यशोदा गुर्जर:

बडी महकती सी सुबह थी एक दिन। धीरे-धीरे चिड़िया चहकती हुई मेरे पास आकर बैठी और मुझे अपनी प्यारी सी आवाज़ में कहने लगी – चि चि चि चि…… 

मैं उठी और अपने रोज़ के बीते दिन जैसे आज भी मुँह धोकर, चाय पीने बैठ गई। वो खुली हवा में पंछियों को देखते हुए अपने आप में मुस्कुराना और फिर नीचे से आवाज़ आई – जैसे मुझे कोई बुला रहा हो, मैं भाग के नीचे गई और देखा तो कुछ भी नहीं था। धत तेरी… कुछ है नहीं और पता नहीं कौन से ख़याल आ रहे हैं। कुछ पल के लिए लगाा कि जैसे मम्मी मुझे आवाज़ लगा रही है, पर ऐसा कैसे हो सकता है क्योंकि वो तो वहाँ है जहाँ से लोग वापस नहीं आते। चलो छोड़ो! अब कितना सारा घर का काम पड़ा है… मैं अपने काम करने में लग गई। मैंने सारा काम निपटाया एक ग्रहणी की तरह, जबकि मैं तो एक स्टूडेंट थी। मैंने अपने से छोटे भाई-बहनों को स्कूल भेजा और फिर खुद पढ़ने बैठी। 

ना जाने कब मुझे किसकी बात बुरी लग जाए और कब मैं गुस्से में अपने आप को हानि पहुँचा देती, पता ही नहीं चलता। और पता है कैसी हानि… चलो मैं ही बताती हूँ। मेरी आदत होती है खाना नहीं खाना, किसी से बोलना भी नहीं, क्यूँ भई! हम किसलिए बोले किसी से? जब गुस्सा ही हम हैं और हमें ही आगे होकर सबसे बोलना पड़े, ये तो जमता नहीं। कुछ ऐसे ही ख़याल थे मेरे, लेकिन धीरे-धीरे दुनिया आगे बढ़ती गई और मैं भी बदलने लगी। हालांकि अभी भी मुझ में वही चीजें कभी-कभी असर दिखा देती हैं, लेकिन अब कंट्रोल करना आ गया। कुछ यूँ ही चलता रहा मेरी ज़िंदगी का सफर। 

मैं जब स्कूल जाया करती थी ना तो घंटो तक अपनी छत पर इस बहाने से बैठी रहती थी कि मैं होमवर्क कर रही हूँ। और जो भी मुझे काम बताने के लिए ढूंढते वो ये जानकर चले जाते कि बच्ची पढ़ रही है और पढ़ती हुई को हम काम नहीं बता सकते। स्कूल में उसको डांट पड़ेगी। फिर क्या मैं खुश, लेकिन मैं पढाई के साथ ही अपने आस-पास कि चीज़ों का निरीक्षण किया करती थी। कुछ समय बीता और मैं एक दिन खेल रही थी, वही जो गाँव में बच्चें खेलते हैं- कब्बा, छुपाई ये वो सब। पर आश्चर्य की बात ये थी कि मुझे किसी लड़ाई में या लड़ने वाले बच्चों के साथ खेलना पसंद नहीं था। मैं अकेले खुद में सोचती थी कि पता नहीं कैसे बच्चें हैं, घरवालों ने इनको कुछ भी सिखाया नहीं है। मुझे डर लगता था जब किसी की लड़ाई हो जाती और वो लोग खून-खराबा भी कर देते। और सोचो यही लड़ाई जब मेरे अपने घर में होती थी, तब मुझ पर क्या बीतती थी। मुझे तो दिल का दौरा पड़ जाएगा जैसे हो जाता था और मानों कि जैसे किसी जहरीले सांप ने डंक मार दिया हो और मैं बस आखरी सांसे गिन रहीं हूँ। अब क्या करें हो ही जाता है। कोई अपनी भावानाओं पर कंट्रोल रख पाता है तो कोई नहीं रख पाता। चलो इसे छोड़ो, मैं और एक दिन कि बात बताती हूँ, जब मुझे स्कूल से छुट्टी करने के लिए बोला गया था, क्यूंकी मम्मी की थोड़ी तबियत सही नहीं थी। मेरे लिए छुट्टी मतलब सुबह उठो और घर का काम करो। 

