सिद्धार्थ:
7 अक्टूबर 2023 को इज़राइल पर हुए हमास के हमले के बाद, गाज़ा पट्टी पर हो रहे लगातार इज़राइली हमलों में कितने आम लोग, कितने आतंकवादी, कितने सैनिक मारे गए, और मार-मार के दुश्मन को नेस्तनाबूद कर देना है, उसके अस्तित्व के साथ उसकी भावी संभावनाओं तक को मिटा देना है, जैसे विषयों पर मीडिया में खूब चर्चा है। कंटेन्ट लिखने/बनाने वाले लोगों के लिए एक नई माइनिंग साइट खुल गई है, या कहें कि पुरानी वाली साइट पर ही नया काम शुरू हो गया है। खैर, इतना कुछ होते दिख रहा है तो आते-जाते ये मुद्दा, दिमाग और सोच के गलियारे में निकलता-चलता रहता है। इसलिए आज सोचा कि इस ‘गरमा-गरम’ मुद्दे पर क्रमबद्ध रूप से अपनी सोच को लिख लेता हूँ, यह लेख बस यही प्रयास है। यह ना अपील है, ना खुला पत्र है और ना ही कोई आलोचना है, इन सब से अब होने भी क्या वाला है? इज़राइल बढ़िया कर रहा है, दुश्मन को समंदर में डुबा देने वाला है, हमें उससे प्रेरणा लेनी चाहिए, बल्कि सब देशों को उससे प्रेरणा लेनी चाहिए, सबको अपना एक फिलिस्तीन खोज लेना चाहिए।
मैं पहली-दूसरी कक्षा में रहा हूंगा, पहला खाड़ी युद्ध चल रहा था। टीवी पर तब बस दूरदर्शन ही आता था, समाचार पर उस युद्ध का खूब कवरेज आता था। टैंक, बम धमाके, गोलियों की आवाज़ उन न्यूज़ क्लिप्स में खूब होती थी, देख के बड़ा मज़ा आता था। तभी अमेरिका और इराक का नाम सुना था पहली बार। फिर कुछ साल बीते तो इराक के आस-पास के कुछ और देशों के भी नाम सुने, ईरान, कुवैत, लेबनान, और इज़राइल आदि। मैं 7वीं में था, मुझे अच्छे से याद है, तब क्लास के एक साथी ने बताया कि अरब देशों में अकेला इज़राइल है जो मुस्लिम देश नहीं है, और उसने तो बाकी सबकी हवा टाइट करके रखी हुई है। इज़राइल की छवि मेरे मन में एक मजबूत और मान्यवर इंसान की बनी जैसे हमारे स्कूल के गुरु जी, जो पीटते तो थे लेकिन केवल हमारी भलाई के लिए। फिर 9वीं-10वीं कक्षा में द्वितीय विश्व युद्ध के बारे में पढ़ा, पता चला कि हिटलर ने यूरोप में भयानक स्तर पर यहूदियों का मानवसंहार किया था। उनमें जो बच गए उन्हें बसाने के लिए इज़राइल बनाया गया। मुझे लगा वाह ये लोग तो अंग्रेजों से बिलकुल अलग हैं, जिन पे ज़ुल्म हुए उन्हें नया देश बना के दे दिया। साथ ही इज़राइल के प्रति भी मन में सम्मान और बढ़ गया कि इतना कुछ सहा फिर भी हिम्मत नहीं हारी, अपना एक अलग देश ही बना डाला।
9वीं-10वीं तक आते-आते न्यूज़ की भाषा कुछ समझ आने लगी थी, तो ये भी समझ आया कि भारत के साथ इज़राइल के रिश्ते कुछ खास अच्छे नहीं है। वो सिर पर सांफा लपेटने वाले यासिर अराफ़ात भी याद हैं, लेकिन उनकी परेशानी क्या थी इस पर कोई जानकारी नहीं थी मुझे। तब लगता था कि इज़राइल से तो हमारे रिश्ते अच्छे होने चाहिए, उन्होने भी तो हमारी तरह कितने अत्याचार सहे, दक्षिण अफ्रीका से तो हमारे