निर्मला रानी:

मैं निर्मला रानी एक दलित महिला हूँ। मेरी शादी 13 वर्ष की आयु में कर दी गई थी। कम उम्र में शादी हुई तो कम उम्र में माँ भी बनी। मेरी उम्र 16 वर्ष की थी जब मैंने अपनी बेटी को जन्म दिया। उसके बाद दूसरी बेटी फिर तीसरी बेटी एक-एक वर्ष के अंतराल में। इस तरह मैंने कुल तीन बच्चों को जन्म दिया। मेरे घर में मेरी दूसरी सास थी जिसने मेरे साथ बहुत अत्याचार किया। तीसरी बेटी होने पर मुझे घर में खाना नहीं दिया गया। उन्ही दिनों भूख के मारे मेरा दम निकल रहा था लेकिन फिर पड़ोस की एक महिला, हरियाली दीदी, उन्होंने मुझे चोरी से खाना दिया। घर के भीतर मैं घरेलू हिंसा का शिकार रही। जब बच्चे सोते हुए चारपाई से गिर जाते थे तो रात में ही पति द्वारा मार पड़ती थी। 

घर का पूरा काम करना, तीन-तीन बच्चों को संभालना, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ। मेरा रंग गोरा था तो मुझे किसी से बात करने की इजाजत नहीं थी। मेरे पति लक्ष्मी चंद्र मेरे ऊपर बहुत शक करता था। वो उत्पीड़न का कोई भी तरीका करने से नहीं चूकता था – मानसिक उत्पीड़न, शारीरिक उत्पीड़न, बात-बात पर लात-घूसों का इस्तेमाल करता था। शराबी था, बार-बार तलाक देने की धमकी देता था। इसी बीच में मेरी ससुराल में एक लड़की कुंता की शादी कम उम्र हो रही थी। उसका मेरे पास आना-जाना था। पता नहीं मुझे क्या सूझा कि मैं अचानक चिलकाना थाने चली गई कि शादी रोको और वह दिन मेरी जिंदगी का सबसे खराब दिन था। शादी तो रुक गई लेकिन मुझे बहुत मार पड़ी। मेरे देवर ने मारा, फिर पति ने लात, बेल्ट, डंडे से मारा। मुझे  कोई बचाने वाला नहीं था। मेरे बच्चे एक तरफ रो रहे थे। जब डंडा मेरे बाह पर लगा तो मेरी बाजू की हड्डी टूट गई।

मैं रात भर रोती रही, फिर अगले दिन मैंने मेरे पापा को बुलाया। गाँव की पंचायत हुई। मेरे पापा को भी भरी पंचायत में जलील किया और कहा कि अपनी बेटी को ले जा यहाँ से। इसके साथ इसको सपोर्ट करने वाला जो मर्द है जब तक यह उसका नाम नहीं बताएगी हम इसको अपने यहाँ नहीं रखेंगे। इसके बाद पापा मुझे अपने साथ घर ले आए, लेकिन मेरे बच्चे मुझसे ले लिए गए। फिर मेरे पापा ने थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई और मेरे बच्चे मुझे तीसरे दिन मिले। एक दिन मैं अपने पापा के घर से आत्महत्या करने निकली, मगर फिर बच्चों के नाते घर वापस आई। मैं अपने पापा के घर एक वर्ष तक रही पर मुझे कोई लेने नहीं आया। मैंने अपनी पढ़ाई पूरी करने की ठानी और कक्षा 10 का प्राइवेट फॉर्म भरा। मैं सेकंड डिवीजन से पास हुई। यहाँ से मेरी ज़िंदगी का दूसरा सफर शुरू हुआ। फिर 1992 में दिशा नाम के एक सामाजिक संस्था ने मुझे अपने यहाँ काम दिया और मैं दलित और मुस्लिम महिलाओं के मुद्दे को उठाने लगी।

सबसे पहले जब मैं जागरूक हुई तो पति पर मुकदमा किया, भरण पोषण के लिए। मुकदमा दर्ज कराने के बाद से ही वह मुझे लेने आने लगे, लेकिन मैं उनके साथ नहीं गई और किराए का मकान लेकर अलग रहने लगी। 

बदलाव 

मेरी जिंदगी में अनेकों बदलाव आये हैं। दलित होने का एहसास मुझे समाज ने करवाया और उन्ही के साथ छुआछूत मैंने नजदीक से देखा और महसूस किया है। इसलिए जब मैं एक बार घर से निकाल दी गयी तो फिर उस चौखट पर नहीं गई, मैंने शिक्षा को अपना हथियार बनाया। 

उसके बाद मैंने इंटर पास किया फिर ग्रेजुएशन पास किया और इग्नू से मास्टर किया, फिर मैंने T.O.T किया। 1992 से सामाजिक जिंदगी में कदम रखने के बाद से मैं पीछे नहीं हटी। अपनी बेटियों को पोस्ट ग्रेजुएशन कराया अपने अकेले के दम पर, बेटा-बेटी में कभी भेदभाव नहीं किया। इस 32 वर्ष के सफर की जिंदगी को बहुत करीब से देखा व जिया है। अनेकों महिलाओं को हिंसा से मुक्त कराया है मैंने महिलाओं के अधिकारों की परोपकारी और लंबी लड़ाई लड़ते हुये। फिर उसी समाज द्वारा अनेकों सम्मान से सम्मानित किया गया और समाज में मेरी अपनी खुद की पहचान है जो ना पिता से है और ना पति से और ना किसी बहू से। 

कभी नहीं सोचा था कि इतनी पीड़ा सहकर, परिवार व समाज द्वारा इतना अपमान सहने के बाद कोई ठंडी सुबह भी आयेगी, लेकिन वो सुबह आयी फिर समाज परिवार में सम्मान भी मिला। लेकिन संघर्ष अभी भी चल रहा है बस उसका स्वरूप बदल गया है। समुदाय की दलित महिलाओं के साथ संघर्ष और इस प्रकार यह मेरा सफ़र पूरा हुआ। 

मैं अकेले ही चली थी, राह के मंजिल पर 
लोग मिलते गए, कारवां बनता गया

फीचर्ड फोटो प्रतीकात्मक है। फीचर्ड फोटो आभार: pixahive

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