूर्व गठबंधन में अन्य गैर-भाजपा दलों को शामिल करना होगा। कांग्रेस गठबंधन के समन्वयक के रूप में कार्य कर सकती है, लेकिन इसका नेतृत्व नहीं कर सकती और अवास्तविक रूप से अधिक संख्या में विधान सभा क्षेत्र की उम्मीदवारी की मांग नहीं कर सकता। इन चुनावों ने India गठबंधन को ज़मीन पर उतारने का एक उत्कृष्ट अवसर प्रदान किया था, लेकिन कांग्रेस की हठधर्मिता के कारण इसे खो दिया गया है। अब यह देखना बाकी है कि कांग्रेस इस हार से सीख लेकर अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए एक विश्वसनीय India गठबंधन बनाने के लिए सही प्रयास करेगी या नहीं।

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