रिश्ते अच्छे हैं, मंडेला तब भारत आए थे तो कितना सम्मान हुआ था उनका। दक्षिण अफ्रीका से इज़राइल का खास रिश्ता है, इसीलिए उसका अचानक से यहाँ ज़िक्र किया है, आगे उस पर भी बात करेंगे। खैर 10-12वीं के बाद से नौकरी के 3-4 सालों तक इसपे यानि इज़राइल, यहूदी, अरब देश और फिलिस्तीन आदि के बारे में ज़्यादा कुछ सोचा नहीं। पैसा कमाने और ज़िंदगी बनाने पर फोकस करने से ज़्यादा कुछ इंपोर्टेंट तब लगा नहीं। लेकिन स्ट्रेस बस्टिंग के लिए लैपटाप पर हॉलीवुड वाली फिल्में खूब देखता था, तब मुंबई में रहता था तो इंटरनेट आसानी से मिल भी जाता था।
इन अँग्रेज़ी फिल्मों में यहूदी होलोकास्ट (मानवसंहार) पर बनी कुछ फ़ेमस फिल्में देखी, लगा कि भाई इनके साथ तो बहुत बुरा हुआ। फिर एक अँग्रेज़ी फिल्म ‘म्यूनिख’ देखी, उसमें देखा कि इज़राइल वाले कुछ अरबी आतंकवादियों को यूरोप में जाके मार रहे हैं। अरे भाई अरबी लोगों ने जर्मनी के म्यूनिख ओलंपिक (1972) में 11 इज़राइली खिलाड़ियों को मारा था ना, इसलिए। एक मिनट! यहूदी और जर्मन लोगों की दुश्मनी थी ना, ये अरब कहाँ से आ गए? ये सवाल आया तो इंटरनेट पर खोजा, तब पता चला कि भाई जहाँ इज़राइल को बसाया, वहीं तो पहले फिलिस्तीन था, वहाँ से सबको भगाया वेस्ट बैंक में और गाज़ा पट्टी में। अरे! ये तो सारा मामला ही उल्टा निकला, तो मतलब जिनको सबसे बड़ा विक्टिम बता रहे थे, उन लोगों ने एक देश के पूरे लोगों को ही कोने में कर दिया। ये तो कुछ सुना-सुना सा लग रहा है, यूएसए में वहाँ के नेटिव (मूलवासी) अमेरिकी समुदाय अपाची, मोहिकन, चारोकी आदि के साथ भी ऐसा ही हुआ था ना! हाँ-हाँ अरे वही रेड इंडियन, इनमें सब आ जाते हैं। अमेरिका के बगल में कनाडा में भी यही हुआ, वहाँ के अंग्रेज़ लेकिन थोड़ा लिबरल थे, उन्होने बोला ये रेड इंडियन (उत्तरी अमेरिकी महाद्वीप के सभी मूलनिवासी समुदायों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक ‘जेनेरिक’ शब्द) लोगों को रीएजुकेट करेंगे। उनके लिए बोर्डिंग स्कूल बनाए गए, जहाँ उनके बच्चों को विलायती बाबू बनाने के कोर्स चलाए जाते थे। उनको वहाँ केवल अँग्रेज़ी बोलने की परमिशन थी, अपनी मूल भाषा बोलने पर बच्चों की ज़बान में सुई चुभोने जैसी सजाओं का भी ज़िक्र मिल जाता है। कुछ बच्चे इन स्कूलों से भागते भी थे, कई पकड़े जाते थे, कुछ भाग भी जाते थे, और कई मर भी जाते थे। जो पकड़े जाते थे उनको सज़ा मिलती थी, उसमें भी कई मर जाते था, उनकी कब्रें आज भी कनाडा में खोजी जा रही हैं और ये ज़्यादा पुरानी बात नहीं है, 1996 में जाकर ऐसा आखिरी स्कूल बंद हुआ था। ऑस्ट्रेलिया, तस्मानिया और न्यूज़ीलैंड के ऐब-ओरिजनल समुदाय के साथ भी तो यही सब हुआ, सब एक कोने में कर दिये गए। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया में इनको रिज़र्वेशन कहते हैं और मध्य-पूर्व में फिलिस्तीन।
