परसराम मिरी:

मैं परसराम मिरी, ग्राम पिलवापानी, थाना पिचौरा, जिला महासमुन्द (छ.ग.) का रहने वाला हूँ। मेरा जीवन बहुत गरीबी में गुज़रा, बचपन से जवानी तक और अभी तक गरीबी की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। मैं जब छठवीं कक्षा मे पढ़ रहा था तब पहली बार फिल्म देखकर मेरी इच्छा हुई कि बड़ा आदमी बनूँ, जिसके बाद मैं ध्यान देकर पढ़ने लगा। 10वीं क्लास तक मेरा सपना रहा कि मैं इंजीनियर बनूँ, लेकिन उसमें देखा कि इसकी पढ़ाई में ज्यादा पैसा खर्च होता है। जब इस बात को मैंने अपने घर वालो को बोला तो उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। फिर मेरा मन बदल गया और मैं एक्टर बनने की सोचने लगा। 

मैंने फ़र्स्ट इयर तक पढ़ाई की उसके आगे घर वाले पढ़ा नहीं पाए, क्योंकि मेरे घर में मेरे और भाई-बहन भी थे। पढ़ाई छोड़कर मैं काम में जुट गया, फिल्मो में ट्राई किया और ट्रेनिंग में पास हो गया, लेकिन फिर वहाँ भी पैसे की बात आ गई जिसके लिए मुझसे 1 लाख 40 हज़ार रुपयों की मांग की गई। फिर परेशानी हो गई, मेरे पास तो उस समय में 400 रुपया भी नही था। फिर निराश हो गया, कुछ दिन बाद पुलिस में ट्राई किया और पास हो गया, जिस दिन मेरी ज्वाइनिंग थी उस समय में एक केस के कारण मैं जेल में बंद था तो मैने अपना ज्वाईनिंग लेटर भी जेल में ही पढ़ा और उस दिन से मैं पूरी तरह टूटकर बिखर गया। पहले मुझे डाँस करना और गाना गाना बहुत पसंद था साथ ही बॉडी बिलडिन्ग करना भी पसन्द था। इस बाद मैंने सब छोड़ दिया, बस बॉडी बिडिंग को छोड़कर क्यूंकि इसके बिना मैं नहीं जी सकता था।

मेरी शादी एक आदिवासी लड़की से हुई, हम दोनों ने लव मेरिज शादी की। इस शादी के कारण आदिवासी लोग मुझे 6 महीने तक तीर-कमान से मारने को खोजते रहे, लेकिन धीरे-धीरे सब सही हो गया। इसी बीच हम दोनों के दो बच्चे हुए। ड्राइविंग करके मैं अपना जीवन-यापन कर ही रहा था कि इसी दौरान एक ओबीसी समाज की लड़की से मुझे प्यार हो गया और हम दोनों ने शादी कर ली। मेरे पहले से शादीशुदा होने के कारण लड़की के परिवार वाले मुझसे नाराज़ थे, जिसके बाद लड़की के परिवार वाले बंदूक लेकर मुझे मारने के लिए खोजने लगे। उनके डर से मैं अपनी दोनो बीवी और दोनों बच्चों को लेकर मुंबई चला गया। दो साल के बाद सब ठीक होने के बाद हम वापस अपने घर आ गये। इसके बाद हमारे दो बच्चे हुए, जिसके बाद मेरी आर्थिक स्थिति और बिगड़ गई।  

मैंने देखा कि गरीबों और दलितों पर बहुत अत्याचार हो रहा है और मेरे खुद पर भी। मैने जनसेवा करने का मन बना लिया पर मैं खुद आगे नहीं आया और मैंने अपनी पत्नी को इस क्षेत्र में आगे लाया। वह इस क्षेत्र में अच्छी कार्यकर्ता के रूप मे काम कर रही है, जिसे मैं और आगे लेकर जाना चाहता हूँ। इसकी मैंने शुरुआत कर दिया है क्यूंकी मैं दलितो और शोषितों के लिए उद्धार का मार्ग बनना चाहता हूँ। अभी के समय जल जंगल और ज़मीन को लेकर काम करता हूँ और एक दलित संगठन से जुड़ा हूँ।

धन्यवाद

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