अरररररररे… ये क्या जब मैं घर पर बर्तन धोने के लिए बैठी और मेरी क्लास की सारी फौज मुझे बाहर से आती दिखाई दी तो भईईई मेरे तो होश ही उड़ गए। क्योंकि मैम इनके साथ ही सारे संदेश भेजती थी और जिस डांट से हमारी हालत ख़राब हो जाया करती थी, वही बोलकर ये पलटन निकल जाती। लेकिन मैंने भी आज इनको अपनी डेढ़ होशियारी दिखाई और चुपके से वहाँ से कलटी हो गई। उनको भी अपनी फौज वाली ड्यूटी तो पूरी करनी थी, मानो वो मैम के यमराज बनकर आए थे। उनकी ये लाइन मुझे अभी भी याद है… “इसको बड़ी मैम ने बुलाया है, और अगर ये स्कूल नहीं आएगी तो वो खुद यहीं आंएगी।” बस फिर क्या मेरा मन करता ये घर वाले भी पता नहीं क्यूं पढ़ा रहे हैं! छुड़वा क्यूं नहीं देते स्कूल? और आखिर ये हिंदी-इंग्लिश मेरे कहा काम आएंगे? बड़ी मैम आते ही सामाजिक लेकर बैठ जाती है और अगर टेस्ट में कम नंबर आए तो भईया गए काम से। चलो छोड़ो अभी तो इन यमराजों से जान छुटी। वो सब स्कूल निकले और मैं मेरे अधूरे बर्तन धोने लग गयी। इसके बाद मैंने मम्मी से बात की, कि मुझे स्कूल क्यूं भेजा जाता है और मुझे ही नहीं बाकी बच्चे भी स्कूल क्यूं जाते हैं, जब वहाँ पर सबके घरवालों से पैसे भी लिए जाते है और वो पैसे तो बड़ी मुश्किल से कमाए जाते हैं। थोड़ी देर मुझे आश्चर्य के साथ देखती हुए मेरी माँ बोली, “पढ़ाई करना ज़रूरी है, क्योंकि जब तक पढ़ाई नहीं करेंगे कुछ भी नहीं कर सकते। जैसे हम लोग बिना पढ़े रह गए, वैसे ही तुम्हें नहीं रहना, पढ़ो और अपना कोई सपना बनाओ जिसको पूरा करने के लिए एक दिशा दिख जाए।” मुझे कुछ सपना नहीं दिखता था और मैं तो सपना वही मानती थी जो हम सोते हुए देखते हैं। मैंने उनको ही पूछ लिया कि आपका क्या सपना था जब आप छोटे थे। उन्होंने बताया कि जब वे छोटी थी तब उनको भी पढ़ने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी। उनको पढ़ने के लिए नहीं भेजा जाता था, लेकिन उनको पढ़ने का बहुत शौक था। अपने भाई को जब वो स्कूल छोड़ने जाती थी तब स्कूल खुले हुए स्थान पर हुआ करता था, स्कूल के बाहर जेबी वो निकलती तो वहीं छुपकर बैठ जाती थी और जो चीजें अंदर सिखायी जाती वो बाहर बैठकर सीखती। घर आने के बाद भाई से पूछना कि होम वर्क में क्या मिला और उसको होमवर्क करने में मदद करती थी। मम्मी बताती कि धीरे-धीरे उसने सब सीखा और उस समय उनको पुलिस बनने का ख़याल आया, क्योंकि उस समय पुलिस की नौकरी को अच्छी नौकरी मानते थे। हालांकि उसमें पैसे ज्यादा नहीं मिलते थे पर धाक ज्यादा थी। पर ऐसे कुछ हुआ नहीं और ब्याह के बाद वह ससुराल आकर अपना घर सँभालने में लग गई। बस फिर क्या मैंने भी ठान लिया कि अब मैं इनका सपना पूरा करूंगी। लेकिन बेटा… ऐसे केवल बातों से नहीं बन सकते… इसके लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी… ये उन्होने मुझे प्यार से बोला। हाँ-हाँ, मैंने भी अपनी गर्दन हिलाते हुए उनको बात में हामी भरी। चलो देखते हैं। 