दक्षिण अफ्रीका में 1990 तक एक रंगभेद नीति वाली सरकार थी जिसे दक्षिण अफ्रीका में बसे गोरे यूरोपियन चलाते थे, इसे अँग्रेज़ी में ‘अपार्थाइड रेजीम’ भी कहा जाता है। इनका भी फंडा कुछ ऐसा ही था, बहुसंख्यक कालों को अल्पसंख्यक गोरों से अलग करो। एक दक्षिण अफ्रीकी स्टैंड अप कोमेडियन हैं ‘ट्रेवर नोवा’, उनकी किताब ‘बॉर्न ए क्राइम’ कभी मौका मिले तो पढ़िएगा, उसमें काफी कुछ जानने को मिलेगा इस बारे में। संयुक्त राष्ट्र संघ के बनने के बाद कई सदस्य देशों ने इस अपार्थाइड रेजीम का खूब विरोध भी किया। इज़राइल कुछ उन चुनिंद देशों में से था जो दक्षिण अफ्रीका की अपार्थाइड का विरोध नहीं कर रहे थे। कई विशेषज्ञ और विषय के जानकार मानते हैं कि, इस अपार्थाईड रेजीम को ही इज़राइल फिलिस्तीन में फॉलो कर रहा है, यही वो संबंध है जिसका मैंने पहले भी ज़िक्र किया था।
अब वापस इज़राइल पर आते हैं, सन 1948 में इज़राइल की स्थापना हुई थी। दूसरे विश्व युद्ध के बाद मित्र देशों के नेता यूएसए (संयुक्त राज्य अमेरिका) और ब्रिटेन ने तय किया कि भयंकर त्रासदी और सदमें से गुज़र चुके यूरोप के यहूदियों के लिए एक अलग देश बनाएँगे। लेकिन सवाल ये था कि कहाँ बनाएँगे? उन्होने तय किया कि अरब प्रायद्वीप में बनाएँगे, फिलिस्तीन में, अरे वही जेरूशलम वाला इलाका, यहीं से तो यहूदी धर्म की शुरुआत हुई थी, तो यहीं सबसे सही रहेगा और तब फिलिस्तीन ब्रिटेन का उपनिवेश भी था। वहाँ के लोग बाकी के अरब देशों में चले जाएंगे और यूरोप के यहूदी उनकी जगह आ जाएंगे।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की जगह यूएसए एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में उभरा, और उसकी विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं के लिए अरब देशों के बीच इज़राइल की भौगोलिक स्थिति उसे एक खास रणनीतिक क्षेत्र बनाती थी। मध्यपूर्व का इलाका खनिज तेल से समृद्ध इलाका था, और उस पर प्रभाव जमाकर ही विश्व की बड़ी ताकत का स्टेटस बरकरार रखा जा सकता था। अमेरिका ने इसी के चलते इज़राइल को बड़े पैमाने पर आर्थिक और राजनीतिक मदद पहुँचाई। इज़राइल के औध्योगिक ढाँचे, आधुनिक कृषि व्यवस्था, शहरी विकास, सड़क, ऊर्जा उत्पादन आदि से लेकर सैन्य हथियारों और उपकरणों के विकास सभी पर अमेरिका ने बड़े पैमाने पर खर्चा किया। यूरोप के अन्य देशों ने भी इज़राइल को मदद पहुँचाई लेकिन अमेरिका उनका सबसे बड़ा हमदर्द बनकर उभरा। फिलिस्तीनी मूलनिवासियों को इज़राइल से कैसे बाहर निकालना है, इसका प्लान तैयार करने में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके बाद से ही ये नासपीटे फिलिस्तीनी लड़ रहे हैं, कहते हैं कि अपने पूर्वजों की ज़मीन छोड़कर नहीं जाएंगे। अरे चले तो गए भाई वेस्ट बैंक और गाज़ा पट्टी में, थोड़ा और बाहर चले जाओ, कुछ ईजिप्ट (मिस्र) चले जाओ, कुछ जॉर्डन चले जाओ, कुछ लेबनान, कुल मिलाके जहाँ जाना है जाओ, बस यहाँ से जाओ।



सभी तसवीरों में हरा रंग फिलिस्तीनी और नीला रंग इज़राइली कब्ज़े को दर्शाता है। फोटो आभार : अल जज़ीरा
पिछले 70 साल से यही झगड़ा चल रहा है, 90 के दशक की शुरुआत में कुछ बीच-बचाव के अंतर्राष्ट्रीय प्रयास भी हुए। कहा गया कि फिलिस्तीनियों को अपना अलग देश दिया जाएगा, इज़राइल वाले इससे ज़्यादा खुश नहीं थे, लेकिन थोड़ा मान भी रहे थे। अंतर्राष्ट्रीय दबाव भी था, उन्हें भी लगा होगा कि हमारे साथ कहीं दक्षिण अफ्रीका वाला व्यवहार ना हो। यही टाइम में वो सांफ़े वाले यासिर अराफ़ात फेमस हुए थे, वो फिलिस्तीनी विरोध के अगुवा थे। 1993 में फिलिस्तीन और इज़राइल की लीडरशिप के बीच ओस्लो समझौता हुआ, जिसे एक तरह से फिलिस्तीन को एक देश बनाए जाने के ब्लू प्रिंट की तरह देखा जा सकता है। इसके बाद 1994 में यासिर अराफ़ात को और इज़राइली नेताओं शिमोन पेरेज़ और यीत्ज़ाक राबिन (दोनों ही इज़राइल के प्रधानमंत्री रह चुके हैं) को सम्मिलित रूप से मध्यपूर्व में उनके शांति प्रयासों के लिए नोबल प्राइज़ भी मिला।
इस समय तक, जिस दुर्दांत आतंकी संगठन हमास का नाम हम आज-कल सुन रहे हैं और उसे फिलिस्तीनी विरोध का चेहरा भी समझ रहे हैं, वह ज़्यादा फेमस नहीं था। 1987 में एक मुस्लिम कट्टरपंथी संगठन से ही निकलकर यह बना था। एक तरह से देखें तो इज़राइल के यहूदी कट्टरपंथी दलों और मुस्लिम कट्टरपंथी संगठन हमास के उद्देश्य, सैद्धान्तिक रूप से समान ही थे। इज़राइल को सभी फिलिस्तीनी अरब लोगों को हटाकर एक ‘सम्पूर्ण यहूदी राष्ट्र’ बनाना था तो हमास को सभी यहूदियों को मिटाकर एक सम्पूर्ण फिलिस्तीनी मुस्लिम राष्ट्र बनाना था। हमास, इज़राइली सैन्य और नागरिक ठिकानों पर शुरू से ही हमले करता आया था, लेकिन उस समय फिलिस्तीनी संघर्ष का बड़ा चेहरा पीएलओ (फिलिस्तीन लिब्रेशन ऑर्गनाइज़ेशन) था। पीएलओ, हमास की आतंकी नीतियों और नागरिक ठिकानों पर हमला करने की नीति से सहमत नहीं था, और इसके नेता यासिर अराफ़ात थे। ओस्लो समझौते के 2 साल बाद ही 1995 में इज़राइल के प्रधानमंत्री यीत्ज़ाक राबिन की कट्टरपंथी विचारधारा वाले यहूदियों ने राजधानी तेल-अवीव में एक जनसभा के दौरान हत्या का दी। इसके बाद आने वाले सालों में इज़राइल ने ओस्लो समझौते की शर्तों पर अमल करने के कोई गंभीर प्रयास नहीं किए। ओस्लो समझौते के हिसाब से आने वाले 5 सालों में एक स्वतंत्र फिलिस्तीन राष्ट्र को बन जाना था, लेकिन इसके विपरीत इज़राइल ने वेस्ट बैंक और गाज़ा पर कब्ज़ा करने और फिलिस्तीनी लोगों के शोषण की नीति को और तेज़ ही किया।