मैं फिर खूब मन लगाकर पढ़ने लगी और कक्षा 8 तक अच्छे नंबरों से पास हुई। जैसे ही मैं 9वीं में पहुंची, मेरे घर की स्थिति में अफरा-तफरी मच गयी। घर की ज़िम्मेदारीयां इतनी बढ़ गई थी कि मैं कभी स्कूल जाती तो कभी छुट्टी कर लेती। घर और स्कूल दोनों में बैलेंस बनाने में थोड़ा समय लग गया। जैसे-तैसे करके 9वीं मैंने पास की और 10वीं में आ गयी। उस समय में मैंने 10वीं की पढ़ाई केवल दो महीने ही की थी। उस समय तक वो हमसे दूर चली गई थी और उनके बाद एग्जाम देना बड़ा भारी लग रहा था, लेकिन दो महीने की पढ़ाई के भरोसे मैंने एग्जाम दिया। फिर और आगे पढ़ने के लिए मेरा मन नहीं था। जब हमारा बोर्ड का रिजल्ट आया तब मैं पास हो गई थी, लेकिन वो खुशी जो माँ के साथ रहकर होती वो नहीं थी। मैं चुप-चुप सी रहने लगी और जब मेरा मन करता तब ही मैं किसी से बातचीत करती, बोलती। थोड़े दिन तो ऐसा चलता रहा और मैंने 11वीं का वो साल ऐसे ही निकाल दिया। पढ़ने का मेरा मन इसलिए नहीं होता था क्यूंकि मैं सोचती कि अब पढ़कर क्या करुंगी? मुझे अपने करियर के बारे में सोचना ही बुरा लगता था। माँ के अलावा घर में सब थे, पर कुछ भी ठीक नहीं लगता क्यूंकि उनसे ही दिन और रात हुआ करती थी। 

खैर….इसके बाद, पापा के बोलने पर मैंने 12वीं की पढ़ाई की वो भी ओपन स्कूल से। इसमें भी मेरे जीवन में दुख हो गया, पता है क्या? मुझे विषयों कि समझ नहीं थी, मैंने 10वीं में कॉमर्स ले ली। इसको घर पर पढ़ना और मुश्किल हो गया था। फिर मैंने पहली बार ट्यूशन लिया, जब रिजल्ट आया तो मैं 12वीं में भी पास हो गई। उस समय मुझे थोड़ी खुशी हुई, मैंने कॉलेज भी प्राइवेट किया क्यूंकि घर में जो ज़िम्मेदारियाँ हैं वो भी पूरी करनी पड़ती है। यहाँ तक मुझे ऐसे रिलेक्स हुआ कि चलो फेल तो नहीं हुई।

कॉलेज करते-करते मैंने मंजरी संस्था में काम करना शुरू किया, जिसमें महिलाओं के साथ मीटिंग करती थी और उनके साथ अलग-अलग मुद्दों पर बात करती। इसी बहाने मुझे घूमने का भी मौका मिल जाता था। लेकिन वो केवल मेरे गाँव तक ही सीमित थी, पर घर से बाहर निकलने का एक अच्छा बहाना था मेरे पास। फिर मैंने उसमें जुड़कर दो साल तक अलग-अलग जगहों पर घूमकर अपना ख़याल रखना सीख लिया और अब तैयारी थी इसके आगे कुछ करने की। फिर मैंने महिला जन अधिकार समिति नामक एक संस्था के बारे में सुना था और ये काफी अच्छा भी लग रहा था। मेरे लिए ये एक नयी जगह और नया काम था। फिर मैंने इसमें आना चाहा और सलेक्शन होने के बाद मैंने ये संस्था जॉइन की। ये संस्था महिलाओं, लड़के-लड़कियों और बच्चों के अधिकारों पर काम करती है और ऐसे मैंने अपने जीवन में धीरे-धीरे वापस वैसी ही रौनक लाने की कोशिश की। मुझे बाहर आने-जाने के मौके मिलते रहते थे, जिससे मैं अपनी समझ भी बढ़ाती रहती थी। 

पहले जैसी लाइफ तो नहीं है क्यूंकि मम्मी मेरे पास नहीं है, लेकिन मेरे पापा बहुत अच्छे हैं। वो हर बात में हमारा साथ देते हैं। कभी-कभी मुझे मम्मी की बहुत याद आती है, क्यूंकी एक वही थी जिनके होने से हम अपने मन की बातें और लोगों के बुरे व्यवहार के बारे में उनको बता सकते थे, उनसे बातचीत कर सकते थे। 

पूरे साल में जैसे महिने बदलते है वैसे ही मेरी जिंदगी चल रही है।

Author

  • यशोदा गुर्जर / Yashoda Gurjar

    24 साल की यशोदा, राजस्थान के अजमेर ज़िले के घूघरा गाँव की रहने वाली है। उन्होंने समाजशास्त्र में एम.एय. किया है। यशोदा पिछले 04 साल से महिला जन अधिकार समिति के साथ जुड़कर, युवतियों व लड़कियों के बीच लीडरशिप व उनकी एंजेसी को मजबूत करने के लिए गाँवों में काम कर रही हैं।

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