इज़राइल की इस नीति से फिलिस्तीनी लोगों का इज़राइली इरादों पर संदेह तो बढ़ा ही, साथ ही शांति की पक्षधर पीएलओ पर से भी उनका विश्वास घटा। इसी दौरान हमास चर्चाओं में आना शुरू हो गया, कुछ जानकारों का यह भी मानना है कि फिलिस्तीनी विरोध को विभाजित करने और हमास को पीएलओ के विरोधी के रूप में खड़ा करने में इज़राइल का बड़ा हाथ है। कट्टरपंथी विचारधारा का उग्रवादी संगठन हमास 90 के दशक के अंत के सालों में इज़राइली ठिकानों पर हिंसक हमले करके चर्चा में आया। तो जैसे ही मामला सुलझने वाला था, कहीं से एक कट्टरपंथी उग्रवादी संगठन ने फिर उसे पटरी से उतार दिया। आने वाले 2 दशकों तक मार-काट चलती रही, इज़राइल वेस्ट बैंक और गाज़ा पर अपना शिकंजा कसता गया और इन सब घटनाओं के बाद धीरे-धीरे फिलिस्तीन के स्वतंत्र देश बनने का मुद्दा धुंधला ही पड़ता चला गया।
इज़राइल के एक अन्य पक्ष पर भी ध्यान देना चाहिए। इज़राइल दुनिया का 10वाँ सबसे बड़ा हथियार विक्रेता देश है। इस लिस्ट में पहला नंबर यूएसए (संयुक्त राज्य अमेरिका) का आता है। अब सोचने वाली बात ये है कि केवल 70 साल पुराना देश, इतने कम समय में 10वें नंबर पे आया कैसे। तुलना के लिए कुछ ऐसे समझते हैं कि पहले नंबर वाले देश यूएसए की स्थापना लगभग 250 साल पहले 1776 में हुई थी, यानि इज़राइल से लगभग 180 साल पहले। यूएसए की जनसंख्या है करीब 33 करोड़ और इज़राइल की 1 करोड़, यूएसए का क्षेत्रफल है लगभग 98 लाख वर्ग किलोमीटर और इज़राइल का 22 हज़ार वर्ग किलोमीटर। तो इतने छोटे और नए देश ने हथियारों के क्षेत्र में इतनी तरक्की की कैसे? इसका एक जवाब है फिलिस्तीनी मानव प्रयोगशाला में अपने नए हथियारों को आज़माकर जिनके लिए उसे अमेरिका और यूरोपियन देशों से अच्छा-खासा तकनीकी, आर्थिक, और राजनीतिक सहयोग और समर्थन मिला। आधुनिक बम-बंदूकों से लेकर सर्विलान्स तकनीक तक, ये सब वेस्ट बैंक और गाज़ा के फिलिस्तीनियों पर पहले आज़माया गया, उनकी कुशलता का खूब प्रचार किया गया और फिर दुनिया भर में उन्हें मोटे मुनाफे पर बेचा गया। इसके लिए इज़राइल के लोगों को अपने फिलिस्तीनी गिनी पिग्स (एक स्तनपायी जीव जिस पर प्रयोगशालाओं में प्रयोग आजमाए जाते हैं) को ज़रूर धन्यवाद देना चाहिए।
इन सब पर विचार करने के बाद अंत में एक ही पॉइंट पर आके दिमाग रुक जाता है, वो ये कि ताकतवर के आगे सभी तर्क फेल हो जाते हैं। उन्हें जो करना होता है वो करते हैं। यूरोपियन श्वेत लोगों ने पिछली सदियों में जो कोहराम मचाया, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के बूते दुनियाभर में जो लूट-खसोट मचाई, आज का इज़राइल उसी की लेगेसी है, उसी उपनिवेशवादी प्रयोग का आधुनिक एक्सटेंशन है। अपने श्रेष्ठ होने का यह अभिमान इतना हावी है कि यूरोपियन यहूदी, खुद की भोगी मानवीय त्रासदी को दोहराने से भी गुरेज नहीं करते। वो शायद इसी में खुश हैं कि इस त्रासदी में अब वो विक्टिम (पीड़ित) नहीं हैं।
फीचर्ड फोटो आभार: अल जज़ीरा

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